सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के मियापुर गांव में लगभग 550 एकड़ सरकारी जमीन पर निजी पक्षकारों के मालिकाना हक के दावे खारिज कर दिए हैं। कोर्ट ने पाया कि दावेदारों ने जिन राजस्व रिकॉर्ड का सहारा लिया, उनमें दर्ज प्रविष्टियां फर्जी थीं और राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से धोखाधड़ी करके तैयार की गई थीं।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने स्पष्ट किया कि बिना वैध कानूनी प्रक्रिया के राजस्व रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज कर देने से उसे जमीन का मालिकाना हक नहीं मिल जाता।
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के 16 अप्रैल 2003 के फैसले को बरकरार रखते हुए निजी दावेदारों की अपीलें खारिज कर दीं। हाईकोर्ट ने उन्हें भूमि हड़पने वाला घोषित किया था और विवादित जमीन पर राज्य सरकार का स्वामित्व स्वीकार किया था।
क्या था 550 एकड़ जमीन का विवाद?
विवाद रंगारेड्डी जिले के सेरिलिंगमपल्ली मंडल स्थित मियापुर गांव के सर्वे नंबर 100 और 101 की 550 एकड़ 39 गुंटा जमीन से संबंधित था।
1912 के सर्वेक्षण के बाद इस जमीन को सरकारी पोरम्बोक (Sarkari Poramboke) के रूप में दर्ज किया गया था।
1927 में रीली आयोग ने मियापुर गांव को रफी-उन-निसा बेगम को वापस सौंपने की सिफारिश की थी। इसके बाद निजाम ने 1338 फसली में फरमान जारी किया, जिसके तहत उनकी अनुमति के बिना पैगाह संपत्तियों की बिक्री, गिरवी रखने या उपहार में देने पर रोक थी।
आंध्र प्रदेश (तेलंगाना क्षेत्र) जागीर उन्मूलन विनियमन, 1358 फसली के तहत 15 अगस्त 1949 से सभी जागीरें समाप्त कर दी गईं। 15 सितंबर 1949 से इन जमीनों का प्रशासन राज्य सरकार के अधीन आ गया।
रफी-उन-निसा बेगम के बेटे नवाब मोहम्मद खैसरुद्दीन खान को 1957 और 1958 में जागीर समाप्त होने के बदले मुआवजा दिया गया। बाद में उनके बेटे ने गांवों को मुक्त करने का अनुरोध किया, जिसे 30 मार्च 1995 को खारिज कर दिया गया।
इस बीच 1950 से 1953 के पहानी राजस्व रिकॉर्ड में रहीमुनिस्सा बेगम का नाम पट्टेदार के रूप में दर्ज हो गया। इसी आधार पर तहसीलदार ने सर्वे नंबर 100 की 140 एकड़ जमीन के हस्तांतरण की अनुमति दे दी।
तीन समूहों ने किया जमीन पर दावा
विवादित जमीन पर तीन अलग-अलग समूहों ने मालिकाना हक जताया।
पहले समूह ने नवाब मोहम्मद खैसरुद्दीन खान के माध्यम से अधिकार का दावा किया। दूसरे समूह ने अब्दुल सलाम की पत्नी रहीमुनिस्सा बेगम के माध्यम से और तीसरे समूह ने नवाब मोइनुद्दौला बहादुर की पत्नी रहीमुनिस्सा बेगम के माध्यम से स्वामित्व का दावा किया।
आंध्र प्रदेश भूमि हड़पना (निषेध) अधिनियम, 1982 के तहत गठित विशेष अदालत ने LGC संख्या 21 और 22/1994 में राज्य सरकार को पक्षकार बनाए बिना निर्णय दिया था।
हालांकि, LGC संख्या 110/1994, 131/1995 और 136/1995 में, जहां राज्य सरकार पक्षकार थी, विशेष अदालत ने जमीन को सरकारी संपत्ति माना।
हाईकोर्ट ने सरकारी स्वामित्व स्वीकार करने वाले निर्णय बरकरार रखे और अन्य दोनों मामलों के फैसले रद्द कर दिए।
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
खैसरुद्दीन खान के उत्तराधिकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उनका जागीरदार होना स्वीकार किया गया था। उन्होंने मौखिक उपहार और आंध्र प्रदेश विधानसभा की हाउस कमेटी की रिपोर्ट का भी सहारा लिया।
अब्दुल सलाम की पत्नी रहीमुनिस्सा बेगम के माध्यम से दावा करने वालों ने राजस्व रिकॉर्ड, जमीन के हस्तांतरण की सरकारी अनुमति और प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) का आधार लिया। उन्होंने पहली बार यह भी दावा किया कि जमीन नीलामी में खरीदी गई थी और वसीयत के माध्यम से रहीमुनिस्सा बेगम को मिली थी।
तीसरे समूह ने दावा किया कि विवादित जमीन नवाब मोइनुद्दौला बहादुर की पत्नी रहीमुनिस्सा बेगम की निजी संपत्ति थी।
