सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) की धारा 24 के तहत ट्रांसफर याचिकाओं के दायरे को स्पष्ट करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि वैवाहिक मामलों में पत्नी की सुविधा एक अहम विचार जरूर है, लेकिन इसे कोई ऐसा कठोर या पूर्ण नियम नहीं बनाया जा सकता जिससे मामला स्वतः ही ट्रांसफर कर दिया जाए। जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने कानपुर नगर की फैमिली कोर्ट से हमीरपुर की फैमिली कोर्ट में तलाक का मुकदमा ट्रांसफर कराने की मांग वाली पत्नी की याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 24 के तहत ट्रांसफर का अधिकार विवेकाधीन है और इसके लिए दोनों पक्षों से जुड़ी परिस्थितियों का समग्र आकलन करना आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता पत्नी ने कानपुर नगर स्थित प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट के समक्ष लंबित तलाक वाद संख्या 414/2025 को हमीरपुर की फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर करने के लिए यह अर्जी दाखिल की थी। यह तलाक याचिका पति द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत दाखिल की गई थी।
पत्नी का कहना था कि दोनों का विवाह 26 फरवरी 2009 को हिंदू रीति-रिवाज से संपन्न हुआ था। वैवाहिक जीवन के दौरान 19 अक्टूबर 2010 को एक पुत्री और 19 नवंबर 2016 को एक पुत्र का जन्म हुआ। बाद में वैवाहिक विवाद के चलते उसे अपने नाबालिग बेटे के साथ ससुराल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। पत्नी ने दावा किया कि वह वर्तमान में हमीरपुर जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र स्थित मोहल्ला रमेदी में अपने मायके में रह रही है।
उसने यह भी दलील दी कि वैवाहिक विवाद से जुड़े दो मामले उसने पहले ही हमीरपुर में दायर कर रखे हैं। इनमें सिविल जज (जूनियर डिवीजन), एफ.टी.सी. द्वितीय/(महिला अपराध), हमीरपुर के समक्ष घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत वाद संख्या 316/2025 और प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, हमीरपुर के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144 के तहत वाद संख्या 110/2025 शामिल हैं। पत्नी का आरोप था कि इन मामलों के लंबित रहते पति ने कानपुर नगर में मनगढ़ंत और झूठे आधारों पर तलाक की अर्जी दाखिल की। उसने यह भी कहा कि हमीरपुर और कानपुर नगर के बीच 60 किलोमीटर से अधिक की दूरी है, जिससे कानपुर जाकर मुकदमे में उपस्थित होना उसके लिए काफी असुविधाजनक होगा।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता पत्नी के वकील ने दलील दी कि वैवाहिक मामलों के ट्रांसफर पर विचार करते समय पत्नी की सुविधा को हमेशा प्राथमिकता दी जाती है। उनका तर्क था कि चूंकि पत्नी हमीरपुर में रह रही है और वहां विवाद से जुड़े मामले पहले से लंबित हैं, ऐसे में उसे कानपुर नगर आकर मुकदमा लड़ने के लिए बाध्य करने का कोई औचित्य नहीं है। इसके अलावा पत्नी ने कानपुर नगर जाने पर पति और उसके परिजनों से अपनी जान-माल के खतरे की आशंका भी जताई।
वहीं दूसरी ओर, पति के वकील ने जवाबी हलफनामे का हवाला देते हुए ट्रांसफर अर्जी का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि पत्नी हमीरपुर में नहीं, बल्कि कानपुर नगर से सटे जिले कानपुर देहात के पुखरायां में रह रही है। इसका प्रमाण खुद पत्नी द्वारा ट्रांसफर याचिका के विवरण में दर्ज उसका पता है। पति के वकील ने यह भी तर्क दिया कि सिर्फ हमीरपुर में कुछ मामलों का लंबित होना तलाक के मुकदमे को ट्रांसफर करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त उन्होंने कहा कि हमीरपुर में स्वयं पति की जान और सुरक्षा को खतरा है, जिसके संबंध में उसने पुलिस में शिकायतें भी दर्ज कराई हैं।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण और दृष्टांत
सीपीसी की धारा 24 के दायरे का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह क्षेत्राधिकार विवेकाधीन प्रकृति का है। इसका इस्तेमाल पूरी न्यायिक सतर्कता और तथ्यों की पड़ताल के बाद ही किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी पक्ष को ऐसी कठिनाई या पूर्वाग्रह का सामना न करना पड़े जिससे निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो।
