वैवाहिक विवादों में बिना किसी ठोस तथ्य या विशिष्ट भूमिका के लगाए गए सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर ससुराल पक्ष के लोगों को आपराधिक मुकदमे की जटिलताओं में नहीं घसीटा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने यह स्पष्ट करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को आंशिक रूप से खारिज कर दिया। कोर्ट ने एक महिला के सास-ससुर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498A, 406, 506 और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 व 4 के तहत दर्ज आपराधिक मामले को पूरी तरह रद्द करने का निर्णय दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला शिकायतकर्ता महिला के सास और ससुर (अपीलकर्ताओं) से जुड़ा है। महिला का विवाह अपीलकर्ताओं के बेटे के साथ 1 फरवरी 2021 को दार्जिलिंग में हिंदू रीति-रिवाज से संपन्न हुआ था। शुरुआत में दंपति दूसरे शहर में रहते थे, लेकिन पति के सिलीगुड़ी ट्रांसफर होने के बाद महिला अपने सास-ससुर के साथ रहने लगी। 17 जुलाई 2023 को दंपति के यहाँ एक बच्ची का जन्म हुआ।
पारिवारिक विवाद और कथित प्रताड़ना के बाद महिला ने ससुराल छोड़ दिया। इसके बाद 21 नवंबर 2023 को सिलीगुड़ी महिला थाने में एफआईआर संख्या 152/2023 दर्ज कराई गई। शिकायत में पति के अलावा सास-ससुर को भी नामजद किया गया। महिला ने आरोप लगाया कि शादी के बाद उसे तानों का सामना करना पड़ा और 5 लाख रुपये नकद व चार पहिया वाहन की मांग की गई (जिसके एवज में कथित तौर पर फर्नीचर दिया गया था)। उसने यह भी आरोप लगाया कि गर्भावस्था के दौरान उसे उचित पोषण और चिकित्सकीय देखभाल नहीं दी गई और बेटी के जन्म पर ताने मारे गए।
शिकायत में यह भी कहा गया कि 11 नवंबर 2023 को ससुर और पति उसके मायके आए और जबरन दबाव डालकर एक रसीद पर हस्ताक्षर करवाए, जिसमें यह लिखा था कि उसने अपना सारा स्त्रीधन और कीमती सामान वापस ले लिया है।
पुलिस जांच में महिला के माता-पिता के बयान दर्ज किए गए और 21 दिसंबर 2023 को आईपीसी की धारा 498A, 406, 506, 323 और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 व 4 के तहत चार्जशीट संख्या 175/2023 दाखिल की गई। सास-ससुर ने इस चार्जशीट को रद्द कराने के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट (जलपाईगुड़ी सर्किट) में धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका लगाई। हाईकोर्ट ने 12 नवंबर 2024 को केवल धारा 323 आईपीसी के तहत आरोप को रद्द किया और बाकी सभी धाराओं में ट्रायल का सामना करने का निर्देश दिया। इसके बाद सास-ससुर ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (सास-ससुर) की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने केवल धारा 323 आईपीसी को रद्द करके भूल की है। उन्होंने कहा कि यह मूल रूप से पति-पत्नी के बीच का विवाद है, जिसमें सास-ससुर को केवल रिश्तेदारी की वजह से घसीटा गया है। यह भी कहा गया कि पति की अलग शहर में नौकरी के कारण वे कभी-कभार ही साथ रहते थे। मायके में जबरन हस्ताक्षर कराने के आरोप पर कोई शारीरिक चोट या नुकसान का साक्ष्य नहीं मिला। इसके अलावा, कथित हस्ताक्षर की घटना (11 नवंबर) और एफआईआर (21 नवंबर) के बीच 10 दिनों की देरी का कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया गया।
दूसरी तरफ, राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि शिकायत में दहेज की मांग और क्रूरता का साफ जिक्र है। आरोप सही हैं या गलत, और पर्याप्त सबूत हैं या नहीं—यह ट्रायल कोर्ट में तय होना चाहिए, न कि धारा 482 सीआरपीसी के तहत।
शिकायतकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट इस स्तर पर साक्ष्यों की सत्यता की जांच नहीं कर सकता। धारा 498A के तहत मानसिक क्रूरता भी शामिल है, जिसका मेडिकल सबूत होना जरूरी नहीं है। सिर्फ मेडिकल साक्ष्य न होने से आरोप झूठे साबित नहीं हो जाते।
अदालत का विश्लेषण और कानूनी मिसालें
