वकील-मुवक्किल विशेषाधिकार अधिवक्ता के अपने आचरण की जीएसटी जांच और सर्च से सुरक्षा की पूर्ण ढाल नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

वकील और मुवक्किल के बीच पेशेवर विशेषाधिकार (एडवोकेट-क्लाइंट प्रिविलेज) और वैधानिक तलाशी शक्तियों के दायरे पर एक अहम फैसला सुनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह विशेषाधिकार किसी वकील की अपनी कथित गैर-कानूनी संलिप्तता की जांच के खिलाफ पूर्ण ढाल नहीं बन सकता। जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस शैल जैन की खंडपीठ ने एक वकील द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) अधिकारियों द्वारा एक लॉ फर्म के परिसर में की गई तलाशी और उनके केबिन से कंप्यूटर सीपीयू व दस्तावेजों की जब्ती को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने माना कि यह सर्च केंद्रीय माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 (सीजीएसटी एक्ट) की धारा 67(2) के तहत जारी वैध वैधानिक अधिकार-पत्र के आधार पर की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता पुनीत बत्रा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर मामलों के अधिवक्ता हैं। वह नई दिल्ली के मयूर विहार स्थित डीएलएफ गैलेरिया मॉल में मेसर्स बास लीगल एलएलपी के कार्यालय में स्थित एक केबिन से वकालत करते हैं। यह फर्म उनके पिता द्वारा स्थापित की गई थी और याचिकाकर्ता पूर्व में इसमें भागीदार (पार्टनर) भी रह चुके हैं। जून 2023 से, मेसर्स मटकर्म टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड (एमटीपीएल)—जो ‘winner11.com’ डोमेन नाम से गेमिंग प्लेटफॉर्म संचालित करती थी—ने उन्हें कराधान और कॉर्पोरेट कंप्लायंस से जुड़ी पेशेवर कानूनी सेवाएं देने के लिए नियुक्त किया था।

याचिकाकर्ता के अनुसार, एमटीपीएल ने अक्टूबर 2023 से अपने वैधानिक और वित्तीय कंप्लायंस का काम स्वतंत्र रूप से संभाल लिया था। 4 और 5 सितंबर 2024 को जीएसटी विभाग द्वारा एमटीपीएल के पंजीकृत कार्यालय पर की गई तलाशी के दौरान याचिकाकर्ता कंपनी के अधिकृत प्रतिनिधि थे। बाद में कंपनी के अधिकारियों के असहयोगात्मक रवैये को देखते हुए उन्होंने 6 सितंबर 2024 को अपना वकालतनामा वापस ले लिया। इसके बाद सीजीएसटी दिल्ली ईस्ट की एंटी-इवेजन शाखा ने उन्हें सितंबर 2024 से जून 2025 के बीच कई समन जारी किए, जिसके तहत वे पेश हुए और अपना बयान दर्ज कराया।

विवाद तब गहराया जब 25 जुलाई 2025 को सीजीएसटी अधिकारियों ने 24 जुलाई 2025 के अधिकार-पत्र के आधार पर बास लीगल एलएलपी के परिसर की तलाशी ली। इस दौरान एमटीपीएल से जुड़े दस्तावेज और पार्टनरशिप रिकॉर्ड जब्त किए गए तथा याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति में उनके केबिन से 1250 जीबी का सीपीयू पंचनामा और फॉर्म जीएसटी आईएनएस-02 के तहत जब्त कर लिया गया। याचिकाकर्ता ने सर्च अधिकार-पत्र, पंचनामा, सीपीयू जब्ती और 25 जुलाई 2025 के समन को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने दलील दी कि एक वकील के कार्यालय की तलाशी लेना और इलेक्ट्रॉनिक डेटा जब्त करना वकील-मुवक्किल विशेषाधिकार तथा अन्य निर्दोष मुवक्किलों की गोपनीयता का उल्लंघन है।

