सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक धार्मिक या धर्मार्थ ट्रस्ट से जुड़े मामले में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 92 के तहत मुकदमा दायर करने की अनुमति मांगने वाला आवेदन लंबित रहने के दौरान सिविल कोर्ट कोई संरक्षणात्मक या संपत्ति को सुरक्षित रखने वाला अंतरिम आदेश पारित नहीं कर सकता। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि धारा 92 के तहत मुकदमा शुरू होने के लिए कोर्ट की अनुमति एक अनिवार्य पूर्व शर्त है और अनुमति मिलने तक ऐसा कोई लंबित मुकदमा नहीं होता, जिसमें अंतरिम आवेदन पर आदेश दिया जा सके।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि परिस्थितियों में तत्काल राहत की आवश्यकता हो तो कोर्ट लिखित रूप से ठोस कारण दर्ज कर प्रतिवादियों को पहले नोटिस दिए बिना भी मुकदमा दायर करने की अनुमति दे सकता है। कोर्ट ने इसी स्पष्टीकरण के साथ कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अपीलें खारिज कर दीं।
मामला कैसे सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
विवाद पीपुल्स एजुकेशन ट्रस्ट के प्रबंधन से जुड़ा था। प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज, मांड्या ने 2 मई 2025 को CPC के ऑर्डर XL रूल 1(a) के तहत मौजूदा ट्रस्टियों की एक एड-हॉक कमेटी गठित की थी, जिसे अगले आदेश तक ट्रस्ट के रोजमर्रा के कामकाज का प्रबंधन सौंपा गया था।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने 25 जून 2025 को यह आदेश रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने पहले के दृष्टिकोण को दोहराते हुए कहा था कि धारा 92 के तहत अनुमति मिलने से पहले मुकदमा अस्तित्व में नहीं आता और इस चरण में सिविल कोर्ट के पास अंतरिम आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि जब धारा 92 के तहत plaint के साथ मुकदमा दायर करने की अनुमति का आवेदन भी दिया गया हो, तो क्या सिविल कोर्ट उस आवेदन के निस्तारण से पहले कोई संरक्षणात्मक अंतरिम आदेश पारित कर सकता है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर अलग-अलग हाईकोर्ट के परस्पर विरोधी फैसलों का भी उल्लेख किया।
अपीलकर्ताओं की दलील
अपीलकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट डॉ. आदित्य सोंधी ने दलील दी कि धारा 92 के तहत आवेदन कोर्ट के सामने आने के बाद कोर्ट को अनुमति दिए जाने तक केवल ‘मूक दर्शक’ बनाकर नहीं रखा जा सकता।
उनका कहना था कि कोर्ट धारा 94 के साथ ऑर्डर XL रूल 1 के तहत रिसीवर नियुक्त कर सकता है। इसके अलावा, CPC की धारा 151 के तहत कोर्ट के पास न्याय के उद्देश्य को सुरक्षित रखने और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक अंतरिम आदेश देने की अंतर्निहित शक्ति भी है।
अपीलकर्ताओं ने यह भी कहा कि धारा 92 के तहत अनुमति मांगने वाला आवेदन अपने आप में एक सिविल कार्यवाही है और ऑर्डर XL रूल 1 रिसीवर की नियुक्ति को केवल पहले से लंबित मुकदमों तक सीमित नहीं करता।
प्रतिवादियों की दलील
प्रतिवादियों की ओर से सीनियर एडवोकेट राघवेंद्र एस. श्रीवत्स और एडवोकेट अमित पई ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि केवल इसलिए कि कर्नाटक सिविल रूल्स ऑफ प्रैक्टिस के तहत अनुमति के आवेदन को अलग याचिका के रूप में रजिस्टर्ड किया जाता है, वह अपने आप में मूल या substantive proceeding नहीं बन जाता।
उनका कहना था कि धारा 92 के तहत अनुमति मिलने के बाद ही मुकदमा विधिवत शुरू माना जाता है। इसलिए उससे पहले रिसीवर की नियुक्ति के लिए ऑर्डर XL रूल 1 के तहत आवेदन पर विचार नहीं किया जा सकता।
धारा 92 के तहत अनुमति मुकदमे की अनिवार्य पूर्व शर्त
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 92 की योजना का विश्लेषण करते हुए कहा कि सार्वजनिक धर्मार्थ या धार्मिक उद्देश्य के लिए बनाए गए ट्रस्ट में कथित breach of trust के संबंध में मुकदमा एडवोकेट जनरल या ट्रस्ट में हित रखने वाले दो या अधिक व्यक्तियों द्वारा कोर्ट की अनुमति प्राप्त करने के बाद ही दायर किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि 1976 के संशोधन के बाद दो या अधिक व्यक्तियों द्वारा दायर किए जाने वाले मुकदमों में एडवोकेट जनरल की सहमति की जगह कोर्ट से अनुमति लेने की अनिवार्य शर्त लाई गई। इसलिए कोर्ट की अनुमति प्राप्त करना धारा 92 के तहत मुकदमा दायर करने की अनिवार्य पूर्व शर्त है।
धारा 92 के उद्देश्य को समझाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“यह प्रावधान सार्वजनिक ट्रस्ट की संपत्ति को कुप्रबंधन से बचाने और साथ ही ट्रस्ट को परेशान करने वाली तथा दुर्भावनापूर्ण मुकदमेबाजी से सुरक्षित रखने के बीच एक नाजुक संतुलन बनाता है। इसलिए यह एक ‘सुरक्षात्मक ढाल’ और ‘उपचारात्मक तलवार’, दोनों है।”