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत एफआईआर रद्द करने के सिद्धांतों के लिए स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल (1992) के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि व्यापक सिद्धांतों के साथ-साथ पारिवारिक विवादों से उपजे मामलों की विशेष प्रकृति को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
पीठ ने आरती मेहता बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के फैसले का हवाला देते हुए कहा:
“अदालत को इस बात की बारीकी से जांच करनी चाहिए कि क्या आरोप वास्तविक, विशिष्ट और बुनियादी तथ्यों पर आधारित हैं, या फिर वे केवल वैवाहिक कटुता का नतीजा हैं जिसके तहत परिवार के सभी सदस्यों को बेवजह लपेटा जा रहा है। विशिष्ट आरोपों और प्रथम दृष्टया सामग्री के अभाव में, ऐसे रिश्तेदारों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।”
इसके साथ ही कोर्ट ने पारिवारिक रिश्तों पर आपराधिक मुकदमों के असर को लेकर गेडडम झांसी बनाम तेलंगाना राज्य (2025) के फैसले का जिक्र करते हुए टिप्पणी की:
“विशिष्ट आरोपों और विश्वसनीय सामग्रियों के बिना घरेलू विवादों को आपराधिक रंग देना परिवार जैसी संस्था के लिए विनाशकारी हो सकता है, जिसकी नींव प्रेम, स्नेह, सौहार्द और आपसी विश्वास पर टिकी होती है।”
पीठ ने दर्ज धाराओं के आधार पर उपलब्ध सामग्रियों की समीक्षा की:
- धारा 498A आईपीसी (क्रूरता): कोर्ट ने पाया कि न तो शिकायत में और न ही पुलिस जांच में ऐसा कोई साक्ष्य है जिससे यह साबित हो कि सास-ससुर ने महिला के जीवन, अंग या मानसिक/शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाया हो या संपत्ति की मांग के लिए उसे प्रताड़ित किया हो।
- दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 व 4: पैसों और गाड़ी की मांग के आरोप तो लगाए गए, लेकिन तारीख, समय, घटना या किसी स्वतंत्र गवाह का कोई ब्योरा जांच में सामने नहीं आया।
- धारा 406 आईपीसी (आपराधिक अमानत में खयानत): आईपीसी की धारा 405 के तहत संपत्ति सौंपने और उसके बेईमानी से गबन का ठोस आधार होना चाहिए। यहाँ सास-ससुर को कौन-सी संपत्ति सौंपी गई थी और उसका क्या दुरुपयोग हुआ, इसका कोई विवरण नहीं है।
- धारा 506 आईपीसी (आपराधिक धमकी): धारा 503 के तहत धमकी के आवश्यक तत्व साबित नहीं होते। जबरन हस्ताक्षर कराने का आरोप सिर्फ महिला और उसके माता-पिता के बयानों तक सीमित है, रिकॉर्ड पर कोई अन्य स्वतंत्र साक्ष्य मौजूद नहीं है।
अदालत ने कहा:
“मौखिक आरोपों के समर्थन में कोई सामग्री या गवाह मौजूद नहीं है, जिससे अपीलकर्ताओं के खिलाफ कानूनी कार्यवाही जारी रखने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि शिकायत और जांच सामग्री अपीलकर्ताओं पर आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। आरोप पूरी तरह सामान्य और असमर्थित हैं, इसलिए हाईकोर्ट को इनके खिलाफ पूरी कार्यवाही रद्द कर देनी चाहिए थी।
अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के 12 नवंबर 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत धारा 498A, 406, 506 आईपीसी और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 व 4 के तहत राहत देने से इनकार किया गया था। सिलीगुड़ी महिला थाने की एफआईआर संख्या 152/2023 से जुड़ी सास-ससुर के खिलाफ सभी कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया गया।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी केवल सास-ससुर के खिलाफ मामले की स्थिरता तक सीमित है। इसका पति के खिलाफ मामले के गुण-दोष या पक्षों के बीच चलने वाले किसी अन्य दीवानी विवाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: प्रशांत कुमार धर एवं अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या… वर्ष 2026 (विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) संख्या 16908/2024 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
निर्णय की तिथि: 5 अक्टूबर 2026

