सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आयकर पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही में आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 143(2) के तहत नोटिस जारी करना अनिवार्य है। यदि नोटिस जारी ही नहीं किया गया, तो धारा 292BB के आधार पर इस कमी को दूर नहीं किया जा सकता, भले ही करदाता ने बिना आपत्ति उठाए पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही में भाग लिया हो।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने राजस्व विभाग की कई अपीलें खारिज करते हुए कहा कि धारा 148 के नोटिस के जवाब में करदाता अपनी मूल आयकर रिटर्न को ही जवाब मानने का अनुरोध करे, तब भी धारा 143(2) का नोटिस जारी करना जरूरी है।
क्या था मामला?
विवाद ओडिशा माइनिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड के आकलन वर्ष 2008-09, 2010-11 और 2011-12 तथा बिजॉय किशोर मोहंती के आकलन वर्ष 2009-10 और 2010-11 से संबंधित था।
इन मामलों में मूल आयकर रिटर्न का आकलन धारा 143(3) के तहत किया जा चुका था। बाद में राजस्व विभाग ने धारा 147 के तहत पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही शुरू की और धारा 148 के नोटिस जारी किए।
ओडिशा माइनिंग कॉर्पोरेशन ने अनुरोध किया कि उसकी पहले दाखिल रिटर्न को ही धारा 148 के नोटिस का जवाब माना जाए। वहीं, मोहंती ने वही रिटर्न दोबारा दाखिल की।
यह निर्विवाद था कि किसी भी मामले में धारा 143(2) का नोटिस जारी नहीं किया गया। हालांकि, विभाग ने धारा 142(1) के तहत दस्तावेज और स्टॉक संबंधी जानकारी मांगते हुए पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही जारी रखी।
आयकर आयुक्त (अपील) ने यह कहते हुए करदाताओं की आपत्ति खारिज कर दी कि उन्होंने कार्यवाही में भाग लिया था।
इसके विपरीत, आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) ने धारा 143(2) का नोटिस जारी नहीं होने के कारण पुनर्मूल्यांकन आदेश रद्द कर दिए। हाईकोर्ट ने भी अधिकरण के फैसले को बरकरार रखा।
इसके बाद राजस्व विभाग सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। विभाग का तर्क था कि नोटिस जारी करना आवश्यक नहीं था और इसकी अनुपस्थिति से कार्यवाही अवैध नहीं होती। विभाग ने धारा 292BB का भी सहारा लिया।
धारा 143(2) का नोटिस पुनर्मूल्यांकन के लिए अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने Assistant Commissioner of Income Tax v. Hotel Blue Moon के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि धारा 147 के तहत पुनर्मूल्यांकन के लिए धारा 143(2) का नोटिस अनिवार्य शर्त है।
बेंच ने कहा कि नोटिस जारी नहीं करना केवल ऐसी प्रक्रियागत अनियमितता नहीं है, जिसे बाद में ठीक किया जा सके।
धारा 292BB कब लागू होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 292BB के तहत केवल नोटिस की तामील, समय पर तामील या सही तरीके से तामील से संबंधित आपत्तियों पर रोक लगती है।
यह प्रावधान उस स्थिति में लागू नहीं होता, जब नोटिस जारी ही नहीं किया गया हो।
कोर्ट ने कहा:
“ऐसी कानूनी परिकल्पना तभी लागू हो सकती है, जब राजस्व विभाग की ओर से नोटिस भेजे जाने का दावा किया गया हो।”
बेंच ने कहा कि जब विभाग स्वयं स्वीकार करता है कि कोई नोटिस नहीं भेजा गया, तो धारा 292BB का सहारा नहीं लिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“अधिनियम की धारा 143(2) के तहत नोटिस के अभाव में करदाता के केवल आकलन कार्यवाही में भाग लेने से आकलन अधिकारी को अधिनियम की धारा 143(3) के तहत आकलन करने का अधिकार क्षेत्र प्राप्त नहीं हो जाता।”
कोर्ट ने Commissioner of Income Tax v. Laxman Das Khandelwal के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 292BB नोटिस की पूर्ण अनुपस्थिति को वैध नहीं बना सकती।
पुरानी रिटर्न को ही जवाब मानने पर भी नोटिस जरूरी
बेंच ने कहा कि धारा 148 के नोटिस के जवाब में करदाता नई रिटर्न दाखिल कर सकता है या पहले दाखिल रिटर्न को ही अपना जवाब मानने का अनुरोध कर सकता है।
दोनों स्थितियों में राजस्व विभाग धारा 143(2) के तहत नोटिस जारी करने की अनिवार्य जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 142(1) के तहत भेजे गए पत्रों को भी धारा 143(2) के नोटिस का विकल्प मानने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा:
“कार्यवाही शुरू होने के बाद जारी किया गया पत्र कार्यवाही में मौजूद कमी को दूर नहीं कर सकता और ऐसी कार्यवाही को वैध नहीं बना सकता, जिसका कानून की नजर में कोई अस्तित्व ही नहीं है।”
राजस्व विभाग की सभी अपीलें खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आयकर अपीलीय अधिकरण के फैसले में कोई त्रुटि नहीं थी और हाईकोर्ट ने उसे सही तरीके से बरकरार रखा था।
बेंच ने अपने सामने उठाए गए तीनों कानूनी प्रश्नों का निर्णय राजस्व विभाग के खिलाफ करते हुए सभी अपीलें खारिज कर दीं।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Principal Commissioner of Income Tax, Bhubaneshwar v. Orissa Mining Corporation Ltd.
केस नंबर: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 14546 of 2023 and connected appeals
पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा
फैसले की तारीख: 28 अक्टूबर 2026
