दिल्ली हाईकोर्ट ने रेप पीड़िता 17 वर्षीय नाबालिग को 29 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था में चिकित्सकीय गर्भपात कराने की अनुमति दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम, 1971 के तहत निर्धारित 24 सप्ताह की सीमा के आधार पर ही ऐसे मामलों का फैसला नहीं किया जा सकता। गर्भवती महिला की उम्र, गर्भधारण की परिस्थितियों, मेडिकल रिपोर्ट और उसके अधिकारों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर ने नाबालिग की दादी के माध्यम से दाखिल रिट याचिका स्वीकार करते हुए गर्भपात की अनुमति दी। कोर्ट ने माना कि मेडिकल बोर्ड की सकारात्मक रिपोर्ट और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए गर्भपात की अनुमति देना नाबालिग के सर्वोत्तम हित में है।
हाईकोर्ट ने अस्पताल को प्रक्रिया के दौरान आवश्यक चिकित्सकीय सावधानियां बरतने, भ्रूण के ऊतकों को DNA जांच के लिए सुरक्षित रखने और पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखने के निर्देश भी दिए।
रेप के कारण गर्भवती हुई थी 17 वर्षीय नाबालिग
मामले में लगभग 17 वर्षीय नाबालिग की ओर से उसकी दादी ने संविधान के अनुच्छेद 226 और 21 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के तहत याचिका दाखिल की थी।
याचिका में MTP अधिनियम की धारा 3(2) के तहत गर्भपात की अनुमति देने की मांग की गई थी।
कोर्ट को बताया गया कि नाबालिग रेप के कारण गर्भवती हुई थी और इस संबंध में पहले ही FIR दर्ज की जा चुकी है।
गर्भावस्था 29 सप्ताह से अधिक की हो चुकी थी, जबकि MTP अधिनियम के तहत सामान्य वैधानिक सीमा 24 सप्ताह है। इसी कारण गर्भपात के लिए हाईकोर्ट का हस्तक्षेप मांगा गया।
नाबालिग को गर्भावस्था की देखभाल और चिकित्सकीय निगरानी के लिए नई दिल्ली के दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
गर्भावस्था जारी रहने से गंभीर मानसिक आघात की आशंका जताई
याचिकाकर्ता की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी (DHCLSC) के अधिवक्ता अन्वेष मधुकर ने अधिवक्ता प्राची निर्वाण, प्रांजल शेखर और दीप्तश्री बाग के साथ पक्ष रखा।
उन्होंने कहा कि नाबालिग और उसकी दादी, दोनों गर्भपात कराना चाहती हैं।
अधिवक्ताओं ने दलील दी कि पीड़िता की कम उम्र और गर्भधारण की परिस्थितियों को देखते हुए उसे गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना गंभीर मानसिक पीड़ा और मनोवैज्ञानिक आघात का कारण बन सकता है।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हवाला देते हुए गर्भपात की अनुमति देने का अनुरोध किया।
सुनवाई के दौरान पक्षकारों ने अस्पताल में गठित मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट भी अदालत के समक्ष रखी।
रिपोर्ट में नाबालिग को गर्भपात की प्रक्रिया के लिए चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त पाया गया था।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त स्थायी अधिवक्ता अमोल सिन्हा ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और मौजूदा कानूनी स्थिति को देखते हुए अदालत उचित निर्देश जारी कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला, संवैधानिक अदालतें 24 सप्ताह की सीमा से बाध्य नहीं
दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के S vs. The Union of India & Ors. (2026 INSC 446) फैसले का उल्लेख किया, जिसमें 28 सप्ताह की गर्भावस्था में गर्भपात की अनुमति दी गई थी।
उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 226 या अनुच्छेद 32 के तहत अधिकारों का प्रयोग करने वाली संवैधानिक अदालतें MTP अधिनियम की वैधानिक समय-सीमा से बाध्य नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का उल्लेख किया:
“किसी भी अदालत को किसी महिला, और विशेष रूप से किसी नाबालिग बच्ची को, उसकी स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था पूरी अवधि तक जारी रखने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था:
“किसी कानून के तहत उपचार उपलब्ध न होने का अर्थ यह नहीं है कि संवैधानिक उपचार का रास्ता बंद हो जाता है।”
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि गर्भपात से जुड़े मामलों में महिला के संवैधानिक अधिकारों और उसकी परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
26 से 33 सप्ताह की गर्भावस्था में गर्भपात की अनुमति वाले फैसलों का भी उल्लेख
जस्टिस शंकर ने अन्य न्यायिक फैसलों पर भी विचार किया, जिनमें वैधानिक समय-सीमा से अधिक गर्भावस्था होने के बावजूद गर्भपात की अनुमति दी गई थी।
