जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि दो बालिग व्यक्तियों को अपनी पसंद से शादी करने के लिए परिवार, समुदाय या समाज की सहमति लेने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जीवनसाथी चुनने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत संरक्षित है और परिवार की प्रतिष्ठा या सामाजिक मान्यताओं के आधार पर इस अधिकार में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
जस्टिस शहजाद अजीम ने 23 अक्टूबर को दिए आदेश में अपने परिवार वालों से खतरे की आशंका जताने वाले एक विवाहित जोड़े को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि दो बालिग व्यक्तियों की आपसी सहमति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
परिवार की प्रतिष्ठा से ऊपर है जीवनसाथी चुनने का अधिकार
हाईकोर्ट ने कहा कि जब दो बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से एक-दूसरे को जीवनसाथी चुनते हैं, तो यह उनके संवैधानिक अधिकार का प्रयोग है। इस फैसले के लिए परिवार, समुदाय या किसी समूह की अनुमति आवश्यक नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि इस अधिकार को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है और इसे परिवार की प्रतिष्ठा या सामूहिक सोच के नाम पर सीमित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अजीम ने टिप्पणी की कि जहां व्यक्ति की पसंद की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है, वहां गरिमा की कल्पना नहीं की जा सकती। किसी को भी दो बालिग व्यक्तियों के स्वतंत्र निर्णय को पूरा होने से रोकने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति को अपनी पसंद व्यक्त करने से रोका जाता है, तो उसकी गरिमा को पूर्ण रूप से सुरक्षित मानना बेहद कठिन होगा।
हाईकोर्ट के अनुसार, जब दो बालिग अपनी इच्छा से शादी करते हैं, तो उन्हें अपना जीवन और संबंध तय करने का अधिकार है। इस अधिकार का उल्लंघन संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
परिवार वालों से हिंसा और उत्पीड़न की आशंका
मामले में एक पुरुष और महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अपनी जान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की थी।
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उन्होंने 8 मार्च 2024 को हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार अपनी मर्जी से शादी की थी। इसके बाद से दोनों पति-पत्नी के रूप में साथ रह रहे हैं।
हालांकि, उनके परिवार वाले इस शादी के खिलाफ थे। याचिकाकर्ताओं को आशंका थी कि रिश्तेदार, जिनमें याचिका में प्रतिवादी बनाए गए कुछ लोग भी शामिल थे, उनके साथ मारपीट या उत्पीड़न कर सकते हैं।
इसी आधार पर उन्होंने जम्मू-कश्मीर प्रशासन और अन्य संबंधित अधिकारियों से सुरक्षा दिलाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
दस्तावेजों से दोनों के बालिग होने की पुष्टि
हाईकोर्ट ने याचिका के साथ प्रस्तुत आधार कार्ड और जम्मू-कश्मीर बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन की दसवीं कक्षा की मार्कशीट सहित अन्य दस्तावेजों की जांच की।
इन दस्तावेजों के अनुसार, महिला की जन्मतिथि 26 मार्च 1998 थी और उसकी उम्र 28 वर्ष थी। वहीं, पुरुष की जन्मतिथि 10 अक्टूबर 1992 थी और उसकी उम्र 34 वर्ष थी।
दस्तावेजों से संकेत मिला कि दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि उनकी शादी 8 मार्च 2024 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी।
सुरक्षा देने का निर्देश, शादी की वैधता की जांच जरूरी
हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए संबंधित अधिकारियों को जोड़े की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को बालिग व्यक्तियों की पसंद से शादी करने और परिवार या समुदाय के हस्तक्षेप से सुरक्षा के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों में निर्धारित सिद्धांतों का पालन करना होगा।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा संबंधी निर्देश लागू करने से पहले अधिकारियों को यह सत्यापित करना होगा कि दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं और उनकी शादी लागू कानूनों के अनुसार हुई है।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस आदेश को शादी की वैधता की न्यायिक पुष्टि या दोनों व्यक्तियों की शादी करने की कानूनी पात्रता का अंतिम निर्धारण नहीं माना जाएगा।
इसके अलावा, यदि किसी याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज है, तो पुलिस नियमानुसार जांच जारी रख सकती है।
जस्टिस अजीम ने कहा कि संवैधानिक अदालतों का दायित्व व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना है, क्योंकि गरिमापूर्ण जीवन व्यक्ति की स्वतंत्रता से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। कोर्ट ने जोर दिया कि गरिमा और पसंद की स्वतंत्रता के बिना जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संवैधानिक संरक्षण अपना वास्तविक अर्थ खो देता है।
