पत्नी से प्रताड़ना के मामले में अमेरिका में रह रहे डॉक्टर पर चलेगा केस, दिल्ली हाईकोर्ट ने अमानत में खयानत का आरोप किया खारिज

दिल्ली हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक आपराधिक मामले में अमेरिका में प्रैक्टिस कर रहे भारतीय मूल के डॉक्टर को आंशिक राहत देते हुए अमानत में खयानत के आरोपों को निरस्त कर दिया है। हालांकि, अदालत ने पत्नी द्वारा लगाए गए घरेलू हिंसा और प्रताड़ना के आरोपों की गंभीरता को देखते हुए डॉक्टर और उनके परिजनों के खिलाफ मुकदमा रद्द करने से इनकार कर दिया है।

जस्टिस मधु जैन की पीठ ने 16 सितंबर को फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि स्त्रीधन और जेवर न लौटाने के संबंध में आपराधिक विश्वासघात (अमानत में खयानत) का मामला पति के खिलाफ नहीं टिकता, क्योंकि शिकायतकर्ता ने गहने सीधे अपने पति को सौंपने का कोई दावा नहीं किया था। इसके बावजूद, पीठ ने माना कि महिला द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोप इतने ठोस और स्पष्ट हैं कि उनकी सच्चाई केवल निचली अदालत के ट्रायल में ही परखी जा सकती है।

निचली अदालत में परखे जाएंगे क्रूरता और प्रताड़ना के आरोप

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि पत्नी की शिकायत में लगातार गाली-गलौज, अपमान, शारीरिक तथा यौन उत्पीड़न के साथ-साथ गंभीर वित्तीय मांगों का सिलसिलेवार ब्योरा दिया गया है। महिला का आरोप है कि आरोपियों ने एक इनोवा गाड़ी, डॉक्टर के भाई को 7 लाख रुपये नकद और अस्पताल की स्थापना व जमीन खरीदने के नाम पर करीब 16 से 17 करोड़ रुपये की भारी रकम की मांग की थी।

जस्टिस जैन ने कहा कि एफआईआर रद्द करने की इस आरंभिक अवस्था में यदि महिला के बयानों को प्रथम दृष्टया स्वीकार किया जाए, तो यह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए के तहत प्रताड़ना और क्रूरता का स्पष्ट मामला दर्शाते हैं। अदालत ने कहा कि इन आरोपों को मुकदमे के दौरान साबित किया जा सकता है या नहीं, इसका निर्णय करने का पूरा अधिकार केवल संबंधित ट्रायल कोर्ट के पास है।

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स्त्रीधन और अमानत में खयानत का मामला निरस्त

आपराधिक विश्वासघात के आरोप पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि पति के संदर्भ में इस कानूनी अपराध की बुनियादी शर्तें पूरी नहीं होती हैं।

शिकायत के मुताबिक, महिला ने अपने गहने अपनी ननद को सौंपे थे। पूरे मामले में ऐसा कोई आरोप नहीं है कि वे गहने बाद में पति के सुपुर्द किए गए या उसके प्रत्यक्ष नियंत्रण में आए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनन किसी भी मुकदमे को अपराध-वार आंशिक रूप से निरस्त किया जा सकता है। इसी आधार पर अदालत ने डॉक्टर के खिलाफ अमानत में खयानत की कार्यवाही को खत्म कर दिया, जबकि प्रताड़ना से जुड़े बाकी मामले को यथावत बरकरार रखा।

विदेशी अदालत में तलाक और पृष्ठभूमि

यह डॉक्टर वर्ष 1995 से अमेरिका में रह रहे हैं। दोनों का विवाह 16 अक्टूबर 2007 को हुआ था। इस शादी से दोनों की कोई संतान नहीं हुई। शादी के फौरन बाद दोनों अलग रहने लगे; डॉक्टर वापस अमेरिका चले गए जबकि पत्नी भारत में ही रहीं।

पति ने बाद में पत्नी के लिए अमेरिकी स्पाउसल वीजा की अर्जी लगाई, जिसे अमेरिकी दूतावास ने 2010 में खारिज कर दिया। इसके बाद पति ने अमेरिका के मिसौरी राज्य की एक अदालत में विवाह निरस्तीकरण की याचिका दायर की। मिसौरी की अदालत ने महिला के आपराधिक रिकॉर्ड और अमेरिका में प्रवेश न मिल पाने के तथ्यों को आधार बनाते हुए जनवरी 2015 में धोखाधड़ी के आधार पर शादी को शून्य घोषित कर दिया। इसके बाद डॉक्टर ने 2018 में दिल्ली की एक फैमिली कोर्ट में भी वैवाहिक विवाद का केस दर्ज कराया था, जिसे बाद में उन्होंने वापस ले लिया।

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हाईकोर्ट ने कहा कि अमेरिकी अदालत की डिक्री, वीजा से जुड़े रिकॉर्ड और इमिग्रेशन वकीलों से पत्राचार जैसे दस्तावेज भारत में दर्ज कराए गए क्रूरता के आरोपों को स्वतः या निर्णायक रूप से खारिज नहीं कर सकते।

समयसीमा और लगातार जारी रहने वाला अपराध

यह विवाद फरवरी 2019 में तब कानूनी रूप से सामने आया जब महिला ने दिल्ली पुलिस के क्राइम अगेंस्ट विमेन सेल में दहेज प्रताड़ना, नकदी, गाड़ी, अस्पताल व जमीन के लिए 16-17 करोड़ रुपये की मांग और गहने न लौटाने की शिकायत दर्ज कराई। जांच के बाद पुलिस ने अप्रैल 2022 में चार्जशीट दाखिल कर डॉक्टर को मुकदमे के लिए ट्रायल कोर्ट भेजा। इसके बाद आरोपी ने पूरी कार्यवाही और एफआईआर रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। साल 2024 में अदालत के निर्देश पर दोनों पक्षों को मध्यस्थता केंद्र भी भेजा गया था, लेकिन बातचीत बेनतीजा रही।

याचिकाकर्ता की इस दलील को भी अदालत ने खारिज कर दिया कि यह मामला समयसीमा (लिमिटेशन) से बाधित है क्योंकि कथित प्रताड़ना की आखिरी घटना 2012 की बताई गई है। हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 498ए के तहत प्रताड़ना एक ‘कंटीन्यूइंग ऑफेंस’ (लगातार जारी रहने वाला अपराध) है, जहां हर नया कृत्य समयसीमा की नई शुरुआत करता है। जस्टिस जैन ने कहा कि तकनीकी सीमा के आधार पर केस को सीधे खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि समयसीमा की गणना में आरोपी के भारत से बाहर रहने की अवधि को घटाया जाना पड़ सकता है।

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