चंडीगढ़ राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 72 वर्षीय एक बुजुर्ग यात्री के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मुआवजे की राशि 3,000 रुपये से बढ़ाकर 20,000 रुपये कर दी है। यह मामला आईआरसीटीसी के बुकिंग पोर्टल पर भ्रामक जानकारी देकर रेलवे रिटायरिंग रूम आवंटित करने से जुड़ा है, जहां पोर्टल पर वेस्टर्न टॉयलेट दर्शाया गया था जबकि असल में वहां इंडियन टॉयलेट निकला। राज्य आयोग ने जिला उपभोक्ता फोरम के पुराने फैसले को बदलते हुए कहा कि पहले दी गई 3,000 रुपये की राहत महज ‘सांकेतिक’ थी और यह न्यायसंगत मुआवजे के मानक पर खरी नहीं उतरती।
पीठासीन सदस्य पद्मा पांडे और सदस्य राजेश के. आर्य की पीठ ने 22 सितंबर को दिए फैसले में 20,000 रुपये के मुआवजे के साथ-साथ 333 रुपये की बुकिंग राशि भी भुगतान की तारीख से 9 प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया।
आयोग ने दोनों विपक्षी पक्षों को प्रमाणित आदेश प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर पूरी रकम चुकाने का निर्देश दिया है। यदि तय समय सीमा में भुगतान नहीं किया गया, तो बुकिंग रिफंड पर ब्याज दर बढ़कर 12 प्रतिशत हो जाएगी और 20,000 रुपये के हर्जाने पर भी डिफ़ॉल्ट की तारीख से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
बुकिंग में वेस्टर्न टॉयलेट का वादा, मौके पर मिला इंडियन
मामले के अनुसार, 72 वर्षीय भारतेंदु सूद ने 12 मई 2024 के लिए आईआरसीटीसी के जरिए राजस्थान के चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन पर एक रिटायरिंग रूम बुक किया था। अधिक उम्र और शारीरिक परेशानियों के चलते उन्होंने पोर्टल पर दी गई उस जानकारी पर भरोसा किया, जिसमें कमरे में वेस्टर्न टॉयलेट उपलब्ध होने की बात कही गई थी।
चित्तौड़गढ़ स्टेशन पहुंचने पर जब सूद अपने कमरे में गए, तो वहां वेस्टर्न की जगह इंडियन टॉयलेट मिला। उन्होंने तुरंत स्टेशन अधिकारियों से इसकी शिकायत की। अधिकारियों ने सेवा में इस कमी को स्वीकार किया, जिसके बाद सूद ने कमरे का इस्तेमाल किए बिना ही चाबियां वापस सौंप दीं। उस समय उन्हें आश्वासन दिया गया था कि 333 रुपये का पूरा किराया वापस कर दिया जाएगा।
इसके बावजूद उन्हें रिफंड नहीं मिला। बाद में पश्चिम रेलवे ने यह दावा करते हुए रिफंड देने से इनकार कर दिया कि सेवा का उपयोग कर लिया गया था। रेलवे के इस रुख से परेशान होकर सूद ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाते हुए ब्याज सहित रिफंड, मानसिक प्रताड़ना का मुआवजा और कानूनी खर्च के रूप में 10,000 रुपये की मांग की।
रेलवे और आईआरसीटीसी ने एक-दूसरे पर टाली जिम्मेदारी
शुरुआती सुनवाई के दौरान रेलवे और आईआरसीटीसी दोनों ने ही जिम्मेदारी लेने से पल्ला झाड़ लिया। आईआरसीटीसी का तर्क था कि वह रेलवे से अलग एक स्वतंत्र इकाई है। चित्तौड़गढ़ के रिटायरिंग रूम का संचालन और बिस्तर, फर्नीचर व शौचालयों का रखरखाव पूरी तरह रेलवे के हाथ में है। आईआरसीटीसी ने कहा कि उसके पोर्टल पर दिखने वाला डेटा रेलवे के ‘पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम’ (पीआरएस) से आता है और उसके पास इस जानकारी को स्वतंत्र रूप से जांचने या बदलने का कोई अधिकार नहीं है।
दूसरी ओर, रेलवे प्रशासन ने दलील दी कि यह विवाद आईआरसीटीसी और रतलाम मंडल के तहत आने वाले चित्तौड़गढ़ रिटायरिंग रूम प्रबंधन के बीच का है।
मामले की सुनवाई करते हुए चंडीगढ़ जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग-I ने 2 मार्च 2026 को सूद की शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार कर ली थी। जिला फोरम ने 333 रुपये 9 प्रतिशत ब्याज के साथ लौटाने और मानसिक प्रताड़ना व अदालती खर्च के मद में कुल 3,000 रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया था।
‘सांकेतिक मुआवजे’ पर राज्य आयोग का कड़ा रुख
भारतेंदु सूद ने जिला फोरम के इस फैसले को राज्य आयोग में चुनौती दी। उनकी दलील थी कि कानूनी लड़ाई में लगे समय, मेहनत और खर्च को देखते हुए 3,000 रुपये की राशि बेहद कम है। उन्होंने यह भी कहा कि कानूनी खर्च और मानसिक प्रताड़ना के मुआवजे को एक साथ जोड़ देने से मुकदमे में हुए वास्तविक खर्च का सही आकलन नहीं हो सका।
राज्य आयोग ने अपील स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि उपभोक्ता मामलों में मुआवजा सिर्फ वित्तीय नुकसान की भरपाई तक सीमित नहीं होना चाहिए। पीठ ने कहा कि मुआवजा तय करते समय सेवा प्रदाता की लापरवाही, उसका आचरण, उपभोक्ता के पैसे को रोके रखने की अवधि और उसे हुई मानसिक परेशानी को ध्यान में रखा जाना जरूरी है।
आयोग ने दो टूक शब्दों में कहा कि किसी भी उपभोक्ता को ऐसी अनावश्यक मुकदमेबाजी का बोझ उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जिससे आसानी से बचा जा सकता था। बुनियादी सेवा से वंचित किए जाने पर मिलने वाला हर्जाना केवल नाममात्र का नहीं हो सकता।

