धारा 167 सीआरपीसी का चरण बीतने और आरोप तय होने के बाद अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन रिमांड को अवैध नहीं बना सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में जस्टिस मनीष माथुर ने स्पष्ट किया है कि किसी अन्य मामले में पहले से जेल में बंद आरोपी की नए मामले में औपचारिक गिरफ्तारी भले ही “नई गिरफ्तारी” मानी जाएगी और इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 22(1) की सुरक्षा लागू होगी, लेकिन गिरफ्तारी के आधार न बताए जाने की कानूनी चुनौती केवल धारा 167 सीआरपीसी के तहत संज्ञान-पूर्व जांच के चरण तक ही मान्य है। हाईकोर्ट ने माना कि धारा 207 सीआरपीसी के तहत पुलिस रिपोर्ट और केस से जुड़े दस्तावेज आरोपी को सौंप दिए जाने के बाद इस संवैधानिक अधिकार का मूल उद्देश्य पूरा हो जाता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आरोप तय होने के बाद गिरफ्तारी और रिमांड आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। यह याचिका भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 528 के तहत दाखिल की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मोती राम जाट उर्फ मोती राम जाट फौजी द्वारा दाखिल याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने विशेष अदालत द्वारा 29 अगस्त 2025 को पारित औपचारिक गिरफ्तारी आदेश, उसी दिन के न्यायिक रिमांड आदेश और 11 सितंबर 2025 के पुलिस कस्टडी रिमांड आदेश को चुनौती दी थी।

यह मामला भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 148, 152 और 61(2) के तहत दर्ज केस क्राइम संख्या 4/2025 से उपजा है। उत्तर प्रदेश एटीएस (एंटी-टेररिस्ट स्क्वाड) ने सत्र वाद संख्या 131/2025 में सप्लीमेंट्री चार्जशीट पेश कर याचिकाकर्ता को आरोपी नंबर 2 बनाया था।

याचिकाकर्ता किसी पुराने मामले में पहले से ही जेल में बंद था। एटीएस ने 13 अगस्त 2025 को जारी प्रिजनर ट्रांजिट (पी.टी.) वारंट के जरिए 29 अगस्त 2025 को उसे विशेष अदालत में पेश कराया। वहां उसे पी.टी. वारंट पर औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया और बाद में पुलिस रिमांड भी स्वीकृत की गई।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता श्री शांतनु सिंह, श्री सैयद फरहान अली और श्री शैलेंद्र यादव ने दलील दी कि आरोपी को अथवा उसके परिजनों को गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराए गए। यह संविधान के अनुच्छेद 22(1) और बीएनएसएस की धारा 48(4) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि 29 अगस्त 2025 को न्यायिक हिरासत की मंजूरी का कोई स्पष्ट आदेश पारित नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, अनुच्छेद 22(1) की अनदेखी से गिरफ्तारी और उसके बाद के सभी रिमांड आदेश स्वतः अवैध हो जाते हैं।

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याचिकाकर्ता के वकीलों ने अपने तर्कों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य, प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली), पंकज बंसल बनाम भारत संघ, मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य और कसीरेड्डी उपेंद्र रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के निर्णयों पर भरोसा जताया।

दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता श्री शिवनाथ तिल्हारी ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि जब विवादित रिमांड आदेश दिया गया, तब याचिकाकर्ता पहले से एक अन्य एफआईआर के सिलसिले में जेल में था। इसलिए एटीएस की कार्रवाई केवल “कस्टडी में बदलाव” (change of custody) थी, न कि कोई नई गिरफ्तारी। इस कारण अनुच्छेद 22(1) और बीएनएसएस की धारा 48(3) के प्रावधान यहां लागू नहीं होते।

