सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट संकेत दिया कि वह विधायकों के विशेषाधिकारों और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच टकराव से जुड़े दो दशक पुराने मामले में किसी सैद्धांतिक या अकादमिक बहस में नहीं पड़ेगा। तमिलनाडु विधानसभा की ओर से शीर्ष अदालत को अवगत कराया गया कि जिस विवादित प्रस्ताव को लेकर यह कानूनी विवाद खड़ा हुआ था, उसे राज्य विधानसभा ने 2004 में ही वापस ले लिया था।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने विधानसभा के वकील को निर्देश दिया कि वे इस प्रस्ताव को वापस लिए जाने संबंधी दस्तावेज मंगलवार को सात जजों की संविधान पीठ के सामने पेश करें। अदालत मंगलवार को इस पर विचार कर मामले का औपचारिक रूप से निपटारा कर सकती है।
अकादमिक कवायद से बचने पर बनी आम सहमति
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि यदि मूल विवाद ही समाप्त हो चुका है, तो अदालत को केवल अकादमिक चर्चा में उलझने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब कोई जीवित मुद्दा शेष नहीं है, तो इस संवैधानिक प्रश्न को खुला छोड़ देना चाहिए और भविष्य में उपयुक्त समय आने पर ही इस पर विचार किया जाना चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चीफ जस्टिस के इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए कहा कि यद्यपि यह संवैधानिक प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन इस पर तभी निर्णय करना उचित होगा जब वास्तव में कोई ठोस मामला सामने आए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी इस पर सहमति जताई और कहा कि किसी समाप्त हो चुके विवाद पर अकादमिक बहस जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है।
इससे पहले, तमिलनाडु विधानसभा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने पीठ को बताया कि चूंकि सात जजों की संविधान पीठ मंगलवार से इस मामले की सुनवाई करने वाली है, इसलिए अदालत के संज्ञान में यह लाना उनका दायित्व था कि विवाद की जड़ बना 2003 का प्रस्ताव 2004 में ही वापस लिया जा चुका है। उन्होंने कहा कि यह तथ्य अब तक रिकॉर्ड पर क्यों नहीं लाया जा सका, इसका सटीक कारण स्पष्ट नहीं है और संभवतः यह दोनों पक्षों के वकीलों की ओर से हुई चूक हो सकती है।
पत्रकारों की गिरफ्तारी से शुरू हुआ था 2003 का विवाद
यह पूरा विवाद वर्ष 2003 में शुरू हुआ था, जो ‘एन. रवि एवं अन्य बनाम अध्यक्ष, तमिलनाडु विधानसभा’ शीर्षक से अदालत के समक्ष आया था। उस समय तमिलनाडु विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष के. कालिमुथु ने विशेषाधिकार हनन और अवमानना के आरोप में वरिष्ठ पत्रकार एन. रवि और उनके अन्य सहयोगियों की गिरफ्तारी का आदेश दिया था। पत्रकारों ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर शीर्ष अदालत ने छह पत्रकारों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी।
इसके बाद, 8 दिसंबर 2003 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पांच जजों की संविधान पीठ को भेज दिया था। अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया था कि इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 194 (विधायी विशेषाधिकार), अनुच्छेद 19 (भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 और इनके बीच के आपसी संबंधों की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न शामिल हैं।
पूर्व फैसलों में टकराव के चलते गठित हुई थी सात जजों की पीठ
दिसंबर 2004 में जब पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई की, तो उसके सामने इस कानूनी बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट के दो पुराने और परस्पर विरोधी फैसले रखे गए। इनमें से एक फैसले में कहा गया था कि नागरिकों के मौलिक अधिकार विधायी विशेषाधिकारों पर प्रभावी होंगे, जबकि 1965 के एक अन्य फैसले में माना गया था कि मौलिक अधिकार संसदीय विशेषाधिकारों के अधीन हैं।
इन दोनों फैसलों में मतभेद को देखते हुए पांच जजों की पीठ ने सिफारिश की थी कि एक स्पष्ट और अंतिम निर्णय के लिए इस मामले को सात जजों की वृहद संविधान पीठ के समक्ष रखा जाए। तब से यह मामला लंबित था, जिस पर अब प्रस्ताव वापसी की जानकारी मिलने के बाद पटाक्षेप होने के आसार हैं।

