हैदराबाद स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने सिकंदराबाद के एक निजी स्कूल को छात्रा के पिता को 36,000 रुपये चुकाने का निर्देश दिया है। स्कूल ने शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही दाखिला रद्द कराने के बावजूद प्रवेश शुल्क लौटाने से साफ मना कर दिया था। उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बिना कोई शैक्षणिक सेवा दिए केवल ‘नॉन-रिफंडेबल’ नीति की आड़ में अग्रिम राशि जब्त कर लेना अनुचित व्यापार व्यवहार (अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस) है।
आयोग के अध्यक्ष वक्कंती नरसिम्हा राव तथा सदस्य पी वी टी आर जवाहर बाबू और सुमा वला की पीठ ने यह आदेश 19 अगस्त को पारित किया। पीठ ने स्कूल प्रबंधन को आदेश दिया कि वह 45 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता पिता को 21,000 रुपये का प्रवेश शुल्क वापस करे। इसके साथ ही मानसिक प्रताड़ना के एवज में 10,000 रुपये का मुआवजा और 5,000 रुपये कानूनी वाद व्यय के तौर पर अदा करे।
सेवा दिए बिना फीस अपने पास रखने का अधिकार नहीं
उपभोक्ता आयोग ने कहा कि शिक्षण संस्थानों को फीस का भुगतान दी जाने वाली शैक्षणिक सेवाओं के बदले किया जाता है। जब स्कूल ने कोई सेवा ही नहीं दी, तो फीस रोके रखने का कोई औचित्य नहीं बनता। पीठ ने रेखांकित किया कि छात्रा के पिता ने फीस जमा करने के महज पांच दिन बाद और शैक्षणिक सत्र जून में शुरू होने से महीनों पहले ही नाम वापस लेने की सूचना दे दी थी। ऐसे में खाली हुई सीट पर किसी अन्य छात्र को दाखिला देने के लिए स्कूल के पास पर्याप्त समय मौजूद था।
आयोग ने सत्र के बीच में स्कूल छोड़ने और सत्र शुरू होने से पहले दाखिला वापस लेने के अंतर को भी स्पष्ट किया। पीठ ने कहा कि यदि कोई छात्र शैक्षणिक सत्र के बीच में अथवा कुछ दिन या महीने कक्षाएं लेने के बाद पढ़ाई छोड़ता है, तो वह बाकी अवधि की फीस वापसी का हकदार नहीं है। लेकिन शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही प्रवेश रद्द होने पर अग्रिम राशि दबा लेने का जो चलन कई संस्थानों में बना हुआ है, उसे पूरी तरह समाप्त किया जाना चाहिए।
तबादला टलने के बाद स्कूल ने नहीं लौटाए थे पैसे
इस मामले की शुरुआत 9 फरवरी 2019 को हुई थी। 49 वर्षीय एक व्यक्ति ने सिकंदराबाद में संभावित तबादले को ध्यान में रखते हुए अपनी बेटी के दाखिले के लिए संबंधित स्कूल से संपर्क किया था। स्कूल ने प्रस्ताव दिया कि यदि 10 फरवरी से पहले भुगतान कर दिया जाए तो फीस में रियायत मिलेगी। इसके बाद पिता ने 21,000 रुपये का वार्षिक शुल्क जमा कर प्रवेश से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी कर लीं।
हालांकि, 14 फरवरी को उन्होंने स्कूल प्रबंधन को अवगत कराया कि उनका सिकंदराबाद स्थानांतरण टल गया है, इसलिए दाखिला रद्द कर जमा की गई रकम लौटा दी जाए। स्कूल ने यह कहते हुए पैसे वापस करने से इनकार कर दिया कि जमा किया गया शुल्क किसी भी स्थिति में न तो वापस हो सकता है, न किसी अन्य को हस्तांतरित किया जा सकता है और न ही समायोजित हो सकता है।
पीड़ित पिता ने इसके बाद अधिवक्ता जी एम मोहिउद्दीन के जरिए उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया और 21,000 रुपये की वापसी के साथ-साथ 20,000 रुपये के मुआवजे की गुहार लगाई। पूरे मामले की सुनवाई के दौरान स्कूल प्रबंधन ने आयोग के समक्ष अपना लिखित पक्ष तक पेश नहीं किया।
शैक्षणिक संस्थानों के व्यावसायिक रवैये पर सख्त रुख
आयोग ने शैक्षणिक संस्थानों में बढ़ती मुनाफाखोरी पर कड़ा रुख अख्तियार किया। पीठ ने कहा कि एक छात्र का दाखिला रद्द होने पर उसकी फीस भी रख लेना और उसी खाली सीट पर किसी दूसरे विद्यार्थी को प्रवेश देकर उससे भी पूरी रकम वसूलना सीधे तौर पर दोहरा अनुचित लाभ (डबल एनरिचमेंट) कमाना है। उपभोक्ता पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे संस्थान व्यावसायिक दुकानों की तरह काम करने लगे हैं और शिक्षा के क्षेत्र में यह अनैतिक तथा अनुचित व्यापार का सबसे निकृष्ट रूप है।