एजीए ने यह भी रेखांकित किया कि रिमांड आदेशों के बाद जांच एजेंसी ने 25 नवंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल कर दी और सक्षम अदालत ने 27 जनवरी 2026 को अपराध का संज्ञान ले लिया। उन्होंने दलील दी कि एक बार चार्जशीट दाखिल होने और कोर्ट द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद धारा 167(2) सीआरपीसी के तहत रिमांड का महत्व खत्म हो जाता है। ऐसी स्थिति में संज्ञान आदेश को चुनौती दिए बिना शुरुआती रिमांड को चुनौती नहीं दी जा सकती। राज्य ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा नीरज व अन्य बनाम यूपी राज्य में दिए गए फैसले का हवाला दिया।

हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण

जस्टिस माथुर ने पूरे मामले में तीन मुख्य कानूनी सवाल तय किए:

  1. क्या पहले से हिरासत में चल रहे आरोपी को किसी नई एफआईआर में रिमांड पर लेना केवल कस्टडी का बदलाव है या एक नई गिरफ्तारी?
  2. क्या ऐसी स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 22 का अनुपालन न होना बाद की हिरासत को अवैध बना देता है?
  3. क्या हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा नीरज मामले में दिया गया निर्णय इस मामले में बाध्यकारी नजीर के रूप में लागू होगा?

1. हिरासत में दोबारा गिरफ्तारी ‘नई गिरफ्तारी’ है

पहले सवाल पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के धनराज असवानी बनाम अमर एस. मूलचंदानी (2024) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें उड़ीसा हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को स्वीकार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब किसी जेल में बंद आरोपी को किसी अन्य अपराध के सिलसिले में धारा 267 सीआरपीसी के तहत पी.टी. वारंट पर पेश किया जाता है, तो वह अदालत की हिरासत के प्रति समर्पण करता है। यह औपचारिक कार्रवाई कोई जारी रहने वाली गिरफ्तारी नहीं, बल्कि एक “नई गिरफ्तारी” (fresh arrest) होती है। इसलिए हाईकोर्ट ने पहले प्रश्न का उत्तर सकारात्मक दिया।

2. नई गिरफ्तारी पर अनुच्छेद 22(1) की अनिवार्यता

हिरासत को नई गिरफ्तारी मानते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) और बीएनएसएस की धारा 48(2) (तथा पूर्ववर्ती धारा 50/50-ए सीआरपीसी) के सुरक्षात्मक प्रावधान यहां पूरी तरह लागू होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के विहान कुमार निर्णय और हाईकोर्ट की खंडपीठ के राकेश बनाम यूपी राज्य निर्णय के आधार पर कोर्ट ने रेखांकित किया कि गिरफ्तारी के आधार आरोपी और उसके नामित परिजनों को बताना अनिवार्य है। इसका उल्लंघन होने पर शुरुआती गिरफ्तारी और धारा 167 सीआरपीसी के तहत दी गई पहली रिमांड दूषित मानी जाती है।

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3. न्यायिक नजीरों और रिमांड के चरणों का समन्वय

इसके बाद हाईकोर्ट ने राज्य द्वारा प्रस्तुत खंडपीठ के नीरज फैसले पर विचार किया। नीरज मामले में खंडपीठ ने माना था कि विहान कुमार और prabir purkayastha जैसे हालिया फैसलों में सुप्रीम कोर्ट की पुरानी संविधान पीठों—जैसे निरंजन सिंह नाथवान बनाम पंजाब राज्य, संजय दत्त बनाम स्टेट, राम नारायण सिंह बनाम दिल्ली राज्य, ए.के. गोपालन बनाम भारत सरकार, कर्नल डॉ. बी.आर. रामचंद्र राव बनाम उड़ीसा राज्य और कनु सान्याल बनाम डीएम दार्जिलिंग—के निर्णयों पर विचार नहीं किया गया था।

जस्टिस माथुर ने स्पष्ट किया कि नीरज का मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिकाओं के संदर्भ में था, जहां हिरासत की वैधता याचिका के समय देखी जाती है और यह स्थापित सिद्धांत है कि पहले की किसी प्रक्रियात्मक त्रुटि के बावजूद यदि वर्तमान में सक्षम कोर्ट का वैध आदेश मौजूद है, तो रिहाई नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट ने पाया कि सुप्रीम कोर्ट की पुरानी संविधान पीठों और विहान कुमार जैसे हालिया फैसलों में कोई टकराव नहीं है। दोनों का फर्क आपराधिक प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों पर आधारित है:

