सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने सोमवार को न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित संशोधित मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) को अंतिम रूप देने में हो रही देरी के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। यह प्रक्रिया करीब 11 वर्षों से लंबित है।
मामला जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध था। जस्टिस नरसिम्हा ने सुनवाई से इसलिए खुद को अलग किया क्योंकि वह पहले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) से संबंधित मामले में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के रूप में सुप्रीम कोर्ट में पेश हो चुके हैं।
संशोधित नियुक्ति प्रक्रिया में देरी पर उठाए सवाल
गैर-सरकारी संगठन लोक प्रहरी ने जनहित याचिका दाखिल कर संशोधित MoP को अंतिम रूप देने में हो रही देरी का मुद्दा उठाया है।
याचिका के अनुसार, केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच कई बार पत्राचार होने के बावजूद करीब 11 वर्षों से संशोधित MoP को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है।
MoP उन दस्तावेजों का समूह है, जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और स्थानांतरण की प्रक्रिया संचालित होती है।
न्यायाधीशों के चयन के मानदंड सार्वजनिक नहीं होने का मुद्दा
याचिका में संवैधानिक अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों के मूल्यांकन और चयन संबंधी स्पष्ट एवं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मानदंडों के अभाव पर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया में उम्मीदवारों के मूल्यांकन और चयन के निर्धारित मानदंडों की कमी के साथ-साथ संशोधित MoP को अंतिम रूप देने में लंबे समय से हो रही देरी को प्रमुख मुद्दा बनाया है।
