बैंक ने परिसर खाली किया, चाबियां भी अदालत में जमा कीं, फिर भी मकान मालिक को नहीं मिला कब्जा: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तय की तीन महीने की समयसीमा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी आपत्तिकर्ता को सुनवाई का उचित अवसर देना जरूरी है, लेकिन इसके आधार पर अदालत की डिक्री के क्रियान्वयन को अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता।

जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने मेरठ में पंजाब नेशनल बैंक से परिसर खाली कराने से जुड़े मामले में एक हाउसिंग सोसायटी की आपत्ति का निस्तारण प्राथमिकता के आधार पर तीन महीने के भीतर करने का निर्देश दिया है।

यह विवाद वर्ष 2012 की बेदखली डिक्री से संबंधित है। बैंक जुलाई 2025 में परिसर खाली कर चुका है और उसकी चाबियां भी अदालत में जमा हैं, लेकिन सोसायटी की आपत्ति लंबित होने के कारण डिक्री के तहत कब्जा नहीं सौंपा जा सका है।

2012 में मिली थी बेदखली की डिक्री

श्रीमती निर्मला देवी ने वर्ष 2010 में मेरठ के साकेत स्थित परिसर संख्या A-38 को खाली कराने और बकाया किराया वसूलने के लिए पंजाब नेशनल बैंक तथा उसके अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दाखिल किया था।

27 अगस्त 2012 को उनके पक्ष में डिक्री पारित हुई। बैंक ने इस फैसले को हाईकोर्ट में सिविल रिवीजन के माध्यम से चुनौती दी।

मुकदमे के दौरान मेरठ सहकारी आवास समिति लिमिटेड ने भी पक्षकार बनाए जाने का आवेदन दिया था, जिसे 25 जनवरी 2012 को खारिज कर दिया गया।

निर्मला देवी का 3 फरवरी 2024 को निधन हो गया। वर्तमान याचिकाकर्ता ने 20 नवंबर 2021 की पंजीकृत वसीयत के आधार पर मुकदमे को आगे बढ़ाने का अधिकार होने का दावा किया।

इसके बाद 5 अगस्त 2025 को डिक्री के क्रियान्वयन की कार्यवाही शुरू की गई। इस दौरान हाउसिंग सोसायटी ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 21 नियम 97 के तहत आपत्ति दाखिल कर दी।

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बैंक ने परिसर खाली किया, अदालत में जमा कराईं चाबियां

11 मार्च 2026 को बैंक की सिविल रिवीजन पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने आया कि बैंक 14 जुलाई 2025 को परिसर खाली कर चुका था और किराए का बकाया भी चुका दिया था।

हालांकि, मकान मालिक और सोसायटी के बीच विवाद के कारण बैंक ने चाबियां नहीं सौंपी थीं।

हाईकोर्ट ने बैंक को चाबियां क्रियान्वयन अदालत में जमा करने का निर्देश दिया। बैंक ने 1 अप्रैल 2026 को इसका पालन किया।

इसके बावजूद 30 मई 2026 को क्रियान्वयन अदालत ने चाबियां जारी करने और कब्जा दिलाने के आवेदन पर निर्णय सोसायटी की आपत्ति के निस्तारण तक टाल दिया।

इस बीच सोसायटी ने मामला स्थानांतरित करने के लिए आवेदन दिया, जिसे मेरठ के जिला न्यायाधीश ने खारिज कर दिया। इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में दाखिल चुनौती भी सोसायटी ने 22 सितंबर 2026 को वापस ले ली।

डिक्री मिलने के बाद भी कब्जा नहीं मिलने पर हाईकोर्ट पहुंचे

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विक्रांत राणा और अधिवक्ता नीलाक्षी त्रिपाठी ने कहा कि वर्ष 2012 की डिक्री और बैंक द्वारा चाबियां जमा करने के बावजूद कब्जा नहीं मिल सका है।

उन्होंने सोसायटी की लंबित आपत्ति का समयबद्ध निस्तारण कराने का अनुरोध किया।

बैंक और उसके अधिकारियों की ओर से अधिवक्ता कृष्ण मोहन अस्थाना ने कहा कि बैंक को मांगी गई राहत पर कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि चाबियां पहले ही अदालत में जमा की जा चुकी हैं।

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हाईकोर्ट ने सोसायटी को नोटिस जारी करना आवश्यक नहीं माना। साथ ही स्पष्ट किया कि इससे संबंधित कार्यवाही में अपना पक्ष रखने का उसका अधिकार प्रभावित नहीं होगा।

डिक्री का क्रियान्वयन न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा

हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अधीनस्थ अदालतों की कार्यवाही में अनावश्यक देरी रोकने और मामलों की प्रभावी प्रगति सुनिश्चित करने के लिए पर्यवेक्षण की शक्ति का इस्तेमाल किया जा सकता है।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“डिक्री का क्रियान्वयन न्याय प्रशासन का अभिन्न हिस्सा है।”

बेंच ने कहा कि डिक्री के क्रियान्वयन में तेजी और आपत्तिकर्ता को निष्पक्ष सुनवाई देने के अधिकार के बीच संतुलन जरूरी है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:

“किसी आपत्तिकर्ता को सुनवाई का उचित अवसर देने की आवश्यकता क्रियान्वयन कार्यवाही में टाली जा सकने वाली या अनिश्चित देरी को उचित नहीं ठहराती। इसी तरह, शीघ्र क्रियान्वयन के उद्देश्य से आपत्ति के निस्तारण के लिए निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।”

पहले आवेदन की अस्वीकृति से सभी कानूनी सवाल तय नहीं होते

सोसायटी को वर्ष 2012 में पक्षकार बनाए जाने का आवेदन खारिज होने के प्रभाव पर हाईकोर्ट ने कहा कि इसका परीक्षण क्रियान्वयन अदालत को करना होगा।

बेंच ने कहा:

“केवल इस तथ्य के आधार पर कि पहले पक्षकार बनाए जाने का आवेदन खारिज हो गया था, यह निर्धारित नहीं किया जा सकता कि रेस जुडिकाटा या कंस्ट्रक्टिव रेस जुडिकाटा का सिद्धांत लागू होता है या नहीं।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Rahul S. Shah vs. Jinendra Kumar Gandhi फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रक्रियागत देरी के कारण सफल वादी को डिक्री का लाभ मिलने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

तीन महीने में आपत्ति तय करने का निर्देश

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हाईकोर्ट ने मेरठ के अपर जिला न्यायाधीश, न्यायालय संख्या 18 को निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने से अधिमानतः तीन महीने के भीतर संबंधित पक्षों को सुनकर सोसायटी की आपत्ति का निस्तारण किया जाए।

इसके बाद क्रियान्वयन अदालत चाबियां जारी करने और कब्जा दिलाने संबंधी याचिकाकर्ता के आवेदन पर यथाशीघ्र निर्णय करेगी। अदालत को अनावश्यक स्थगन से बचने का भी निर्देश दिया गया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने सोसायटी की आपत्ति के गुण-दोष, वर्ष 2012 के आदेश के कानूनी प्रभाव या कब्जे पर पक्षकारों के अधिकारों के संबंध में कोई राय व्यक्त नहीं की है।

इन निर्देशों के साथ याचिका का बिना खर्च संबंधी आदेश के निस्तारण कर दिया गया।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Smt. Nirmala Devi (Since Deceased) vs. Punjab National Bank and 3 others

केस नंबर: Matters Under Article 227 No. 13174 of 2026

पीठ: जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव

फैसले की तारीख: 28 अक्टूबर 2026

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