  • विहान कुमार, प्रबीर पुरकायस्थ और पंकज बंसल के दिशा-निर्देश मुख्य रूप से धारा 167 सीआरपीसी के दायरे में संज्ञान-पूर्व जांच के चरण पर लागू होते हैं।
  • विहान कुमार के फैसले में धारा 204, 207, 209 या 309 सीआरपीसी के बाद के चरणों पर विचार नहीं किया गया था। साथ ही उसमें स्पष्ट कहा गया था कि अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन जांच, चार्जशीट या ट्रायल को दूषित नहीं करता।
  • कसीरेड्डी उपेंद्र रेड्डी मामले के अनुसार, जब गिरफ्तारी वारंट पर होती है, तो वारंट को पढ़कर सुनाना ही गिरफ्तारी के आधार की पर्याप्त सूचना माना जाता है।
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हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“उपरोक्त प्रावधान स्पष्ट रूप से ऐसी स्थिति दर्शाते हैं जहां संविधान के अनुच्छेद 22(1) के प्रावधानों का पालन केवल धारा 167 सीआरपीसी के चरण के अस्तित्व तक ही आवश्यक होगा, उसके बाद नहीं, विशेषकर तब जब धारा 207 सीआरपीसी का अनुपालन हो चुका हो।”

कानूनी मंतव्य को समझाते हुए कोर्ट ने कहा:

“संविधान के अनुच्छेद 22(1) का अंतर्निहित उद्देश्य यह है कि आरोपी अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों और अपनी गिरफ्तारी के कारणों व आधारों को लेकर अंधेरे में न रहे, ताकि वह या उसके परिवार के सदस्य ऐसे आरोपों के खिलाफ प्रभावी बचाव कर सकें। इसलिए, अनुच्छेद 22(1) की व्यापक रूपरेखा धारा 207 सीआरपीसी के चरण में मौलिक रूप से संतुष्ट हो जाती है।”

कोर्ट ने आगे जोड़ा:

“उपरोक्त विवेचना के आलोक में, यह स्पष्ट है कि शुरुआती हिरासत और रिमांड के शुरुआती आदेश को संविधान के अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के लिए केवल धारा 167 सीआरपीसी के चरण के अस्तित्व तक ही चुनौती दी जा सकती है, उसके बाद नहीं।”

हाईकोर्ट ने धारा 309(2) और धारा 167 के स्पष्टीकरण 1 का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि आरोपी ने वैधानिक अवधि में जमानत नहीं ली है, तो वह कानूनन वैध न्यायिक हिरासत में बना रहता है और संज्ञान के बाद दी जाने वाली रिमांड एक स्वतंत्र न्यायिक आदेश पर आधारित होती है।

हाईकोर्ट का निर्णय

मामले के तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान केस में धारा 167 सीआरपीसी का चरण काफी पहले बीत चुका है। एटीएस द्वारा चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, विशेष अदालत संज्ञान ले चुकी है, धारा 207 के तहत दस्तावेज दिए जा चुके हैं, आरोप तय हो चुके हैं और ट्रायल चल रहा है।

चूंकि याचिकाकर्ता ने धारा 167 के चरण के दौरान जमानत नहीं ली थी, इसलिए वह न्यायिक प्रक्रिया के तहत हिरासत में था। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि इतने विलंबित चरण में याचिकाकर्ता अपनी हिरासत को चुनौती देने के लिए अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन का आधार नहीं ले सकता।

हाईकोर्ट ने याचिका को आधारहीन पाते हुए खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मोती राम जाट उर्फ मोती राम जाट फौजी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: एप्लीकेशन धारा 528 बीएनएसएस संख्या 2601/2026
पीठ: जस्टिस मनीष माथुर
निर्णय की तिथि: 1 अक्टूबर 2026

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