उड़ीसा हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी न्यायाधीश को केवल इस आधार पर रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता कि उनका तबादला दूसरे हाईकोर्ट में हुआ था और वे वहीं से रिटायर हुए। कोर्ट ने ओडिशा सरकार को पूर्व न्यायाधीश चित्तरंजन दाश को 60,000 रुपये प्रतिमाह की रिटायरमेंट सुविधाएं देने का निर्देश दिया है।
जस्टिस संजीब के. पाणिग्रही और जस्टिस मुराहरी श्री रमन की खंडपीठ ने 2 नवंबर को दिए फैसले में कहा कि जिस राज्य के हाईकोर्ट में किसी न्यायाधीश की पहली नियुक्ति हुई थी, उस राज्य को भी रिटायरमेंट सुविधाएं देने के लिए संबंधित राज्य माना जा सकता है।
हालांकि, इन सुविधाओं का लाभ देने से पहले यह सत्यापित करना आवश्यक होगा कि संबंधित न्यायाधीश किसी अन्य हाईकोर्ट से समान सुविधाएं प्राप्त नहीं कर रहे हैं।
कोर्ट ने कहा कि रिटायरमेंट के बाद न्यायाधीशों को दी जाने वाली सुविधाएं कोई रियायत नहीं हैं, बल्कि वर्षों तक न्यायिक सेवा देने वाले व्यक्तियों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने का माध्यम हैं।
ओडिशा सरकार ने भत्ते देने से किया था इनकार
जस्टिस चित्तरंजन दाश की नियुक्ति 7 अक्टूबर 2009 को उड़ीसा हाईकोर्ट में हुई थी। इसके बाद 1 जून 2022 की अधिसूचना के तहत उनका तबादला कलकत्ता हाईकोर्ट कर दिया गया। उन्होंने 20 जून 2022 को वहां कार्यभार संभाला और 20 मई 2024 को रिटायर हुए।
ओडिशा सरकार ने 24 अप्रैल 2025 को एक अधिसूचना जारी कर रिटायर्ड न्यायाधीशों के लिए घरेलू सहायकों और ड्राइवर के खर्च के रूप में 45,000 रुपये प्रतिमाह तथा टेलीफोन, इंटरनेट, सचिवीय सहायता और सुरक्षा सेवाओं के लिए 15,000 रुपये प्रतिमाह का प्रावधान किया था।
अधिसूचना में इन भत्तों में हर साल 5 प्रतिशत वृद्धि की भी व्यवस्था थी।
हालांकि, राज्य सरकार ने 31 जुलाई 2025 के आदेश में जस्टिस दाश को उनके मूल हाईकोर्ट के माध्यम से चिकित्सा सुविधाएं लेने की अनुमति दी, लेकिन अन्य भत्ते देने से इनकार कर दिया। सरकार का आधार यह था कि वे उड़ीसा हाईकोर्ट के बजाय कलकत्ता हाईकोर्ट से रिटायर हुए थे।
इस फैसले को जस्टिस दाश ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर हाईकोर्ट ने किया विचार
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने रिटायर्ड हाईकोर्ट न्यायाधीशों को दी जाने वाली सुविधाओं के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों का परीक्षण किया।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले राज्य सरकारों को रिटायर्ड न्यायाधीशों के लिए योजनाएं बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। बाद में आंध्र प्रदेश में लागू मॉडल अपनाने का निर्देश दिया गया।
फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आंध्र प्रदेश में रिटायर्ड न्यायाधीशों को मिलने वाली सुविधाएं अन्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के रिटायर्ड न्यायाधीशों को भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
अप्रैल 2025 में जारी एक अन्य स्पष्टीकरण में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित राज्य की पहचान के प्रश्न पर कहा कि जिस राज्य में न्यायाधीश की पहली नियुक्ति हुई थी या जिस राज्य से वे रिटायर हुए, उसे इस उद्देश्य के लिए संबंधित राज्य माना जा सकता है।
इन निर्देशों को एक साथ पढ़ते हुए उड़ीसा हाईकोर्ट ने माना कि दूसरे हाईकोर्ट से रिटायर होना अपने आप में सुविधाएं देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि एक से अधिक हाईकोर्ट से समान सुविधाएं प्राप्त करने पर रोक का उद्देश्य दोहरे लाभ को रोकना है। इसका उद्देश्य उन न्यायाधीशों को सुविधाओं से वंचित करना नहीं है जिनका सेवा के दौरान तबादला हुआ था।
रिटायर्ड न्यायाधीशों को सरकारी विभागों के चक्कर नहीं लगाने चाहिए
हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका और उसके सदस्यों के बीच संबंध न्यायाधीश के रिटायर होने के साथ समाप्त नहीं हो जाता।
कोर्ट के अनुसार, चिकित्सा सहायता, घरेलू सहयोग और संचार संबंधी सुविधाएं रिटायरमेंट के बाद वास्तविक जरूरतों को पूरा करती हैं। जिन सुविधाओं की आवश्यकता को सरकार स्वयं स्वीकार कर चुकी है, उन्हें प्राप्त करने के लिए पूर्व न्यायाधीशों को बार-बार सरकारी विभागों से संपर्क करने या प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
खंडपीठ ने कहा कि न्यायिक सेवा में लंबे कार्य घंटे, निरंतर मानसिक परिश्रम और संस्था तथा न्याय की अपेक्षा लेकर आने वाले लोगों के प्रति जिम्मेदारी शामिल होती है।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वर्षों तक न्यायपालिका की सेवा करने वाले व्यक्ति को सम्मानपूर्वक रिटायर होने और बुनियादी जरूरतों को लेकर चिंता से मुक्त रहने का अवसर मिलना चाहिए।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि कोई संस्था अपने पूर्व सदस्यों के साथ कैसा व्यवहार करती है, इससे उस संस्था का अपना दृष्टिकोण भी सामने आता है।
कोर्ट के अनुसार, पात्रता संबंधी शर्तों और सुरक्षा उपायों का उद्देश्य योजना को प्रभावी ढंग से लागू करना होना चाहिए, न कि उसके मूल उद्देश्य को विफल करना।
आठ सप्ताह में बकाया राशि जारी करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने जस्टिस दाश की याचिका स्वीकार करते हुए ओडिशा सरकार के 31 जुलाई 2025 के आदेश को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जिसमें उनके द्वारा मांगे गए भत्तों पर विचार नहीं किया गया था और उन्हें मंजूरी नहीं दी गई थी।
खंडपीठ ने राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के संबंधित आदेशों और 24 अप्रैल 2025 की अधिसूचना के अनुसार रिटायरमेंट सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
हालांकि, सरकार को पहले यह सत्यापित करना होगा कि जस्टिस दाश कलकत्ता हाईकोर्ट या किसी अन्य हाईकोर्ट से समान सुविधाएं प्राप्त नहीं कर रहे हैं।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि लागू आदेशों के तहत जिस तारीख से ये सुविधाएं देय हुई थीं, उस तारीख से बकाया राशि की गणना की जाए और फैसले की प्रति प्राप्त होने के आठ सप्ताह के भीतर भुगतान किया जाए।
हाईकोर्ट ने मुकदमे के खर्च के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।
