गौहाटी हाईकोर्ट ने निजी कृषि भूमि पर 21 घर गिराने में आपदा प्रबंधन कानून के प्रथमदृष्टया दुरुपयोग पर उठाए सवाल

गौहाटी हाईकोर्ट ने असम के गोलपाड़ा जिले में निजी कृषि भूमि पर बने 21 मकानों को गिराने की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि प्रथमदृष्टया आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 का दुरुपयोग होता दिखाई दे रहा है। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से ऐसी कोई आसन्न खतरे की स्थिति नजर नहीं आती, जिसके आधार पर निजी जमीन पर बने घरों को गिराने जैसा कठोर कदम उठाना जरूरी था।

जस्टिस देवाशीष बरुआ ने 11 सितंबर को पारित आदेश में जिला आयुक्त और सर्किल अधिकारी को पूरी कार्रवाई के संबंध में अपना-अपना हलफनामा दाखिल करने का अवसर दिया है।

हाईकोर्ट उन 21 लोगों की याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिनके अपने कृषि भूखंडों पर बने मकान इस महीने की शुरुआत में गिरा दिए गए थे।

कार्रवाई गैरकानूनी मिली तो मुआवजे पर विचार करेगा कोर्ट

याचिकाकर्ताओं ने एक अतिरिक्त हलफनामा दाखिल कर मकानों को गिराए जाने और उससे हुए नुकसान की तस्वीरें भी कोर्ट के सामने रखी हैं। हाईकोर्ट ने इन दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेते हुए अधिकारियों को अतिरिक्त हलफनामे का जवाब दाखिल करने को कहा है।

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों का जवाब आने के बाद मुआवजे के सवाल पर विचार किया जाएगा। यदि जिला आयुक्त और सर्किल अधिकारी द्वारा कराई गई तोड़फोड़ की कार्रवाई कानून से अधिकृत नहीं पाई जाती है तो पीड़ितों को मुआवजा देने के मुद्दे पर फैसला किया जाएगा।

मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी।

24 घंटे में मकान हटाने का दिया गया था नोटिस

विवाद की शुरुआत 5 सितंबर को हुई, जब गोलपाड़ा के मटिया के सर्किल अधिकारी ने मकान मालिकों को नोटिस जारी कर 24 घंटे के भीतर अपने घर गिराने को कहा था। ऐसा नहीं करने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।

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इसके बाद 7 सितंबर की तड़के सभी 21 याचिकाकर्ताओं के मकान गिरा दिए गए। सभी याचिकाकर्ता मुस्लिम हैं।

तोड़फोड़ वाले दिन ही मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस बरुआ ने सर्किल अधिकारी की कार्रवाई को प्रथमदृष्टया गैरकानूनी, अनधिकृत और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत माना था। कोर्ट ने कहा था कि प्राकृतिक न्याय के ये सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का हिस्सा हैं।

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया था कि याचिकाकर्ताओं को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना इतने कठोर कदम वाला नोटिस कैसे जारी किया गया। कोर्ट ने यह भी पाया था कि नोटिस में ऐसी किसी आसन्न खतरे की स्थिति का उल्लेख नहीं था, जिसके आधार पर निजी भूमि पर इतनी कठोर शक्तियों का इस्तेमाल किया जा सके।

कृषि भूमि से जुड़े असम के कानून का भी किया उल्लेख

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हाईकोर्ट ने असम कृषि भूमि (गैर-कृषि उद्देश्य के लिए पुनर्वर्गीकरण और हस्तांतरण का विनियमन) अधिनियम, 2015 का भी उल्लेख किया।

इस कानून के तहत एक बीघा से अधिक नहीं होने वाली कृषि भूमि का इस्तेमाल या हस्तांतरण यदि जमीन मालिक अपने रहने के लिए मकान बनाने के उद्देश्य से करता है तो इसके लिए उपायुक्त की अनुमति आवश्यक नहीं है, बशर्ते निर्माण दो मंजिल तक सीमित हो।

कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि सर्किल अधिकारी द्वारा जारी नोटिस से स्वयं पता चलता है कि संबंधित पट्टा भूमि याचिकाकर्ताओं की थी।

अब हाईकोर्ट अधिकारियों के हलफनामों और याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अतिरिक्त सामग्री पर विचार करेगा। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को तय की गई है।

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