हाईकोर्ट ने 28 जुलाई, 9 सितंबर और 13 नवंबर 2025 के अंतरिम आदेशों के जरिए याचिकाकर्ता के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई, सीपीयू को बिना निगरानी खोलने पर पाबंदी लगाई और हाईकोर्ट के वरिष्ठ आईटी अधिकारियों को लोकल कमिश्नर नियुक्त कर गृह मंत्रालय की नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (एनएफएसयू) लैब में तीसरे पक्ष के डेटा को अलग रखते हुए केवल एमटीपीएल से जुड़े डेटा की क्लोनिंग व जांच की व्यवस्था बनाई।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने दलील दी कि एक अधिवक्ता के केबिन की तलाशी पूरी तरह अनाधिकृत, असंवैधानिक और पेशेवर विशेषाधिकार का खुला उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों के पास धारा 67 के तहत तलाशी के लिए आवश्यक “विश्वास करने के पर्याप्त कारण” (रीज़न्स टू बिलीव) नहीं थे। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि सीबीआई मैनुअल 2020 के डिजिटल साक्ष्य जब्ती से जुड़े नियमों और 10 मार्च 2017 के विभागीय मास्टर सर्कुलर का पालन नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ने जांच सामग्री को सीलबंद लिफाफे में पेश किए जाने का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट के ‘माध्यमम ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड बनाम भारत संघ’ फैसले का हवाला दिया और तर्क दिया कि विभाग ने पहले किसी अन्य व्यक्ति को मास्टरमाइंड बताया था तथा अब याचिकाकर्ता पर आरोप लगाकर अपना रुख बदल रहा है, जबकि एमटीपीएल को कोई कारण बताओ नोटिस (एससीएन) भी जारी नहीं किया गया।

दूसरी ओर, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ने दलील दी कि विभाग ‘winner11.com’ जैसी विदेशी ऑनलाइन जुआ वेबसाइटों के जरिए बड़े पैमाने पर कर चोरी की जांच कर रहा है। जांच में सामने आया कि भारतीय उपयोगकर्ताओं से गेमिंग के लिए ली जाने वाली रकम को एमटीपीएल जैसी मुखौटा कंपनियों के जरिए घुमाया जा रहा था। एमटीपीएल को लगभग 1,306 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, जिस पर 28 प्रतिशत की दर से 365.68 करोड़ रुपये की जीएसटी देनदारी बनती है।

जीएसटी विभाग ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता केवल कानूनी सेवाएं देने वाले वकील नहीं थे, बल्कि वे एमटीपीएल के संचालन में गहराई से शामिल थे और उन्हें प्रति जमा राशि पर कथित रूप से 0.7 प्रतिशत का मुनाफा मिलता था। विभाग ने तर्क दिया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए), 2023 की धारा 132 किसी अपराध में सक्रिय भागीदार वकील को सुरक्षा प्रदान नहीं करती। इसके अलावा, एमटीपीएल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने 29 सितंबर 2025 को प्रस्ताव पारित कर विशेषाधिकार छोड़ते हुए अपने सभी डिजिटल और भौतिक दस्तावेज विभाग को सौंपने की सहमति दे दी थी। विभाग ने यह भी आरोप लगाया कि तलाशी के दौरान याचिकाकर्ता ने रिमोट लोकेशन से कंप्यूटर की फाइलें डिलीट की थीं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

तलाशी की वैधता पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि बास लीगल एलएलपी के लिए धारा 67(2) के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा वैध सर्च अधिकार-पत्र जारी किया गया था। कार्यालय के लेआउट और तस्वीरों से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता का केबिन फर्म के परिसर का ही अभिन्न हिस्सा है और दोनों का पता एक समान है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर दर्ज कारणों की पर्याप्तता का आकलन अंतिम दोष निर्धारण के रूप में नहीं, बल्कि केवल यह देखने के लिए किया जाता है कि क्या जांच शुरू करने के लिए प्रथम दृष्टया आधार मौजूद था।

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भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 132 के तहत पेशेवर विशेषाधिकार के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की:

“वकील-मुवक्किल विशेषाधिकार का संरक्षण एक वकील और उसके मुवक्किल के बीच पेशेवर संबंधों के दौरान किए गए संवादों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए है। हालांकि, यह विशेषाधिकार संवाद या सामग्री की प्रकृति और उन परिस्थितियों से जुड़ा होता है जिनमें वह अस्तित्व में आई। यह केवल इस तथ्य से लागू नहीं हो जाता कि कोई सामग्री किसी वकील के कार्यालय या उसके कब्जे में पाई गई है।”

पीठ ने इस बात पर विशेष बल दिया कि यह विशेषाधिकार मुवक्किल का होता है, न कि वकील का व्यक्तिगत अधिकार:

“यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि बीएसए की धारा 132 के तहत परिकल्पित विशेषाधिकार वास्तव में मुवक्किल के संरक्षण के लिए दिया गया विशेषाधिकार है, न कि अधिवक्ता का व्यक्तिगत विशेषाधिकार।”

हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि पेशेवर विशेषाधिकार किसी वकील के अपने व्यक्तिगत आचरण की जांच को नहीं रोक सकता:

“इसमें कोई विवाद नहीं हो सकता कि वकील-मुवक्किल विशेषाधिकार के तहत संरक्षित संवाद और सामग्री कानून द्वारा मान्यता प्राप्त संरक्षण के हकदार हैं। हालांकि, ऐसा विशेषाधिकार स्वयं अधिवक्ता के आचरण की जांच के खिलाफ पूर्ण रोक के रूप में कार्य नहीं कर सकता, जहां प्रतिवादियों ने प्रथम दृष्टया ऐसी सामग्री पेश की है जो दर्शाती है कि याचिकाकर्ता ने कानूनी सलाहकार की भूमिका से परे जाकर काम किया हो सकता है और वह जांच के दायरे में आने वाले मामलों में शामिल हो सकता है।”

तलाशी के दौरान फाइलों के रिमोट डिलीशन पर कोर्ट ने कहा कि केवल डेटा डिलीट होने से अपराध साबित नहीं होता, लेकिन यह एक ऐसा तथ्य है जिसकी पड़ताल करने का अधिकार जांच एजेंसी को है। एमटीपीएल के 29 सितंबर 2025 के बोर्ड प्रस्ताव पर कोर्ट ने कहा कि मुवक्किल ने स्वयं अपने रिकॉर्ड सौंपने की सहमति दे दी है, जिससे मुवक्किल द्वारा विशेषाधिकार छोड़ने की पुष्टि होती है।

सीलबंद लिफाफे पर याचिकाकर्ता की आपत्ति को खारिज करते हुए कोर्ट ने ‘माध्यमम ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड’ के फैसले को भिन्न संदर्भ का माना। सुप्रीम कोर्ट के ‘बालकराम बनाम उत्तराखंड राज्य’ और ‘सिद्धार्थ आदि बनाम बिहार राज्य’ के फैसलों के साथ-साथ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 192(5) और बीएसए की धारा 130 के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि चल रही जांच के दौरान केस डायरी या जांच सामग्री आरोपी को नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे जांच प्रभावित हो सकती है।

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कारण बताओ नोटिस (एससीएन) न दिए जाने और विभाग द्वारा रुख बदलने के तर्कों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि एससीएन न्यायनिर्णयन (एडजुडिकेशन) के बाद के चरण से संबंधित है। जांच एक गतिशील प्रक्रिया है, जिसमें नए तथ्य सामने आने पर अन्य व्यक्तियों की भूमिका की जांच करना रुख बदलना नहीं कहलाता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक परिपत्र या सर्कुलर धारा 67 की वैधानिक शक्तियों को सीमित नहीं कर सकते।

कोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की रिट याचिका खारिज कर दी और सभी लंबित आवेदनों को समाप्त कर दिया। कोर्ट ने पूर्व में दिए गए अंतरिम आदेशों को वापस ले लिया और जीएसटी विभाग को कानून के अनुसार आगे की जांच जारी रखने की अनुमति दी।

हालांकि, अन्य निर्दोष मुवक्किलों की गोपनीयता सुरक्षित रखने के लिए कोर्ट ने कड़े निर्देश जारी किए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि विभाग केवल इस कार्यवाही के दौरान तैयार की गई क्लोन कॉपी का ही उपयोग करेगा और अपनी जांच केवल एमटीपीएल से संबंधित सामग्री तक ही सीमित रखेगा। विभाग याचिकाकर्ता के अन्य मुवक्किलों से संबंधित किसी भी असंबंधित डेटा को न तो खोलेगा, न उस तक पहुंचेगा और न ही उसकी जांच करेगा।

अदालत ने यह भी साफ किया कि इस फैसले को वकीलों के परिसरों पर मनमानी तलाशी की सामान्य छूट के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए:

“इसलिए, इस फैसले में कही गई किसी भी बात को किसी अधिवक्ता के परिसर की अनियंत्रित तलाशी की अनुमति देने या कानून के अनुसार वास्तविक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त संवादों और गोपनीय मुवक्किल सामग्री को उपलब्ध संरक्षण को कमजोर करने के रूप में नहीं समझा जाएगा।”

फैसले के तुरंत बाद याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील द्वारा फैसले के क्रियान्वयन पर एक सप्ताह के लिए रोक लगाने की मौखिक प्रार्थना को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: पुनीत बत्रा बनाम भारत संघ एवं अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपी (सी) 11021/2025, सीएम एपीपीएल. 45387/2025, सीएम एपीपीएल. 56648/2025, सीएम एपीपीएल. 68661/2025, सीएम एपीपीएल. 79226/2025 एवं सीएम एपीपीएल. 58787/2026
पीठ: जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस शैल जैन
निर्णय की तिथि: 18 सितंबर, 2026

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