अनुकंपा नियुक्ति पाकर बुजुर्ग सास-ससुर को बेसहारा नहीं छोड़ सकती बहू: राजस्थान हाईकोर्ट ने विधवा सास के लिए वेतन से 25% कटौती का दिया निर्देश

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ के जस्टिस आनंद शर्मा ने स्पष्ट किया है कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने वाला व्यक्ति बाद में मृतक कर्मचारी के आश्रित परिजनों की देखरेख के दायित्व से पीछे नहीं हट सकता। हाईकोर्ट ने माना कि शपथ पत्र देकर नौकरी हासिल करने वाली बहू अपने बुजुर्ग सास-ससुर को बेसहारा नहीं छोड़ सकती। अदालत ने नियोक्ता कंपनी अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (एवीवीएनएल) को निर्देश दिया कि वह बहू के नियमित मासिक वेतन से 25 प्रतिशत राशि काटकर सीधे उसकी विधवा सास के बैंक खाते में आजीवन भेजे, साथ ही मृतक के बकाया सेवा परिलाभों (टर्मिनल बेनिफिट्स) का आधा हिस्सा भी सास को जारी करे।

मामले की पृष्ठभूमि

मृतक कर्मचारी अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में टेक्निकल हेल्पर के पद पर कार्यरत था और परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था। 24 मार्च 2017 को उसके आकस्मिक निधन के बाद उसकी पत्नी (प्रतिवादी संख्या 3) ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। मृतक के माता-पिता ने इसके लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) प्रस्तुत किया, जबकि पत्नी ने शपथ पत्र देकर यह वचन दिया कि वह परिवार के अन्य सदस्यों का भरण-पोषण करेगी। इसके आधार पर निगम ने 30 अगस्त 2017 को आदेश जारी कर उसे कनिष्ठ लिपिक (एलडीसी) के पद पर अनुकंपा नियुक्ति प्रदान कर दी।

हालांकि, नियुक्ति मिलने के बाद बहू ने ससुराल छोड़ दिया, दूसरा विवाह कर लिया और अपने दिवंगत पति के माता-पिता को भरण-पोषण देना पूरी तरह बंद कर दिया। याचिका हाईकोर्ट में लंबित रहने के दौरान ससुर का निधन हो गया, जिसके बाद केवल बुजुर्ग सास ही जीवित याचिकाकर्ता रह गईं।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया कि दिवंगत कर्मचारी ही परिवार का एकमात्र आर्थिक संबल था और बहू को नौकरी इसी शर्त व वचन पर मिली थी कि वह शेष परिजनों की देखभाल करेगी। वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता अत्यंत विपन्नावस्था में पहुंच गए और उनके पास रोजमर्रा के जीवन यापन का भी कोई साधन नहीं बचा, क्योंकि उनके अन्य दो पुत्र बेरोजगार हैं और कोई वित्तीय सहायता देने की स्थिति में नहीं हैं। इसलिए याचिकाकर्ताओं ने बहू के वेतन का एक हिस्सा नियमित रूप से उन्हें दिलाए जाने और मृतक के बकाया सेवा परिलाभों को बराबर विभाजित करने की मांग की।

नियोक्ता निगम की ओर से पेश वकील ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति इसी उम्मीद और धारणा के तहत दी गई थी कि वह दिवंगत कर्मचारी के परिवार का भरण-पोषण करेगी। निगम ने स्पष्ट किया कि अदालत के निर्देशानुसार वेतन में से कटौती करने और बकाया परिलाभों का बंटवारा करने में उसे कोई आपत्ति नहीं है। निगम के वकील ने यह भी बताया कि मृतक का बकाया वेतन और उपार्जित अवकाश का भुगतान पहले ही बहू को किया जा चुका है, जबकि अन्य परिलाभ पारिवारिक विवाद के कारण रोक कर रखे गए थे।

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वहीं बहू (प्रतिवादी संख्या 3) के वकील ने तर्क दिया कि ससुराल में उसके साथ उचित व्यवहार नहीं किया गया, जिसके चलते उसे घर छोड़ना पड़ा। वकील ने कहा कि ससुर के निधन के बाद अब सास की देखभाल उसके दो जीवित बेटे कर सकते हैं, इसलिए उस पर वेतन या सेवा परिलाभ साझा करने का अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जाना चाहिए। हालांकि, वकील ने यह स्वीकार किया कि अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करने के बाद उसने दूसरा विवाह कर लिया है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति योजना का मूल उद्देश्य परिवार के कमाने वाले सदस्य की असमय मृत्यु से उत्पन्न गंभीर आर्थिक संकट से परिजनों को उबारना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों के अंतर्गत परिवार की परिभाषा में केवल मृतक की पत्नी ही नहीं, बल्कि उसके माता-पिता और अन्य आश्रित भी शामिल हैं।

