सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दिल्ली जिमखाना क्लब के व्यक्तिगत सदस्य केंद्र सरकार द्वारा क्लब की 27.3 एकड़ जमीन वापस लेने के फैसले के खिलाफ स्वतंत्र रूप से कानूनी याचिकाएं दायर कर सकते हैं। लुटियंस दिल्ली स्थित इस ऐतिहासिक परिसर को खाली कराने के आदेश के खिलाफ दायर याचिकाओं के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्टीकरण जारी किया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने क्लब सदस्यों की ओर से यह मामला मौखिक रूप से उठाया। उन्होंने अदालत को बताया कि सदस्यों की रिट याचिकाएं हाईकोर्ट में लंबित हैं, लेकिन वहां यह आपत्ति उठाई गई कि व्यक्तिगत सदस्यों को याचिका दायर करने का विधिक अधिकार (लोकस स्टैंडी) नहीं है और केवल क्लब ही एक संस्था के रूप में ऐसा कर सकता है। इसके बाद हाईकोर्ट ने इस बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टता लाने का निर्देश दिया था।
दलील सुनने के बाद चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने 15 सितंबर, 2026 के अपने पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के समक्ष स्वतंत्र कानूनी कार्यवाही शुरू करने के हकदार हैं।
रक्षा और रणनीतिक जरूरतों का हवाला देकर लीज निरस्त करने का आदेश
यह पूरा विवाद केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के अधीन भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) द्वारा जारी एक आदेश से उपजा है। इस आदेश में क्लब प्रबंधन को निर्देश दिया गया था कि वह सफदरजंग रोड स्थित 27.3 एकड़ का परिसर 5 जून, 2026 तक खाली कर सरकार को सौंप दे।
जमीन वापस लेने के लिए केंद्र सरकार ने पूर्ववर्ती इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब लिमिटेड के पक्ष में निष्पादित परपेचुअल लीज डीड के क्लॉज 4 का सहारा लिया है। यह प्रावधान लोक प्रयोजन के लिए जमीन की आवश्यकता होने पर लीज समाप्त करने और पुनः कब्जा लेने का अधिकार देता है।
सरकार का कहना है कि यह भूखंड देश की राजधानी के अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है और रक्षा ढांचे को सुदृढ़ व सुरक्षित बनाने तथा एकीकृत प्रशासनिक सुविधाओं के विस्तार के लिए इसकी तत्काल आवश्यकता है। आदेश के अनुसार, इस पूरे 27.3 एकड़ क्षेत्र में मौजूद सभी भवनों, लॉन, संरचनाओं और अन्य परिसंपत्तियों का अधिकार पुनः कब्जे के साथ ही एलएंडडीओ के माध्यम से भारत के राष्ट्रपति में निहित हो जाएगा।
14 हजार सदस्यों और 500 कर्मचारियों के विस्थापन की चिंता
सरकार के इस कदम को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए दिल्ली जिमखाना क्लब ने कहा कि अचानक की जा रही इस बेदखली से संस्थान की कार्यप्रणाली पूरी तरह बिखर जाएगी। क्लब ने रेखांकित किया कि वर्तमान में उसके लगभग 14,000 सदस्य हैं और 500 से अधिक कर्मचारी यहां कार्यरत हैं, जिनकी आजीविका इस परिसर से जुड़ी है।
क्लब ने अदालत को यह भी अवगत कराया कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के निर्देशों के बाद से इसका प्रबंधन कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा नियुक्त एक अंतरिम जनरल कमेटी संभाल रही है। यह समिति चुनी हुई संचालन समिति के गठन तक एक अस्थायी व्यवस्था के तहत काम कर रही है और इसके प्रयासों से क्लब की वित्तीय स्थिति व प्रशासनिक कामकाज में उल्लेखनीय सुधार आया है।
क्लब ने सरकार से अनुरोध किया है कि कानूनी विवादों के समाधान तक परिसर खाली कराने की कार्रवाई स्थगित रखी जाए। साथ ही यह आग्रह भी किया गया कि यदि स्थानांतरण अनिवार्य ही हो, तो क्लब की गतिविधियों की निरंतरता बनाए रखने के लिए सरकार किसी वैकल्पिक स्थान पर जमीन आवंटित करने पर विचार करे।
एस्टेट ऑफिसर के अधिकार क्षेत्र पर हाईकोर्ट का रुख
यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में भी गहन कानूनी परीक्षण से गुजर रहा है। पिछले महीने जस्टिस अवनीश झिंगन की पीठ ने सुनवाई के दौरान संकेत दिया था कि पब्लिक प्रिमिसिस कानून के तहत कार्यरत एस्टेट ऑफिसर को पहले यह तय करना चाहिए कि क्या क्लब को जारी किए गए नोटिस पर आगे की कार्यवाही की जाए, जबकि उनके अधिकार क्षेत्र की वैधता का सवाल अदालत के विचाराधीन है। इसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी, ताकि सदस्यों के वकील यह निर्देश ले सकें कि क्या वे एस्टेट ऑफिसर द्वारा पहले क्षेत्राधिकार की जांच किए जाने पर सहमत हैं।
दिल्ली जिमखाना क्लब स्टाफ वेलफेयर एसोसिएशन का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि एस्टेट ऑफिसर के समक्ष कोई भी पेशी या जवाब क्षेत्राधिकार को दी गई उनकी मूल चुनौती को प्रभावित नहीं करेगा। सिंघवी ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबित दीवानी मुकदमा सीधे तौर पर पब्लिक प्रिमिसिस कानून के तहत शुरू की गई कार्यवाही से संबंधित नहीं है।
इससे पहले 26 मई को हाईकोर्ट ने बेदखली के आदेश पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था, जब केंद्र सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया था कि कानून की उचित प्रक्रिया के बिना जमीन का कब्जा नहीं लिया जाएगा।

