सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सहकारी समिति का सदस्य सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) के तहत सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार के माध्यम से समिति के निर्माण समझौते और आम सभा की बैठक की कार्यवाही का रिकॉर्ड प्राप्त कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि किसी निजी संस्था से संबंधित ऐसी जानकारी भी RTI के दायरे में आती है, जिसे कोई सार्वजनिक प्राधिकरण अपनी वैधानिक शक्तियों के तहत प्राप्त कर सकता है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने मुप्पथाडम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की अपीलें खारिज करते हुए सहकारी समितियों के संयुक्त रजिस्ट्रार को दो सप्ताह के भीतर संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
क्या था मामला?
विवाद केरल के मुप्पथाडम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड से जुड़ा था।
बैंक के एक सदस्य ने सहकारी समितियों के संयुक्त रजिस्ट्रार (जनरल) के समक्ष RTI आवेदन दाखिल कर दो दस्तावेज मांगे थे।
पहला दस्तावेज बैंक और एक श्रमिक सहकारी समिति के बीच हुआ निर्माण समझौता था। इस श्रमिक सहकारी समिति को बैंक की इमारत बनाने का काम सौंपा गया था।
दूसरा दस्तावेज बैंक की पिछली आम सभा की बैठक की कार्यवाही का रिकॉर्ड था।
शुरुआत में सदस्य का आवेदन खारिज कर दिया गया। राज्य सूचना आयुक्त तक भी उसे राहत नहीं मिली।
हाईकोर्ट के सिंगल जज ने भी आवेदन खारिज किए जाने के फैसले को बरकरार रखा। हालांकि, डिवीजन बेंच ने मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया।
दूसरी बार मामले की सुनवाई में राज्य सूचना आयुक्त, हाईकोर्ट के सिंगल जज और डिवीजन बेंच, तीनों ने सदस्य के पक्ष में फैसला दिया और दस्तावेज प्राप्त करने के उसके अधिकार को स्वीकार किया।
इसके बाद बैंक ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
बैंक ने कहा—वह सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है
अपीलकर्ता बैंक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस.पी. चाली ने सुप्रीम कोर्ट के थलप्पलम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम केरल राज्य फैसले का हवाला दिया।
उन्होंने तर्क दिया कि सहकारी बैंक RTI अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है।
बैंक की ओर से कहा गया कि केरल सहकारी समिति अधिनियम, 1969 की धारा 65 और 66 के तहत रजिस्ट्रार को समिति के दस्तावेजों तक पहुंच तभी मिलती है, जब वह जांच करने के लिए अपनी संतुष्टि दर्ज करता है।
बैंक ने दावा किया कि मौजूदा मामले में ऐसी कोई संतुष्टि दर्ज नहीं की गई थी।
दूसरी ओर, राज्य सूचना आयुक्त की ओर से अधिवक्ता अभिलाष एम.आर. ने कहा कि यदि कानून रजिस्ट्रार को दस्तावेज प्राप्त करने का अधिकार देता है, तो किसी जांच का लंबित होना आवश्यक नहीं है।
उन्होंने तर्क दिया कि धारा 66 के तहत रजिस्ट्रार की निगरानी संबंधी शक्तियां दस्तावेजों तक पहुंच का स्वतंत्र आधार प्रदान करती हैं।
बैंक के सदस्य ने स्वयं उपस्थित होकर कहा कि धारा 66 में उपधारा (4A) और (11) जोड़ी गई हैं। इसलिए थलप्पलम मामले का फैसला मौजूदा विवाद पर लागू नहीं होता।
निजी संस्था की जानकारी भी RTI के दायरे में आ सकती है
सुप्रीम कोर्ट ने RTI अधिनियम की धारा 2(f) की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि सूचना की परिभाषा केवल उन दस्तावेजों तक सीमित नहीं है, जो किसी सार्वजनिक प्राधिकरण के पास भौतिक रूप से मौजूद हों।
कोर्ट ने कहा,
“इसलिए सूचना की परिभाषा में केवल वह सामग्री शामिल नहीं है, जो किसी सार्वजनिक प्राधिकरण के पास भौतिक रूप से उपलब्ध हो, बल्कि निजी संस्था से संबंधित वह सामग्री भी शामिल है, जिसे सार्वजनिक प्राधिकरण कानून द्वारा प्रदान की गई शक्तियों के आधार पर प्राप्त कर सकता है।”