तेलंगाना सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि जागीर उन्मूलन विनियमन के तहत जमीन का राज्य में निहित होना निर्विवाद था। मुआवजा प्राप्त करने के बाद जागीरदार के उत्तराधिकारी उस जमीन पर मालिकाना हक नहीं जता सकते थे।
जागीर का अधिकार जमीन के स्वामित्व के बराबर नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने जागीर की कानूनी प्रकृति स्पष्ट करते हुए कहा कि जागीर मूल रूप से जमीन से प्राप्त राजस्व संबंधी अधिकारों का अनुदान थी, न कि जमीन का मालिकाना हक।
बेंच ने कहा:
“इसलिए जागीर के अनुदान को संपत्ति के मालिकाना हक के अनुदान के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए।”
कोर्ट ने पाया कि अतियात कार्यवाही अंतिम रूप ले चुकी थी और खैसरुद्दीन खान के उत्तराधिकारियों को मुआवजा भी मिल चुका था। ऐसे में वे स्वामित्व का दावा करने से कानूनी रूप से बाधित थे।
बेंच ने कहा कि खैसरुद्दीन खान के बेटे के आवेदन को खारिज करने वाले आदेश को चुनौती नहीं दी गई थी और यह उनके दावे को समाप्त करने वाला निर्णायक तथ्य था।
बिना आदेश के राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज करना अवैध
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि रहीमुनिस्सा बेगम का नाम पट्टेदार के रूप में दर्ज करने के लिए न तो कोई हस्तांतरण आदेश था और न ही नामांतरण की वैध कार्यवाही हुई थी।
इसके अलावा फैसल पट्टी और पक्का बुक में भी संबंधित प्रविष्टियां मौजूद नहीं थीं।
बेंच ने कहा कि ऐसी प्रविष्टियां बिना अधिकार के की गई थीं और कानूनी रूप से शून्य थीं।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“किसी भी कार्यवाही के बिना केवल एक प्रविष्टि के माध्यम से किसी व्यक्ति का नाम पट्टेदार के रूप में दर्ज करने का बिल्कुल कोई अधिकार नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने तहसीलदार द्वारा जमीन के हस्तांतरण की अनुमति को भी कानूनी रूप से शून्य माना।
बेंच ने स्पष्ट किया कि विधानसभा की हाउस कमेटी की रिपोर्ट से किसी पक्षकार को संपत्ति संबंधी अधिकार प्राप्त नहीं होते।
कोर्ट ने पहली बार उठाए गए नीलामी और वसीयत के दावे की सत्यता पर संदेह जताते हुए उसे खारिज कर दिया। तीसरे समूह के ‘जात जागीर’ (Zat Jagir) संबंधी दावे को खारिज करने वाले हाईकोर्ट के निष्कर्ष को भी बरकरार रखा।
धोखाधड़ी से प्राप्त रिकॉर्ड किसी अधिकार का आधार नहीं बन सकते
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि राज्य सरकार में निहित मूल्यवान जमीन पर कब्जा जमाने के लिए धोखाधड़ी की गई।
बेंच ने कहा:
“धोखाधड़ी का कृत्य सभी औपचारिक कानूनी कार्यों को दूषित कर देता है। ये अपीलें राज्य में निहित जमीनों को हड़पने के लिए की गई धोखाधड़ी का स्पष्ट मामला प्रस्तुत करती हैं।”
कोर्ट ने निजी दावेदारों के पक्ष में न्यायसंगत आधारों पर राहत देने से भी इनकार कर दिया।
बेंच ने स्पष्ट किया कि LGC संख्या 21 और 22/1994 के फैसलों का राज्य सरकार के अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि उन मामलों में सरकार पक्षकार नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वह निजी दावेदारों के बीच आपसी स्वामित्व विवाद का निर्णय नहीं कर रहा है।
सभी अपीलें खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए सभी अपीलें खारिज कर दीं।
बेंच ने पक्षकार बनाए जाने और हस्तक्षेप की अनुमति मांगने वाले सभी आवेदन भी खारिज कर दिए। कोर्ट ने किसी पक्ष पर मुकदमे का खर्च नहीं लगाया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Bandari Ramchander & Ors. v. Maitri Coop. Housing Society Ltd. & Ors.
केस नंबर: Civil Appeal No. 10699 of 2013 and connected appeals
पीठ: जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा
फैसले की तारीख: 29 अक्टूबर 2026
