पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) को निर्देश दिया है कि वह दिल का दौरा पड़ने से जान गंवाने वाले 30 वर्षीय सरकारी कर्मचारी के पिता को 5 लाख रुपये के मृत्यु दावे (डेथ क्लेम) का भुगतान करे। आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी मृतक द्वारा बीमारी छिपाने के अपने दावे को साबित करने में नाकाम रही है और क्लेम को खारिज करना सीधे तौर पर सेवा में कमी का मामला है।
आयोग के अध्यक्ष अशोक कुमार गर्ग और सदस्य तजिंदर कौर की पीठ ने 1 सितंबर को यह आदेश जारी किया। पीठ ने एलआईसी के फैसले को अनुचित और गैरकानूनी बताते हुए निर्देश दिया कि बीमा राशि के साथ-साथ शिकायतकर्ता को मानसिक उत्पीड़न और अदालती खर्च के एवज में 10,000 रुपये का अतिरिक्त भुगतान भी किया जाए।
बचपन की सर्जरी छिपाने का आरोप लगाकर खारिज किया था क्लेम
मामले के विवरण के अनुसार, 30 वर्षीय मृतक ने अप्रैल 2022 में एलआईसी से 5 लाख रुपये की बीमा पॉलिसी ली थी, जिसकी परिपक्वता अवधि अप्रैल 2043 निर्धारित थी। पॉलिसी में उन्होंने अपने पिता को नॉमिनी बनाया था। अगस्त 2023 में दिल का दौरा पड़ने से उनका असामयिक निधन हो गया।
इसके बाद जब पिता ने बीमा क्लेम पेश किया, तो एलआईसी ने जनवरी 2024 में इसे यह कहकर नामंजूर कर दिया कि पॉलिसीधारक ने आवेदन के समय अपनी पुरानी स्वास्थ्य समस्याओं की जानकारी छिपाई थी। बीमा कंपनी के अनुसार, मृतक के दिल में जन्मजात छेद था और साल 2008 में उनकी एएसडी/वीएसडी क्लोजर और फॉन्टन ओपन-हार्ट सर्जरी की गई थी। कंपनी की दलील थी कि प्रस्ताव फॉर्म में स्वास्थ्य से जुड़े सवालों का उत्तर नकारात्मक दिया गया था, जबकि यदि इस सर्जरी की जानकारी पहले दी जाती, तो पॉलिसी जारी ही नहीं की जाती। इसके खिलाफ दायर अपील भी एलआईसी ने खारिज कर दी थी।
अस्पताल का कोई रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी बीमा कंपनी
इस अस्वीकृति के खिलाफ पिता ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि जिस सर्जरी का हवाला दिया जा रहा है, वह उनके बेटे के नाबालिग रहने के दौरान यानी पॉलिसी खरीदने से 14 साल से भी अधिक समय पहले हुई थी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बचपन की उस प्रक्रिया और दिल का दौरा पड़ने से हुई मौत के बीच कोई संबंध साबित नहीं होता।
सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि एलआईसी ने रिजेक्शन लेटर में 2008 की सर्जरी का उल्लेख तो किया, लेकिन इसके समर्थन में अस्पताल या इलाज से जुड़ा कोई भी मेडिकल रिकॉर्ड आयोग के समक्ष पेश नहीं किया।
इसके अतिरिक्त, बीमा कंपनी द्वारा साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किया गया प्रस्ताव फॉर्म सिर्फ दो पन्नों का था। उस पर न तो आवेदन जमा करने की तारीख दर्ज थी और न ही मृतक के हस्ताक्षर मौजूद थे। इस आधार पर आयोग ने इस दस्तावेज की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया।
14 साल के अंतराल से दुर्भावना या धोखाधड़ी की मंशा खारिज
आयोग ने इस तथ्य पर विशेष ध्यान दिया कि मृतक 30 वर्ष के थे और सरकारी सेवा में कार्यरत थे, जहां नियुक्ति से पूर्व स्वास्थ्य परीक्षण और मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य होता है।
आयोग ने स्पष्ट किया कि यदि यह मान भी लिया जाए कि 2008 में कोई मेडिकल प्रक्रिया हुई थी, तब भी पॉलिसी करीब 14-15 साल बाद अप्रैल 2022 में खरीदी गई थी। इतने लंबे समय के अंतराल और अगस्त 2023 में हुई मौत को देखते हुए यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पॉलिसीधारक ने किसी दुर्भावना या गंभीर बीमारी की जानकारी रखते हुए धोखे से पॉलिसी ली थी। आयोग ने माना कि पुख्ता चिकित्सा साक्ष्य के बिना केवल पुरानी बीमारी का आरोप लगाकर डेथ क्लेम को खारिज नहीं किया जा सकता।

