सामान वापस लेने के बाद भी खरीदार का रिफंड रोकने वाले एक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म को तेलंगाना के उपभोक्ता आयोग से कड़ा झटका लगा है। रंगारेड्डी जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कंपनी को एक वकील की ₹17,839 की मूल रकम 9 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ लौटाने और ₹10,000 का हर्जाना व मुकदमा खर्च चुकाने का निर्देश दिया है। आयोग ने दो टूक कहा कि कोई भी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म लौटाया गया सामान और ग्राहक का भुगतान, दोनों एक साथ अपने पास नहीं रोक सकता; ऐसा करना सीधे तौर पर सेवा में कमी की श्रेणी में आता है।
आयोग की अध्यक्ष चितनेनी लता कुमार, सदस्य डी. माधवी लता और कात्यायनी खंडावल्ली की पीठ ने 21 सितंबर को जारी अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कंपनी यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही कि उत्पाद में आई कथित खराबी या सामान गायब होने के लिए उपभोक्ता जिम्मेदार था। पीठ ने पाया कि ग्राहक से सामान पिक किए जाने के समय और बाद में गोदाम में जांच के दौरान की स्थिति के बीच कंपनी कोई निर्बाध रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी। ऐसे में कंपनी की ओर से लगाए गए आरोपों को साबित नहीं माना जा सकता।
गुणवत्ता पर असंतोष के बाद शुरू हुआ था विवाद
यह पूरा मामला 38 वर्षीय एक वकील की शिकायत पर आधारित है, जिनका पक्ष आयोग के समक्ष वकील बी. आकाश कुमार ने रखा। शिकायतकर्ता ने 5 अगस्त 2023 को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से ₹17,839 में एक सनग्लास ऑर्डर किया था, जिसकी डिलीवरी उन्हें 9 अगस्त को मिली। उत्पाद की जांच करने पर वे उसकी गुणवत्ता और असलियत से संतुष्ट नहीं हुए, जिसके बाद उन्होंने 15 अगस्त 2023 को ऑर्डर रद्द कर वापसी का अनुरोध दर्ज कराया।
इसके बाद 19 अगस्त 2023 को प्लेटफॉर्म का डिलीवरी प्रतिनिधि उनके आवास पर पहुंचा, चश्मे की भौतिक जांच की और पार्सल स्वीकार कर लिया। हालांकि, उसी दिन प्लेटफॉर्म ने शिकायतकर्ता को ईमेल भेजकर सूचित किया कि लौटाया गया सनग्लास उसके तय क्वालिटी-चेक मानकों पर खरा नहीं उतरा है, इसलिए रिफंड की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। इसके खिलाफ वकील ने उपभोक्ता आयोग का रुख किया। उनका कहना था कि जब हैंडओवर के समय डिलीवरी कर्मी ने जांच के बाद उत्पाद ले लिया, तो उसके बाद सामने आई किसी भी खराबी या विसंगति के लिए रास्ते में हुई ढुलाई, हैंडलिंग या कंपनी कर्मियों की लापरवाही ही जिम्मेदार हो सकती है।
मध्यस्थ होने की दलील आयोग ने की खारिज
ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की ओर से पेश वकील जी. मधुसूदन कुमार ने दलील दी कि प्लेटफॉर्म केवल स्वतंत्र विक्रेताओं और खरीदारों के बीच लेनदेन की सुविधा देने वाला एक मध्यस्थ है। उनका कहना था कि बिक्री का वास्तविक अनुबंध विक्रेता और खरीदार के बीच ही अस्तित्व में रहता है।
कंपनी ने विक्रेता के पैकेजिंग वीडियो और वापसी के बाद किए गए निरीक्षण के वीडियो फुटेज का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि लौटाए गए सनग्लास पर खरोंचें थीं, वह इस्तेमाल किया हुआ प्रतीत हो रहा था और उसके साथ आया बाहरी ब्रांडेड बॉक्स, ग्लास कवर तथा दो इंसर्ट कार्ड गायब थे। कंपनी ने यह भी दावा किया कि यह शिकायत उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने और अनुचित लाभ हासिल करने के मकसद से दर्ज कराई गई थी।
आयोग ने प्लेटफॉर्म के इस बचाव को अमान्य ठहरा दिया। पीठ ने रेखांकित किया कि महज मध्यस्थ होने का दावा किसी भी ई-कॉमर्स कंपनी को अपने मंच के जरिए निष्पादित सेवाओं की सीधी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकता। इसके अलावा, रिफंड ठुकराए जाने के बावजूद सामान विक्रेता के ही पास रखा गया। आयोग ने कहा कि लौटाए गए चश्मे और ₹17,839 की भुगतान राशि, दोनों को रोककर रखना कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है और यह सेवा में स्पष्ट कमी है।
मुआवजे और भुगतान का पूरा ब्योरा
आयोग ने अपने आदेश में दर्ज किया कि शिकायतकर्ता उत्पाद वापस करने के बाद भी अपनी रकम से वंचित रहा और उसे राहत पाने के लिए कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ा। आयोग के अनुसार, सेवा में कमी के एवज में ₹5,000 का मुआवजा और कानूनी कार्यवाही के खर्च के रूप में ₹5,000 की राशि न्यायोचित है।
आदेश के अनुसार, ई-कॉमर्स कंपनी को उत्पाद की मूल कीमत ₹17,839 पर 19 अगस्त 2023 से लेकर वास्तविक भुगतान होने तक 9 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज देना होगा। इसके अतिरिक्त, शिकायतकर्ता को ₹5,000 क्षतिपूर्ति और ₹5,000 वाद व्यय के रूप में अदा करने होंगे, जिससे कुल देय राशि ब्याज सहित ₹27,839 हो जाती है।

