इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के अधिकारी रोहित पांडे की सेवा समाप्ति का आदेश रद्द करते हुए उन्हें तत्काल बहाल करने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निर्धारित अनिवार्य धार्मिक रीतियां पूरी न की जाएं, तब तक केवल आर्य समाज मंदिर का प्रमाण पत्र किसी वैध हिंदू विवाह को साबित नहीं कर सकता।
जस्टिस राजीव सिंह की पीठ ने एसएसबी द्वारा 28 अप्रैल 2022 को जारी बर्खास्तगी आदेश को खारिज करते हुए अधिकारी को तुरंत ड्यूटी पर वापस लेने का आदेश सुनाया। अदालत ने कहा कि बर्खास्तगी की तारीख से लेकर फैसले के दिन तक की अवधि को ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ के सिद्धांत पर आंका जाएगा, लेकिन इसे उनकी सेवा में किसी भी प्रकार का ब्रेक (व्यवधान) नहीं माना जाएगा।
विवाह की अनिवार्य रीतियों का अभाव
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल आर्य समाज मंदिर का प्रमाण पत्र रिकॉर्ड पर रख देने भर से यह नहीं माना जा सकता कि विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक संपन्न हुआ था।
अदालत ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के 1971 के ऐतिहासिक फैसले ‘प्रिया बाला घोष बनाम सुरेश चंद्र घोष’ का हवाला दिया, जिसमें हिंदू विवाह को कानूनी मान्यता मिलने के लिए जरूरी रस्मों-रिवाजों को पूरा करना अनिवार्य ठहराया गया था। पीठ ने रेखांकित किया कि कानूनी रूप से रीतियों के बिना हुआ कथित विवाह ‘कानून की नजर में’ विवाह नहीं माना जा सकता। इसलिए इसे आधार बनाकर पांडे को सेवा के अयोग्य ठहराना या बर्खास्त करना अनुचित था।
वैवाहिक स्थिति को लेकर विवाद
रोहित पांडे के खिलाफ यह अनुशासनात्मक कार्रवाई सुचेता तिवारी नामक महिला की शिकायत के बाद शुरू हुई थी। शिकायतकर्ता का दावा था कि अगस्त 2007 में एक आर्य समाज मंदिर में उनका और पांडे का विवाह हुआ था।
इस शिकायत के आधार पर एसएसबी ने माना कि पांडे ने बल में शामिल होते समय खुद को अविवाहित बताकर अपनी वैवाहिक स्थिति के बारे में झूठी घोषणा की थी। इसी आधार पर अर्धसैनिक बल के अधिकारियों ने उन्हें सेवा से हटाने का आदेश जारी किया था।
बयानों और साक्ष्यों में विरोधाभास
विभागीय जांच के दौरान एसएसबी ने शिकायतकर्ता के बयानों, नोटरी प्रमाण पत्रों और मंदिर के पुजारी की गवाही पर भरोसा किया था, जिसमें पुजारी ने दावा किया था कि विवाह उनकी मौजूदगी में हुआ था।
दूसरी ओर, पांडे ने इस कथित विवाह को नकारते हुए तर्क दिया कि हिंदू विवाह के लिए अनिवार्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होने का कोई साक्ष्य नहीं है। उन्होंने इस संबंध में एक अन्य आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में दर्ज सुचेता तिवारी के अपने बयान का भी हवाला दिया। उस बयान में शिकायतकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया था कि यह विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न नहीं कराया गया था।
शिकायतकर्ता द्वारा अदालत में रीतियां पूरी न होने की बात स्वीकार किए जाने को संज्ञान में लेते हुए हाईकोर्ट ने माना कि वर्ष 2007 के कथित विवाह का कोई कानूनी आधार नहीं है, जिसके चलते बर्खास्तगी का आदेश टिकने योग्य नहीं रहा।

