सुप्रीम कोर्ट ने अपनी नाबालिग भांजी के साथ कथित दुष्कर्म और हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ऐसी अटूट कड़ी स्थापित करने में पूरी तरह विफल रहा, जो बिना किसी संदेह के केवल अभियुक्त के दोष की ओर इशारा करती हो। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए रेखांकित किया कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि को अनुमान, अटकलों या संदेह के आधार पर बरकरार नहीं रखा जा सकता। अदालत ने अभियोजन के मामले में गंभीर विसंगतियों का संज्ञान लिया—विशेष रूप से डीएनए रिपोर्ट, जिसमें बरामद हड्डियों के टुकड़े पुरुष के पाए गए, जबकि पीड़िता एक बच्ची थी। सत्र अदालत और सिक्किम हाईकोर्ट के समवर्ती निष्कर्षों को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता को संदेह का लाभ दिया और उसे तत्काल जेल से रिहा करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 6 नवंबर 2013 को सुबह करीब 9:00 बजे अपीलकर्ता की मां (शिकायतकर्ता) ने उसे बाजार से सब्जियां लाने के लिए कहा था। अपीलकर्ता ने अपनी नाबालिग भांजी को अपने साथ ले जाने की बात कही, लेकिन नानी ने बच्ची को साथ भेजने से मना कर दिया। अभियोजन का आरोप था कि मना करने के बावजूद अपीलकर्ता बच्ची को अपने साथ ले गया। जब दोनों वापस नहीं लौटे, तो शिकायतकर्ता ने आसपास तलाश की और बच्ची की मां को सूचना दी। इसके बाद 12 नवंबर 2013 को रोंगली पुलिस स्टेशन में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई।
घटना के कई महीनों बाद अपीलकर्ता को सिलीगुड़ी में खोजा गया। 13 मई 2014 को दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, सिलीगुड़ी से रोंगली लाते समय अपीलकर्ता ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि उसने 6 नवंबर 2013 को बच्ची से दुष्कर्म किया और फिर गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। मामले में मृतका का शव कभी बरामद नहीं हो सका, हालांकि 15 मई 2014 को अपीलकर्ता के कथित प्रकटीकरण बयान के आधार पर कुछ हड्डियां, दांत और कपड़े बरामद होने का दावा किया गया।
जांच पूरी होने के बाद अपीलकर्ता पर भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376(2)(i), 302 और 201 के साथ-साथ यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 की धारा 4 और 6 के तहत आरोप तय किए गए। सत्र अदालत ने 20 अप्रैल 2016 को उसे दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। सिक्किम हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा, जिसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि दोनों अदालतों ने केवल अधूरी और कमजोर परिस्थितियों के आधार पर अपीलकर्ता को दोषी ठहराने में गंभीर त्रुटि की है। उन्होंने कहा कि ‘लास्ट सीन’ (अंतिम बार साथ देखे जाने) का सिद्धांत पूरी तरह अप्रमाणित है, क्योंकि अभियोजन गवाहों के बयानों में इस बात को लेकर विरोधाभास था कि क्या अपीलकर्ता बच्ची को साथ लेकर गया था या नहीं। इसके अतिरिक्त, गुमशुदगी की सूचना और प्राथमिकी दर्ज किए जाने के बीच छह महीने की अकारण देरी पर भी कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
वकील ने आगे दलील दी कि साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के तहत दिखाई गई बरामदगी एक खुले और आम आवाजाही वाले स्थान से हुई थी, जहां मवेशी चराने वाले और चारा काटने वाले लोग नियमित रूप से आते-जाते थे। इस संबंध में उन्होंने कट्टावेल्लई उर्फ देवाकर बनाम तमिलनाडु राज्य के निर्णय का हवाला दिया। अंत में, उन्होंने जोर दिया कि फॉरेंसिक और डीएनए जांच रिपोर्ट अपीलकर्ता को अपराध से जोड़ने में विफल रही हैं, बल्कि डीएनए जांच से यह स्पष्ट सिद्ध हुआ कि बरामद हड्डियां पीड़िता की नहीं थीं।
