मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पांच साल के एक बच्चे की स्थायी कस्टडी उसकी मां को सौंपने का आदेश दिया है। अदालत कक्ष में जब बच्चे से उसकी पसंद पूछी गई, तो उसने जजों से कहा कि उसकी मां उससे प्यार करती है और वह उसी के साथ रहना चाहता है। बच्चे की इस इच्छा, उसकी उम्र और पारिवारिक परिस्थितियों को देखते हुए पीठ ने माना कि पिता के मुकाबले मां के पास बच्चा अधिक सुरक्षित रहेगा।
जस्टिस जी. एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने 22 सितंबर को यह फैसला सुनाते हुए मां को पहले दी गई अंतरिम कस्टडी के आदेश को स्थायी कर दिया। यह मामला मां द्वारा अपने बेटे को वापस पाने के लिए दायर की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया।
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की पारिवारिक कलह पर दुख जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि माता-पिता अपने बच्चों के जीवन की कीमत पर आपस में लड़ रहे हैं। पीठ ने रेखांकित किया कि दोनों ही पक्ष समाज के कमजोर तबके से आते हैं और पेशे से मजदूर हैं।
अदालत में बच्चे ने जताई मां के साथ रहने की इच्छा
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने करीब पांच वर्ष के इस बच्चे से सीधे बातचीत की और उससे पूछा कि वह किसके साथ रहना चाहता है। बच्चे ने स्पष्ट शब्दों में अदालत को बताया कि उसकी मां उससे प्यार करती है और वह अपनी मां के साथ ही रहेगा। अदालत ने बच्चे की उम्र और उसके पालन-पोषण के माहौल का आकलन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि पिता की तुलना में मां का संरक्षण बच्चे के लिए कहीं अधिक सुरक्षित है।
पिता ने मानी शराब पीने की बात, दादी ने देखभाल से किया इनकार
अदालत ने दोनों पक्षों के रहन-सहन और घरेलू स्थिति की भी पड़ताल की। बच्चे के पिता ने अदालत को बताया कि वह मजदूरी करता है और महीने में लगभग 10,000 रुपये कमाता है। उसने अपनी पत्नी पर भी कई आरोप लगाए। हालांकि, आदेश में दर्ज है कि पिता ने अदालत के समक्ष यह स्वीकार किया कि वह कभी-कभार शराब का सेवन करता है। उसने यह भी माना कि वह नियमित रूप से होटल में खाना खाता है, हालांकि उसका दावा था कि वह बच्चे के भोजन के लिए कच्चा राशन लाकर देता था।
जब खंडपीठ ने बच्चे की दादी से पूछा कि क्या वह पिता की गैरमौजूदगी में पोते की देखभाल करने को तैयार हैं, तो उन्होंने साफ मना कर दिया। दादी ने कहा कि बच्चे की परवरिश करना उनके बेटे की जिम्मेदारी है और वह यह दायित्व नहीं ले सकतीं। दादी ने अदालत को यह भी बताया कि उनका बेटा परिवार की कोई आर्थिक मदद नहीं करता और खुद होटल में खाना खाता है।
मां और उसके मायके की स्थिति
अदालत के आदेश में मां की परिस्थितियों का भी उल्लेख किया गया है। मां ने अपने पति के साथ वापस रहने से इनकार कर दिया था। वहीं, उसके पिता (बच्चे के नाना) का कहना था कि उनकी बेटी को अपनी ससुराल लौट जाना चाहिए, क्योंकि उनके पास संभालने के लिए अन्य बच्चे भी हैं। नाना ने पहले यह भी बताया था कि महिला और उसकी ननदों के बीच अक्सर विवाद होता रहता था।
‘बच्चे की सुरक्षा और कल्याण ही सर्वोपरि’: हाईकोर्ट
इस कस्टडी विवाद का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित कानूनी सिद्धांतों का हवाला दिया। पीठ ने कहा कि कस्टडी से जुड़े मामलों में किसी भी नाबालिग का कल्याण और उसका हित ही सबसे प्रमुख विचारणीय बिंदु होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कस्टडी केवल किसी माता-पिता या अभिभावक के कानूनी अधिकारों को देखकर तय नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में बच्चे के सामान्य सुख, संतुष्टि, स्वास्थ्य, शिक्षा, बौद्धिक विकास और उसके आसपास के अनुकूल माहौल को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि कस्टडी विवाद मूलतः मानवीय समस्याएं हैं। इन्हें केवल वैधानिक धाराओं की व्याख्या करके या साक्ष्य और प्रक्रिया के कठोर नियमों को लागू करके हल नहीं किया जा सकता। बच्चे की भलाई को केवल धन-दौलत या भौतिक सुख-सुविधाओं से नहीं आंका जा सकता; इसमें नैतिक और चारित्रिक विकास के साथ-साथ भावनात्मक जुड़ाव भी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यदि कोई नाबालिग समझदारी से अपनी प्राथमिकता व्यक्त करने की स्थिति में है, तो अदालत को उसकी इच्छा पर गौर करना चाहिए, यद्यपि अंतिम निर्णय बच्चे के समग्र हित को देखकर ही लिया जाता है।
हाईकोर्ट ने इससे पहले 21 सितंबर को बच्चे की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपी थी। इसके बाद 22 सितंबर को दोनों पक्षों को सुनने के बाद पीठ ने अंतरिम आदेश को स्थायी करते हुए निर्देश दिया कि पुलिस द्वारा मां को सौंपा गया बच्चा आगे भी उसी के संरक्षण में रहेगा।

