इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश में फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की कमी पर चिंता जताते हुए राज्य फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक से चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा कि प्रदेश के क्षेत्रफल और आबादी को देखते हुए मौजूदा फॉरेंसिक सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने अधिवक्ता पीयूष गुप्ता की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने संज्ञान लिया कि उत्तर प्रदेश में वर्तमान में केवल एक राज्य स्तरीय फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला और 12 क्षेत्रीय फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं हैं।
फॉरेंसिक रिपोर्ट के लिए समयसीमा तय करने की मांग
जनहित याचिका में राज्य सरकार को मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार कर अधिसूचित करने का निर्देश देने की मांग की गई है। इसके तहत प्रयोगशालाओं में नमूने प्राप्त होने से लेकर उनकी जांच और रिपोर्ट प्रस्तुत करने तक की अधिकतम समयसीमा निर्धारित करने का अनुरोध किया गया है।
याचिकाकर्ता ने न्यायिक हिरासत में बंद आरोपियों से जुड़े मामलों की फॉरेंसिक जांच को प्राथमिकता देने की भी मांग की है।
इसके अलावा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 193 के अंतर्गत आने वाले मामलों में समयबद्ध जांच प्रक्रिया सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया है। इस प्रावधान के तहत कुछ निर्धारित यौन अपराधों की जांच दो महीने के भीतर पूरी करना अनिवार्य है।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि निर्धारित समयसीमा से अधिक देरी होने पर प्रयोगशाला निदेशक को लिखित रूप में कारण दर्ज करने हों। साथ ही लंबित मामलों की नियमित समीक्षा के लिए एक नामित अधिकारी की व्यवस्था की जाए।
फॉरेंसिक रिपोर्ट में देरी से आपराधिक मुकदमों पर असर
याचिकाकर्ता का कहना है कि फॉरेंसिक रिपोर्ट मिलने में देरी से आपराधिक मुकदमों की सुनवाई प्रभावित हो सकती है, विशेषकर उन मामलों में जहां आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं।
याचिका के अनुसार, वैज्ञानिक साक्ष्य समय पर उपलब्ध नहीं होने से हत्या और दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों में अभियोजन की कार्रवाई प्रभावित हो सकती है। इससे पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय मिलने में भी अधिक समय लग सकता है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा दिए गए जवाब का भी हवाला दिया, जिसमें विभिन्न राज्यों में उपलब्ध फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं के आंकड़े प्रस्तुत किए गए थे।
हाईकोर्ट ने राज्य फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक को चार सप्ताह में विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर से शुरू होने वाले सप्ताह में होगी।