शपथ पत्र देकर मुकरने के आचरण पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि जिस वचनबद्धता के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति का लाभ प्राप्त किया गया था, बाद में उससे खुद को अलग नहीं किया जा सकता। जस्टिस आनंद शर्मा ने टिप्पणी की:

“यह कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता कि पति की मृत्यु के बाद, उसके स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति पाने वाली बहू, बाद में अपने वृद्ध सास-ससुर को छोड़ दे और उन्हें किस्मत के भरोसे रहने के लिए विवश कर दे।”

अदालत ने इस संबंध में अपनी समन्वय पीठ द्वारा भगवान सिंह बनाम अधीक्षण अभियंता पावस, अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड [2025 लाइव-लॉ (राज) 364] मामले में दिए गए निर्णय पर भरोसा जताया, जिसमें माना गया था कि अनुकंपा नियुक्ति कोई व्यक्तिगत अधिकार या योग्यता पर आधारित पद नहीं है, बल्कि यह एक कल्याणकारी व्यवस्था है जो अपने साथ एक निहित विश्वास और जिम्मेदारी लेकर आती है।

समन्वय पीठ के फैसले को उद्धृत करते हुए अदालत ने रेखांकित किया:

“यह स्थापित कानून है कि अनुकंपा नियुक्ति कोई निहित अधिकार नहीं बल्कि एक अनुग्रह है, जिसका उद्देश्य मृतक सरकारी कर्मचारी के परिवार की आर्थिक कठिनाई को कम करना है। यह एक कल्याणकारी उपाय है, न कि रोजगार का सामान्य जरिया। इसलिए प्रतिवादी संख्या 4 को दी गई नियुक्ति अपने साथ एक अंतर्निहित विश्वास आधारित दायित्व लेकर आई थी कि इस रोजगार से प्राप्त होने वाले वेतन और लाभों का उपयोग मृतक कर्मचारी के पारिवारिक इकाई के भरण-पोषण के लिए किया जाएगा। प्रतिवादी संख्या 4, जिसने अपने निष्ठापूर्ण हलफनामे के बल पर यह रोजगार प्राप्त किया, अब उस वादे से मुकर नहीं सकती जो उसे मिले लाभ का मूल आधार था। उसे ऐसा करने की अनुमति देना स्वयं अनुकंपा योजना के साथ धोखाधड़ी करने की अनुमति देने जैसा होगा।”

हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि यह सिद्धांत राजस्थान मृतक सरकारी कर्मचारियों के आश्रितों की अनुकंपा नियुक्ति नियम, 1996 की मूल भावना में समाहित है:

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“फलस्वरूप, जब ऐसे परिवार के किसी एक सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ दिया जाता है, तो यह नियुक्ति व्यक्तिगत हैसियत से नहीं बल्कि पूरे परिवार के प्रतिनिधि के रूप में दी जाती है। इसलिए इसके साथ अन्य जीवित आश्रितों के हितों की रक्षा करने और उनका भरण-पोषण तथा कल्याण सुनिश्चित करने का तदनुरूपी नैतिक और कानूनी दायित्व भी जुड़ा होता है।”

समन्वय पीठ के इन निष्कर्षों से पूर्ण सहमति व्यक्त करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ससुराल छोड़कर जाना, पुनर्विवाह करना और सास-ससुर को भरण-पोषण न देना अनुकंपा नियुक्ति योजना की मूल भावना का खुला उल्लंघन है।

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हाईकोर्ट का निर्णय

रिट याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने बुजुर्ग सास के जीवन यापन को सुरक्षित करने के लिए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड को निर्देश दिया जाता है कि वह प्रतिवादी संख्या 3 के नियमित मासिक वेतन से 25 प्रतिशत की कटौती करे और इस राशि को सीधे याचिकाकर्ता सास के बैंक खाते में जमा कराए। सास 15 दिनों के भीतर निगम कार्यालय में अपने बैंक खाते का विवरण प्रस्तुत करेंगी। यह व्यवस्था सास के जीवित रहने तक निरंतर जारी रहेगी।
  2. नियोक्ता निगम को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वह दिवंगत कर्मचारी के शेष सेवा परिलाभ 30 दिनों के भीतर जारी करे और इसे सास व बहू के बीच बराबर (50-50 प्रतिशत) विभाजित करे, जिसमें सास का 50 प्रतिशत हिस्सा सीधे उनके बैंक खाते में भेजा जाए।

सभी लंबित आवेदनों को इसी अनुसार निस्तारित कर दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्री चौथ मल वर्मा व अन्य बनाम अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड व अन्य वाद संख्या: एस.बी. सिविल रिट याचिका संख्या 1203/2018 पीठ: जस्टिस आनंद शर्मा निर्णय की तिथि: 17/09/2026

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