मद्रास हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह एक महिला की उस याचिका को रिकॉर्ड पर ले, जिसमें उसने अपनी शादी को शून्य और अमान्य घोषित करने की मांग की है। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर याचिका वापस नहीं की जा सकती कि विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत नहीं हुआ था।
जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने जिला मुंसिफ कोर्ट के 29 अप्रैल के आदेश को रद्द कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए महिला की याचिका लेने से इनकार कर दिया था कि विवाह हिंदू कानून के तहत नहीं हुआ, इसलिए उसके पास मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है।
महिला की शादी 9 जून 2022 को हुई थी। मामले के अनुसार, दोनों व्यक्तियों ने खुद को किसी भी धर्म से नहीं जोड़ा था और अपनी शादी को तमिलनाडु रजिस्ट्रेशन ऑफ मैरिज एक्ट, 2009 के तहत रजिस्टर कराया था।
शादी टूटने के बाद महिला ने जिला मुंसिफ कोर्ट में मुकदमा दाखिल कर विवाह को शून्य और अमान्य घोषित करने की मांग की।
ट्रायल कोर्ट ने दो बार लौटाई याचिका
महिला की याचिका को ट्रायल कोर्ट ने पहली बार 21 जुलाई 2025 के आदेश के जरिए वापस कर दिया था। इसके बाद महिला ने मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया।
4 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि महिला को खुली अदालत में सुनवाई का अवसर दिया जाए और उसके बाद मामले के गुण-दोष पर उचित आदेश पारित किया जाए।
महिला दोबारा ट्रायल कोर्ट पहुंची, लेकिन 29 अप्रैल को उसकी याचिका फिर लौटा दी गई। इस बार अदालत ने कहा कि चूंकि विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत नहीं हुआ था, इसलिए उसे मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है।
इसके बाद महिला ने फिर हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दाखिल की।
जस्टिस वेंकटेश ने कहा कि याचिकाकर्ता की परेशानी जारी रही क्योंकि निचली अदालत लगातार उसकी याचिका पर विचार करने से इनकार कर रही थी।
फैमिली कोर्ट कानून किसी धर्म तक सीमित नहीं
हाईकोर्ट ने एक पुराने डिवीजन बेंच के फैसले का हवाला दिया, जो ऐसे ही विवाह से जुड़ा था जिसमें दोनों व्यक्तियों ने अपना कोई धर्म नहीं बताया था और उनका विवाह हिंदू विवाह अधिनियम, स्पेशल मैरिज एक्ट या अन्य धर्म-आधारित विवाह कानूनों के दायरे में नहीं आता था।
उस फैसले में कहा गया था कि कोई पक्ष विवाह से संबंधित घोषणा के लिए फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का सहारा ले सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट्स एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि केवल किसी विशेष धर्म से जुड़े लोग ही इसके तहत राहत मांग सकते हैं। पहले के फैसले में भी माना गया था कि जो लोग दूसरे विवाह कानूनों का सहारा नहीं ले सकते, उनके वैवाहिक विवादों और वैवाहिक स्थिति से जुड़े मामलों के लिए यह कानून एक मंच उपलब्ध कराता है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि विवाह की वैधता या वैवाहिक स्थिति के संबंध में घोषणा की मांग करने वाला मुकदमा या कार्यवाही फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आती है। यह मायने नहीं रखता कि पक्ष सकारात्मक घोषणा मांग रहा है या किसी वैवाहिक स्थिति को नकारने वाली घोषणा।
फाइलिंग के स्तर पर नहीं लौटाई जा सकती याचिका
इस कानूनी स्थिति को देखते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि महिला की याचिका केवल इसलिए वापस नहीं की जानी चाहिए कि उसका विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट ने महिला की शादी को शून्य और अमान्य घोषित नहीं किया। अदालत ने केवल इस मुद्दे पर विचार किया कि उसकी याचिका को शुरुआती स्तर पर लौटाया जा सकता था या नहीं।
कोर्ट ने 29 अप्रैल का आदेश रद्द करते हुए जिला मुंसिफ कोर्ट को निर्देश दिया कि वह याचिका को रिकॉर्ड पर ले, उसे नंबर दे और कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही करे।
हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को मूल याचिका महिला को वापस करने का निर्देश दिया गया ताकि वह उसे ट्रायल कोर्ट में फिर से पेश कर सके। महिला को 12 अक्टूबर तक याचिका दोबारा दाखिल करने को कहा गया है।
इन निर्देशों के साथ रिवीजन याचिका स्वीकार कर ली गई। कोर्ट ने खर्च को लेकर कोई आदेश नहीं दिया।