कोर्ट ने Operation Asha v. Shelly Batra and Ors. का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 92 के तहत मुकदमे की maintainability के लिए तीन शर्तों का एक साथ पूरा होना जरूरी है। ट्रस्ट सार्वजनिक धर्मार्थ या धार्मिक उद्देश्य के लिए बनाया गया हो, ट्रस्ट में breach हुआ हो या उसके प्रशासन के लिए कोर्ट के निर्देशों की आवश्यकता हो और मांगी गई राहत धारा 92(1) में बताई गई राहतों में से हो।
अनुमति पर विचार केवल ‘Threshold Proceeding’
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों की इस दलील को स्वीकार किया कि अनुमति के आवेदन को अलग याचिका के रूप में रजिस्टर्ड किए जाने मात्र से वह substantive proceeding नहीं बन जाता। कोर्ट ने अनुमति पर विचार को ‘threshold proceeding’ माना।
पीठ ने कहा:
“इसलिए धारा 92 के तहत अनुमति मिलना एक आवश्यक और अनिवार्य पूर्व शर्त है, जिसके अभाव में ऐसी कोई लंबित कार्यवाही अस्तित्व में नहीं होती जिसमें अंतरिम आवेदनों पर विचार किया जा सके।”
कोर्ट ने यह भी माना कि धारा 94 के तहत supplemental proceedings के लिए पहले से किसी मूल कार्यवाही का अस्तित्व जरूरी है। ऑर्डर XL रूल 1 के तहत आवेदन को धारा 92 में अनुमति लेने की अनिवार्य प्रक्रिया को दरकिनार करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
“इसलिए जब तक अनुमति नहीं दी जाती, कोर्ट के सामने कोई lis नहीं होती और परिणामस्वरूप supplemental powers का प्रयोग करने का कोई अधिकार क्षेत्र भी नहीं होता।”
धारा 151 की अंतर्निहित शक्ति का भी सहारा नहीं लिया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया कि धारा 151 CPC की अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल कर अनुमति से पहले रिसीवर नियुक्त किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि धारा 92 एक विशेष प्रावधान है और उसमें दिए गए safeguards का पालन किए बिना अंतरिम आदेश पारित नहीं किए जा सकते। इसी तरह धारा 141 के जरिए भी धारा 92 के तहत पक्षकारों को मिले substantive safeguards को बदला या दरकिनार नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा:
“अंतर्निहित शक्तियों और वैधानिक व्याख्या के सिद्धांतों का इस्तेमाल केवल वहीं किया जा सकता है, जहां अधिकार क्षेत्र पहले से मौजूद हो।”
अनुमति से पहले रिसीवर की नियुक्ति नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी कि रिसीवर की नियुक्ति केवल संपत्ति की सुरक्षा के लिए होती है, इसलिए इसे अनुमति मिलने से पहले भी किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा:
“जिस कोर्ट के पास अधिकार क्षेत्र ही नहीं है, वह केवल इस आधार पर अधिकार क्षेत्र ग्रहण नहीं कर सकता कि मांगी गई राहत को किस प्रकार बताया गया है।”
पीठ ने कहा कि सार्वजनिक ट्रस्ट में रिसीवर की नियुक्ति को केवल संरक्षणात्मक कदम नहीं माना जा सकता। ऐसी नियुक्ति ट्रस्ट के मौजूदा प्रबंधन को हटा सकती है। यदि बाद में मुकदमा दायर करने की अनुमति ही खारिज हो जाए, तो इस बीच रिसीवर नियुक्त किए जाने से ट्रस्ट के प्रबंधन पर प्रतिकूल असर पड़ चुका होगा।
तत्काल राहत जरूरी हो तो बिना नोटिस भी दी जा सकती है अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही उन परिस्थितियों का समाधान भी बताया जहां सार्वजनिक ट्रस्ट की संपत्ति को बचाने के लिए तत्काल अंतरिम राहत जरूरी हो सकती है।
कोर्ट ने कहा कि सामान्य रूप से प्रस्तावित प्रतिवादियों को नोटिस देने के बाद ही धारा 92 के तहत अनुमति दी जानी चाहिए। लेकिन यदि मामले में compelling urgency हो तो पहले नोटिस देना अनिवार्य नहीं है। ऐसी स्थिति में कोर्ट अत्यधिक सावधानी बरतते हुए ex parte अनुमति दे सकता है। प्रतिवादी बाद में उस अनुमति को वापस लेने की मांग कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सवाल का जवाब देते हुए स्पष्ट किया:
“धारा 92 के तहत plaint और मुकदमा दायर करने की अनुमति मांगने वाले आवेदन पर विचार कर रहा सिविल कोर्ट, अनुमति आवेदन के निस्तारण तक संरक्षणात्मक या संपत्ति को सुरक्षित रखने वाले अंतरिम आदेश पारित करने के लिए अधिकृत नहीं है।”
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां तथ्य तत्काल राहत की आवश्यकता दिखाते हों, वहां लिखित रूप से ठोस कारण दर्ज कर अनुमति देने से पहले नोटिस की आवश्यकता को हटाया जा सकता है।
इस स्पष्टीकरण के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें खारिज कर दीं और लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया।
केस टाइटल: एस. पंचलिंगु एवं अन्य बनाम पीपुल्स एजुकेशन ट्रस्ट (आर) एवं अन्य
केस नंबर: सिविल अपील संख्या ___/2026, एसएलपी (सिविल) संख्या 25577-25579/2025 से उत्पन्न
बेंच: जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन
तारीख: 18 सितंबर 2026

