कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के परिवार द्वारा संचालित ‘सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट’ को साल 2010 में नागरिक सुविधा (सीए) भूखंड आवंटित किए जाने के मामले में बेंगलुरु की एक विशेष अदालत ने कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस से 6 अक्टूबर तक जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है और यह निर्देश भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता विजयराघव मराठे की उस याचिका पर आया है, जिसमें आवंटन में हुए कथित भ्रष्टाचार की पुलिस जांच कराने की मांग की गई है।
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद यह मामला दूसरी बार विशेष अदालत के समक्ष पहुंचा है। 18 सितंबर को जारी अपने आदेश में विशेष अदालत ने स्पष्ट किया कि शिकायत में मौजूद तकनीकी खामी अब दूर कर ली गई है, इसलिए इस याचिका पर आगे बढ़ने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि शिकायत में लगाए गए कथित गैर-कानूनी कृत्यों के आरोपों में प्रथम दृष्टया तथ्य नजर आते हैं।
अदालती कार्यवाही और तकनीकी खामी का समाधान
इस याचिका पर पहले भी कानूनी प्रक्रियाएं चली हैं। इससे पहले 11 अगस्त को विशेष अदालत ने मामले की पुलिस जांच का आदेश देने से इनकार कर दिया था। उस समय अदालत ने कहा था कि आरोपों के समर्थन में कानूनी हलफनामा पेश नहीं किया गया है, लिहाजा वह खुद ही इस मामले की पड़ताल करेगी।
याचिकाकर्ता विजयराघव मराठे ने विशेष अदालत के इस फैसले को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 18 अगस्त को सुनवाई करते हुए कहा कि हलफनामा न होना एक ऐसी खामी है जिसे सुधारा जा सकता है। अदालत ने शिकायतकर्ता को यह कमी दूर करने का अवसर देने का निर्देश दिया। इसके बाद मराठे ने 10 सितंबर 2026 को आवश्यक हलफनामा दाखिल कर प्रक्रियागत खामी को दूर कर दिया, जिसके आधार पर विशेष अदालत ने लोकायुक्त पुलिस से उसका पक्ष तलब किया।
भाजपा सरकार के दौरान 50 फीसदी रियायत पर हुआ था आवंटन
विवाद के केंद्र में बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (बीडीए) का 8,001 वर्ग मीटर का एक नागरिक सुविधा भूखंड है। वर्ष 2010 में बी.एस. येदियुरप्पा के नेतृत्व वाली तत्कालीन भाजपा सरकार ने यह जमीन सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट को एक शैक्षणिक संस्थान की स्थापना के लिए आवंटित की थी।
यह आवंटन 50 प्रतिशत की विशेष छूट के साथ 1 करोड़ रुपये में किया गया था, जबकि मौजूदा समय में इस संपत्ति का बाजार मूल्य 10 करोड़ रुपये से अधिक आंका गया है। शिकायत के अनुसार, ट्रस्ट ने अनुसूचित जाति समुदाय के कल्याण के लिए काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था होने के आधार पर रियायती दर पर जमीन हासिल की थी।
जमीन का गैर-इस्तेमाल और कानूनी पेच
शिकायतकर्ता का आरोप है कि रियायती दर पर जमीन हासिल करने के बावजूद ट्रस्ट ने तय उद्देश्य के लिए इस संपत्ति का इस्तेमाल नहीं किया। इसके बाद के वर्षों में यह भूखंड अन्य कानूनी विवादों में भी घिर गया, जब भाजपा सरकार ने निजी व्यक्तियों के हित में इसे बीडीए के अधिग्रहण से डिनोटिफाई कर दिया था।
वर्ष 2021 में हाईकोर्ट ने जमीन का उपयोग न होने के आधार पर बीडीए के मूल भूमि अधिग्रहण को निरस्त कर दिया था। हालांकि, सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट ने आवंटित जमीन पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए अदालत से स्थगन आदेश (स्टे) हासिल कर लिया था।
याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी है कि इस पूरे मामले की जांच किसी पुलिस एजेंसी से ही कराई जानी चाहिए, क्योंकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लोक सेवकों से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों की तहकीकात के लिए विशेषज्ञ जांच तंत्र का स्पष्ट प्रावधान किया गया है।