बेंच ने कहा कि रजिस्ट्रार के पास कानून के तहत सहकारी समिति के दस्तावेज प्राप्त करने की शक्ति है। ऐसे में केवल इस आधार पर सूचना देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि संबंधित दस्तावेज किसी निजी सहकारी संस्था के पास हैं।
दस्तावेज देखने के लिए पहले जांच की संतुष्टि दर्ज करना जरूरी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने बैंक की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि रजिस्ट्रार को दस्तावेजों तक पहुंच प्राप्त करने से पहले जांच की आवश्यकता के संबंध में अपनी संतुष्टि दर्ज करनी होगी।
कोर्ट ने कहा कि केरल सहकारी समिति अधिनियम की धारा 65(2) रजिस्ट्रार को सभी उचित समय पर समिति की पुस्तकों और दस्तावेजों तक स्वतंत्र पहुंच प्रदान करती है।
बेंच ने स्पष्ट किया,
“इस प्रकार, केवल दस्तावेजों तक पहुंच को पहले से संतुष्टि दर्ज करने की शर्त से नहीं जोड़ा जा सकता, क्योंकि ऐसी पहुंच के बिना रजिस्ट्रार किसी निष्कर्ष पर पहुंचकर अपनी संतुष्टि दर्ज ही नहीं कर सकता।”
कोर्ट ने माना कि दस्तावेजों तक पहुंच और जांच शुरू करने के लिए संतुष्टि दर्ज करना अलग-अलग विषय हैं।
निर्माण समझौते और बैठक के रिकॉर्ड पर गोपनीयता की छूट लागू नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने RTI अधिनियम की धारा 8(1)(d) और 8(1)(j) के तहत सूचना देने से छूट के प्रावधानों की भी जांच की।
बेंच ने पाया कि मांगे गए दस्तावेजों में कोई व्यापारिक रहस्य, बौद्धिक संपदा या व्यावसायिक गोपनीयता से जुड़ी जानकारी नहीं थी।
कोर्ट ने कहा कि निर्माण कार्य के लिए बोली प्रक्रिया पहले ही समाप्त हो चुकी थी और ठेका भी दिया जा चुका था।
इसलिए निर्माण समझौते को व्यावसायिक गोपनीयता के आधार पर सूचना देने से छूट नहीं दी जा सकती।
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई ऐसा तीसरा व्यक्ति, जिसका समिति से कोई संबंध नहीं है, यही जानकारी मांगता तो स्थिति अलग हो सकती थी।
हालांकि, समिति के सदस्य के मामले में कोर्ट ने कहा,
“लेकिन समिति के किसी सदस्य को यह कहकर ऐसी जानकारी देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह समिति की निजी जानकारी है या उसका किसी सार्वजनिक गतिविधि अथवा सार्वजनिक हित से कोई संबंध नहीं है।”
थलप्पलम फैसले से भी रजिस्ट्रार की शक्तियां समाप्त नहीं होतीं
सुप्रीम कोर्ट ने थलप्पलम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक मामले के फैसले पर भी विचार किया।
बेंच ने कहा कि उस फैसले में भी रजिस्ट्रार की निगरानी में आने वाली सहकारी समितियों से जानकारी प्राप्त करने के उसके अधिकार को सुरक्षित रखा गया था।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि थलप्पलम मामले में मांगी गई जानकारी समिति के सदस्यों की बैंक जमा राशि से संबंधित थी, जो RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत छूट प्राप्त जानकारी थी।
इसके विपरीत, मौजूदा मामले में निर्माण समझौता और आम सभा की बैठक का रिकॉर्ड मांगा गया था।
इसलिए पहले के फैसले के आधार पर बैंक को जानकारी देने से छूट नहीं मिल सकती।
दो सप्ताह के भीतर दस्तावेज उपलब्ध कराने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का फैसला कानून और संबंधित न्यायिक फैसलों के अनुरूप था।
बेंच ने मुप्पथाडम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की दोनों अपीलें खारिज कर दीं।
सुप्रीम कोर्ट ने संयुक्त रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि वह बैंक से निर्माण समझौता और पिछली आम सभा की बैठक की कार्यवाही का रिकॉर्ड तत्काल मंगाए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी स्थिति में दोनों दस्तावेज दो सप्ताह के भीतर प्राप्त करके संबंधित सदस्य को उपलब्ध कराए जाएं।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: मुप्पथाडम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं अन्य
केस नंबर: सिविल अपील संख्या 13906/2026 और सिविल अपील संख्या 13907/2026
बेंच: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
फैसले की तारीख: 26 अक्टूबर 2026