पत्नी की सुविधा के पहलू पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा:
“वैवाहिक कार्यवाहियों में पत्नी की सुविधा निस्संदेह एक प्रासंगिक और महत्वपूर्ण विचार है, विशेषकर तब जब उसे किसी दूरस्थ स्थान की यात्रा करनी हो, उसके साधन सीमित हों, उसे नाबालिग बच्चों की देखभाल करनी हो या वह ऐसी परिस्थितियों में हो जिससे मौजूदा अदालत में उपस्थित होना उसके लिए वास्तविक रूप से कठिन हो जाए। साथ ही, ऐसी सुविधा को किसी पूर्ण या अटल नियम के रूप में तब्दील नहीं किया जा सकता कि वैवाहिक मुकदमा अनिवार्य रूप से वहीं ट्रांसफर किया जाए जहां पत्नी रहती है या जहां उसके द्वारा शुरू की गई कार्यवाहियां लंबित हैं। सीपीसी की धारा 24 के तहत विवेक का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से दोनों पक्षों को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों पर विचार करने की मांग करता है।”
अदालत ने साधना सिंह बनाम मृत्युंजय सिंह मामले का संदर्भ लेते हुए कहा कि पत्नी की सुविधा का मूल्यांकन अन्य परिस्थितियों के साथ मिलाकर किया जाना चाहिए, जिसमें दोनों पक्षों का निवास स्थान, उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति, अदालत की पहुंच और परिवहन के साधन शामिल हैं। सिर्फ इसलिए धारा 24 का यांत्रिक रूप से प्रयोग नहीं किया जा सकता कि पत्नी किसी अन्य स्थान पर रहती है।
इसी तरह, अंजना राणा बनाम नवीन सिंह मामले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि प्रस्तावित अदालत में जुड़े हुए मुकदमों की मौजूदगी ट्रांसफर की मांग को वजन तो दे सकती है, लेकिन उनकी केवल मौजूदगी ही ट्रांसफर का स्वतः अधिकार नहीं दे देती। इसी प्रकार दो स्थानों के बीच की दूरी को भी आवागमन की सुगमता और वास्तविक परिस्थितियों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
सुरक्षा की आशंका के बिंदु पर अदालत ने अरशद हुसैन बनाम नाजिया परवीन मामले का हवाला दिया और कहा कि किसी भी प्रकार की आशंका का ठोस और उचित आधार होना चाहिए।
इन कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में पत्नी के निवास स्थान को लेकर ही विवाद है, क्योंकि उसकी खुद की याचिका में कानपुर देहात का पता दर्ज है। अदालत ने माना कि यदि मान भी लिया जाए कि वह हमीरपुर में रह रही है, तो भी 60 किलोमीटर से अधिक की दूरी ऐसी नहीं है जो अत्यधिक कठिनाई पैदा करे। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो कि सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध नहीं है, उसे बार-बार अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ेगा, या वह प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व हासिल करने में असमर्थ है। सुरक्षा की चिंता पर कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए हैं, लेकिन किसी के पास भी इसका कोई ठोस या पुख्ता आधार नहीं है।
हाईकोर्ट का निर्णय
मामले के सार को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“मात्र यह तथ्य कि आवेदक पत्नी है, वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले हमीरपुर में लंबित हैं, या मौजूदा अदालत में पेशी के लिए यात्रा करनी पड़ती है, वर्तमान मामले की परिस्थितियों में अपने आप में सीपीसी की धारा 24 के तहत विवेकाधीन शक्तियों के प्रयोग के लिए पर्याप्त आधार नहीं बन सकते।”
ट्रांसफर का कोई पर्याप्त आधार न पाते हुए हाईकोर्ट ने पत्नी की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, कानपुर नगर को निर्देश दिया कि वे कानून के अनुसार तलाक वाद संख्या 414/2025 को अनावश्यक तारीखें दिए बिना शीघ्रता से निस्तारित करने का प्रयास करें। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश की टिप्पणियां केवल धारा 24 के ट्रांसफर आवेदन तक सीमित हैं और इनका दोनों पक्षों के मूल वैवाहिक विवाद के मेरिट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: श्रीमती तरुणी त्रिपाठी बनाम दुर्गेश त्रिपाठी
वाद संख्या: ट्रांसफर एप्लीकेशन (सिविल) संख्या – 601/2025
पीठ: जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव
निर्णय की तिथि: 14 सितंबर 2026