कोर्ट ने Venkatalakshmi vs. The State of Karnataka & Ors. मामले का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 26 सप्ताह की गर्भावस्था में गर्भपात की अनुमति दी थी।
इसके अलावा Minor R Thr. Mother H vs. State NCT of Delhi & Anr. मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की समकक्ष पीठ ने 24 सप्ताह और पांच दिन की गर्भावस्था में गर्भपात की अनुमति दी थी।
हाईकोर्ट ने Minor S (Thr. Father B) vs. State & Anr., Minor S through her guardian B vs. State Government of NCT of Delhi और Mrs. X Versus GNCTD & Anr. मामलों का भी उल्लेख किया।
इन मामलों में समकक्ष पीठों ने क्रमशः 27 सप्ताह से अधिक, 30 सप्ताह से अधिक और 33 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था में गर्भपात की अनुमति दी थी।
हर मामले की परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए फैसला: हाईकोर्ट
इन न्यायिक फैसलों के आधार पर जस्टिस शंकर ने स्पष्ट किया कि गर्भपात की अनुमति का प्रश्न केवल गर्भावस्था की अवधि तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
कोर्ट ने कहा:
“गर्भावस्था के चिकित्सकीय समापन का प्रश्न केवल 24 सप्ताह की वैधानिक अवधि के आधार पर निर्धारित या सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के संदर्भ में इसकी जांच की जानी चाहिए। इसमें गर्भवती महिला की उम्र, गर्भधारण का कारण, रिकॉर्ड पर उपलब्ध चिकित्सकीय राय तथा गर्भवती महिला के अधिकार और हित शामिल हैं।”
हाईकोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की उस राय पर भी ध्यान दिया, जिसमें कहा गया था:
“नाबालिग वी गर्भपात कराने के लिए चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक रूप से उपयुक्त है।”
मेडिकल रिपोर्ट और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने गर्भपात की अनुमति दे दी।
अस्पताल को DNA साक्ष्य सुरक्षित रखने और सभी खर्च सरकार से वहन कराने का निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने नाबालिग के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए गर्भपात की अनुमति के साथ कई निर्देश जारी किए।
कोर्ट ने कहा कि गर्भपात की प्रक्रिया योग्य डॉक्टरों की टीम द्वारा MTP अधिनियम और उससे संबंधित नियमों, विनियमों तथा दिशानिर्देशों के अनुसार पूरी की जाएगी।
मेडिकल बोर्ड को पूरी प्रक्रिया का विस्तृत रिकॉर्ड सुरक्षित रखना होगा।
अस्पताल को निर्देश दिया गया कि वह भ्रूण के ऊतकों को DNA जांच के लिए संरक्षित रखे, ताकि उनका इस्तेमाल दर्ज आपराधिक मामले की जांच में किया जा सके।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गर्भपात, अस्पताल में भर्ती रहने और ऑपरेशन के बाद की देखभाल का पूरा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी।
बच्चा जीवित पैदा होने पर चिकित्सा सहायता और देखभाल सुनिश्चित करने का आदेश
हाईकोर्ट ने उस स्थिति के लिए भी निर्देश जारी किए, जिसमें गर्भपात की प्रक्रिया के दौरान बच्चा जीवित पैदा हो सकता है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट और संबंधित सरकारी अधिकारियों को बच्चे के लिए आवश्यक चिकित्सा सहायता तथा हर संभव देखभाल सुनिश्चित करनी होगी।
बच्चे को इनक्यूबेटर में रखा जाएगा और संबंधित बाल कल्याण समिति (CWC) को इसकी सूचना दी जाएगी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि नाबालिग और उसके परिवार की इच्छा के अनुरूप निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए बच्चे को गोद देने की व्यवस्था की जा सकती है।
नाबालिग पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखने का निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने पीड़िता की पहचान की सुरक्षा पर विशेष जोर दिया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि नाबालिग का नाम, पता, तस्वीरें, मेडिकल रिकॉर्ड या ऐसी कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी, जिससे उसकी पहचान उजागर हो सकती है।
ऐसी जानकारी केवल कानून द्वारा अधिकृत या आवश्यक परिस्थितियों में ही साझा की जा सकेगी।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति तत्काल संबंधित पुलिस अधिकारियों को भेजने और अस्पताल के चिकित्सा अधिकारियों तक पहुंचाने का निर्देश दिया।
इन निर्देशों के साथ कोर्ट ने नाबालिग की याचिका का निपटारा कर दिया।
केस डिटेल्स
केस का नाम: Minor V Thr Grand Mother M vs. The State of NCT of Delhi and Anr.
केस नंबर: W.P.(CRL) 3348/2026
पीठ: जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर
फैसले की तारीख: 24 अक्टूबर 2026
उद्धरणों को अधिक सावधानी से प्रस्तुत करेंलंबे कानूनी हिस्से को संक्षिप्त करें
