राजस्थान हाईकोर्ट ने बच्चे के जन्म के दो महीने के भीतर एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका का दूसरे जिले में तबादला किए जाने पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि स्तनपान और मां की देखभाल पाना शिशु का अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का हिस्सा है। प्रशासनिक जरूरतों के आधार पर इस अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती।
जस्टिस अनूप कुमार धंड ने 29 सितंबर 2026 के आदेश में शिक्षिका को छह सप्ताह तक उसके वर्तमान कार्यस्थल पर बने रहने की अनुमति दी। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को उसके आवेदन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का निर्देश दिया। साथ ही राजस्थान सरकार को हाल ही में मां बनी सरकारी महिला कर्मचारियों के तबादलों के लिए उचित नीति तैयार करने को कहा।
शिशु के हित प्रशासनिक जरूरतों से अधिक महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारियों के तबादले में प्रशासनिक जरूरतों का महत्व है, लेकिन इन्हें हर परिस्थिति में अंतिम आधार नहीं माना जा सकता। विशेष रूप से तब, जब तबादले से नवजात शिशु की देखभाल और स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ने की आशंका हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व का अधिकार, स्तनपान कराने का अधिकार और शिशु का स्तनपान एवं पालन-पोषण पाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का हिस्सा हैं।
कोर्ट ने कहा कि दो महीने के शिशु को दूर स्थान पर तबादले के कारण उसकी मां से अलग करना मां और बच्चे, दोनों के इन महत्वपूर्ण अधिकारों से वंचित करने के समान होगा। इससे बच्चे को मानसिक आघात, असुरक्षा, कुपोषण और स्वास्थ्य संबंधी खतरे हो सकते हैं, जिनकी भरपाई किसी भी तरह नहीं की जा सकती।
जस्टिस धंड ने कहा कि शिशु में विश्वास, स्नेह, रोग प्रतिरोधक क्षमता और व्यक्तित्व के विकास के लिए मां की निरंतर उपस्थिति आवश्यक है।
कोर्ट के अनुसार, बच्चे के जन्म के महज दो महीने बाद मां का तबादला करना मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 में वर्ष 2017 में किए गए संशोधन, चाइल्ड केयर लीव संबंधी नियमों और बाल अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन की मूल भावना के खिलाफ होगा।
प्रसव के दो महीने के भीतर कर दिया गया तबादला
याचिकाकर्ता राजस्थान के गंगापुर सिटी स्थित एक सरकारी स्कूल में वरिष्ठ शिक्षिका के पद पर कार्यरत थी।
उसने 13 मई 2026 को बच्चे को जन्म दिया था। इसके बाद शिक्षा विभाग ने 7 जुलाई 2026 को उसका तबादला करौली जिले के मासलपुर स्थित एक सरकारी स्कूल में कर दिया।
शिक्षिका ने तबादला आदेश को चुनौती देते हुए राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण का रुख किया और आदेश पर रोक लगाने तथा उसे रद्द करने की मांग की। हालांकि, अधिकरण ने 15 सितंबर को उसकी अपील खारिज कर दी।
इसके बाद शिक्षिका ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
पहले बच्चे की हो चुकी थी मौत, मातृत्व अवकाश भी नहीं मिला
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संस्कृति गौतम ने कोर्ट को बताया कि नवजात बच्चा स्तनपान के लिए पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर है। बच्चा गहन देखभाल में है और उसे लगातार मां की देखभाल एवं ध्यान की जरूरत है।
उन्होंने यह भी बताया कि शिक्षिका को तकनीकी आधार पर मातृत्व अवकाश देने से इनकार कर दिया गया था, क्योंकि वह वर्ष 2020 में दो अवसरों पर पहले ही मातृत्व अवकाश ले चुकी थी।
अधिवक्ता ने बताया कि वर्ष 2020 में शिक्षिका ने अपने पहले बच्चे को जन्म दिया था, लेकिन जन्म के कुछ समय बाद ही उसकी मृत्यु हो गई थी। इसके बावजूद हालिया प्रसव के बाद उसे इस आधार पर मातृत्व अवकाश नहीं दिया गया कि वह पहले इस सुविधा का लाभ ले चुकी है।
मानवीय सिद्धांतों और अनुच्छेद 21 के खिलाफ पाया तबादला
हाईकोर्ट ने पाया कि अधिकारियों को शिक्षिका के हालिया प्रसव और नवजात बच्चे की जरूरतों की जानकारी होने के बावजूद उसका दूर स्थान पर तबादला कर दिया गया।
कोर्ट ने इसे राज्य सरकार की तबादला नीति के साथ-साथ मानवीय सिद्धांतों और संविधान के अनुच्छेद 21 के खिलाफ माना।
जस्टिस धंड ने कहा कि सेवा की जरूरतों को हर परिस्थिति में तबादले का बचाव करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कानून ऐसी परिस्थितियों में अपवाद की गुंजाइश देता है, जहां तबादले से अत्यधिक कठिनाई पैदा होती हो, विशेषकर जब मामला शिशु की गंभीर चिकित्सकीय जरूरतों से जुड़ा हो।
कोर्ट ने कहा कि बच्चे के स्वस्थ विकास के लिए मां का प्रेम और स्नेह अत्यंत आवश्यक है, खासकर शैशवावस्था में।
हाईकोर्ट ने बच्चे की शारीरिक, भावनात्मक और पोषण संबंधी जरूरतों के साथ मां और शिशु के बीच गहरे भावनात्मक संबंध को भी महत्वपूर्ण माना।
कोर्ट ने मातृत्व को सभी सभ्यताओं की जननी बताते हुए कहा कि कोई भी सभ्यता मां की शक्ति को स्वीकार किए बिना आगे नहीं बढ़ सकती।
छह सप्ताह तक तबादले पर रोक, सरकार को नीति बनाने का निर्देश
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर निर्णय होने तक 7 जुलाई 2026 के तबादला आदेश के प्रभाव और क्रियान्वयन पर छह सप्ताह के लिए रोक रहेगी। इस अवधि में शिक्षिका अपने वर्तमान कार्यस्थल पर काम करती रहेगी।
कोर्ट ने अधिकारियों से कहा कि वे शिक्षिका के मामले पर यांत्रिक तरीके से निर्णय लेने के बजाय सहानुभूतिपूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं।
इसके अलावा, राजस्थान सरकार को हाल ही में बच्चों को जन्म देने वाली सरकारी महिला कर्मचारियों के तबादलों के संबंध में उचित नीति तैयार करने का निर्देश दिया गया।
हाईकोर्ट ने आदेश की प्रति केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय तथा राजस्थान सरकार के विधि एवं विधिक कार्य विभाग को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजने का भी निर्देश दिया।
इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका और स्थगन आवेदन का निस्तारण कर दिया।