दूसरी ओर, सिक्किम राज्य की ओर से पेश वकील ने निचली अदालतों के फैसलों का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि प्रत्यक्षदर्शियों के अभाव में अभियोजन ने ऐसी पुख्ता परिस्थितियां साबित की हैं जो केवल अपीलकर्ता के अपराध की ओर संकेत करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 313 के तहत दर्ज बयान में अपीलकर्ता अपने खिलाफ बने हालात का कोई तर्कसंगत स्पष्टीकरण देने में असमर्थ रहा, जिससे परिस्थितियों की श्रृंखला और मजबूत होती है। राज्य ने अपनी दलीलों के समर्थन में नैब सिंह बनाम पंजाब राज्य, राजस्थान राज्य बनाम काशी राम, और माणिक एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य के निर्णयों पर भरोसा जताया।
अदालत का कानूनी विश्लेषण
फैसला सुनाते हुए जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर ने माना कि केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता, क्योंकि परिस्थितियों की कड़ी कई महत्वपूर्ण स्थानों पर टूटी हुई है। तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा हनुमंत बनाम मध्य प्रदेश राज्य में प्रतिपादित मूलभूत सिद्धांतों को दोहराते हुए अदालत ने रेग बनाम हॉज के ऐतिहासिक निर्णय में दी गई चेतावनी का उल्लेख किया:
“मानव मस्तिष्क परिस्थितियों को एक-दूसरे के अनुकूल ढालने और यदि आवश्यक हो, तो उन्हें एक जुड़ी हुई समग्रता का हिस्सा बनाने के लिए थोड़ा खींचने में भी आनंद लेता है; और व्यक्ति का मस्तिष्क जितना अधिक चतुर होता है, ऐसे मामलों में उसके भटकने, खुद को गुमराह करने, किसी छूटी हुई कड़ी को अपनी ओर से जोड़ने, और अपने पूर्व सिद्धांतों के अनुरूप किसी तथ्य को सच मान लेने की उतनी ही अधिक संभावना होती है, जो उन सिद्धांतों को पूर्ण बनाने के लिए आवश्यक प्रतीत होता है।”
अदालत ने रेखांकित किया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामलों में:
“…जिन परिस्थितियों से दोष का निष्कर्ष निकाला जाना है, उन्हें पहले पूरी तरह से स्थापित किया जाना चाहिए, और इस प्रकार स्थापित सभी तथ्यों को केवल अभियुक्त के दोष की परिकल्पना के अनुरूप ही होना चाहिए। इसके अलावा, परिस्थितियां निर्णायक प्रकृति और प्रवृत्ति की होनी चाहिए तथा वे ऐसी होनी चाहिए जो साबित किए जाने वाले निष्कर्ष के अलावा अन्य प्रत्येक परिकल्पना को पूरी तरह खारिज करती हों।”
पीठ ने अभियोजन द्वारा प्रस्तुत प्रत्येक परिस्थिति का क्रमवार परीक्षण किया:
1. ‘लास्ट सीन’ (अंतिम बार साथ देखे जाने) का सिद्धांत:
अदालत ने पीड़िता की नानी (अभियोजन गवाह 2) की गवाही का विश्लेषण किया, जिन्होंने जिरह में स्वीकार किया कि घटना के समय गांव के दो अन्य लोग भी घर आए थे और उन्होंने यह ध्यान नहीं दिया कि अपीलकर्ता और बच्ची एक साथ घर से निकले थे या अलग-अलग। हेड कांस्टेबल (अभियोजन गवाह 1) और जांच अधिकारी (अभियोजन गवाह 16) दोनों ने माना कि किसी भी गवाह ने अपीलकर्ता को बच्ची को ले जाते नहीं देखा था। बच्ची के लापता होने और हड्डियों की बरामदगी के बीच छह महीने के लंबे अंतराल पर अदालत ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सतीश के निर्णय का उल्लेख किया:
“अंतिम बार साथ देखे जाने का सिद्धांत तब लागू होता है जब उस समय के बीच का अंतराल, जब अभियुक्त और मृतक को अंतिम बार जीवित देखा गया था, और जब मृतक मृत पाया जाता है, इतना कम हो कि अभियुक्त के अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अपराध किए जाने की संभावना असंभव हो जाए। जब समय का लंबा अंतराल हो और बीच में अन्य व्यक्तियों के आने की संभावना मौजूद हो, तो ऐसे मामलों में यह सकारात्मक रूप से स्थापित करना कठिन होता है कि मृतक को अभियुक्त के साथ ही अंतिम बार देखा गया था। अभियुक्त और मृतक को एक साथ देखे जाने के किसी अन्य ठोस साक्ष्य के अभाव में, ऐसे मामलों में दोषसिद्धि के निष्कर्ष पर पहुंचना जोखिम भरा होगा।”
2. साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत बरामदगी:
बरामदगी के पंच गवाहों (अभियोजन गवाह 5 और 8) ने स्वीकार किया कि जिस स्थान से सामान बरामद किया गया, वह एक पुराने रास्ते और पगडंडी के करीब था, जिसका उपयोग ग्रामीण चारा काटने और मवेशी चराने के लिए करते थे। वह स्थान आने-जाने वाले किसी भी व्यक्ति को साफ दिखाई देता था। इस संदर्भ में हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम जीत सिंह का हवाला देते हुए अदालत ने टिप्पणी की:
“इसलिए महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि वह स्थान दूसरों के लिए सुलभ था या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह स्थान सामान्यतः दूसरों को दिखाई देता था। यदि वह दिखाई नहीं देता था, तो यह महत्वहीन है कि छुपाया गया स्थान दूसरों के लिए सुलभ था।”
चूंकि बरामदगी स्थल आम लोगों की नजरों में आसानी से आने वाला खुला क्षेत्र था, इसलिए अदालत ने माना कि इस बरामदगी पर अत्यधिक सावधानी से विचार किया जाना आवश्यक था।
3. डीएनए और फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट:
अदालत ने पाया कि त्रिपुरा सरकार के उप निदेशक-सह-सहायक रासायनिक परीक्षक की डीएनए रिपोर्ट के अनुसार बरामद हड्डियों के टुकड़े “मानव पुरुष” के थे और उनका पीड़िता की मां या बहन के रक्त के नमूनों से कोई जैविक संबंध नहीं था। इसके अतिरिक्त, मेडिको-लीगल विशेषज्ञ (अभियोजन गवाह 13) अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं कर सके कि बरामद अवशेष मानव के थे या किसी जानवर के। वहीं क्षेत्रीय फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (आरएफएसएल) की रिपोर्ट भी बरामद शॉल पर मिले सूखे खून के धब्बों के मानव या पशु होने की पुष्टि नहीं कर सकी।
4. भूरे रंग की शॉल की बरामदगी:
अभियोजन का दावा था कि अपीलकर्ता अपनी मां के घर से एक भूरी शॉल ले गया था, जिस पर उसने पीड़िता को लिटाया था। हालांकि, अदालत में पेश किए जाने पर शिकायतकर्ता उस शॉल को पहचानने में असमर्थ रही और उसने उसके अपने होने से इनकार किया। जांच अधिकारी ने भी माना कि ऐसा कोई गवाह नहीं मिला जिसने अपीलकर्ता को घर से शॉल ले जाते देखा हो।
5. धारा 313 सीआरपीसी के तहत अपीलकर्ता का बयान:
राज्य के इस तर्क को खारिज करते हुए कि अपीलकर्ता की चुप्पी या अस्पष्ट उत्तर अभियोजन की कमियों की भरपाई कर सकते हैं, अदालत ने राज कुमार सिंह उर्फ राजू उर्फ बट्या बनाम राजस्थान राज्य का हवाला दिया:
“धारा 313 सीआरपीसी के तहत पूछे गए सवालों के अभियुक्त द्वारा दिए गए जवाबों का इस्तेमाल अभियोजन गवाहों के बयानों में छूटी कमियों को भरने के लिए नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, अभियुक्त का बयान कोई मौलिक साक्ष्य नहीं है और इसलिए इसका उपयोग केवल अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के मूल्यांकन के लिए किया जा सकता है, यह अभियोजन के साक्ष्य का विकल्प नहीं बन सकता।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि अभियुक्त के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष केवल तभी निकाला जा सकता है जब अभियोजन ने अपने स्वतंत्र साक्ष्यों से आपत्तिजनक परिस्थितियों को पूरी तरह सिद्ध कर दिया हो।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय
सर्वोच्च अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए साक्ष्य अपीलकर्ता के दोष को उचित संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाफी रहे हैं। अदालत ने कहा कि यद्यपि बच्ची की दुखद मृत्यु हुई, लेकिन पत्रावली पर मौजूद कमजोर और बिखरे हुए साक्ष्यों के आधार पर अपीलकर्ता को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसी स्थिति में अपीलकर्ता संदेह का लाभ पाने का पूर्ण हकदार है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए सत्र अदालत और सिक्किम हाईकोर्ट के दोषसिद्धि के निर्णयों को निरस्त कर दिया, अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी किया और उसे किसी अन्य मामले में वांछित न होने पर तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: संतोष गुरुंग बनाम सिक्किम राज्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 107/2018
पीठ: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
निर्णय की तिथि: 1 अक्टूबर 2026

