रामगढ़ की दो औद्योगिक इकाइयों की औचक जांच और चौबीसों घंटे निगरानी के निर्देश, झारखंड हाईकोर्ट ने कहा- सीमाओं में नहीं बंधता प्रदूषण

झारखंड हाईकोर्ट ने पर्यावरण क्षरण को किसी एक इलाके तक सीमित न रहने वाला गंभीर संकट बताते हुए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को रामगढ़ स्थित दो बड़े कारखानों की चौबीसों घंटे निगरानी और औचक निरीक्षण करने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हवा और पानी में होने वाले प्रदूषण पर लगातार नजर रखी जाए ताकि औद्योगिक इकाइयां निर्धारित मानकों का कड़ाई से पालन करें।

चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने 14 सितंबर को वर्ष 2024 में दाखिल एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया कि वह ‘बिहार फाउंड्री एंड कास्टिंग लिमिटेड’ और ‘दयाल स्टील लिमिटेड’ के उत्सर्जन स्तर पर सख्त निगरानी रखे।

सख्त निगरानी और औचक जांच के निर्देश

हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इन दोनों औद्योगिक इकाइयों का साल में दो बार निरीक्षण करना होगा। अदालत ने यह अनिवार्य किया है कि इनमें से कम से कम एक दौरा बिना किसी पूर्व सूचना के यानी औचक रूप से किया जाए।

इसके साथ ही दोनों संयंत्रों से होने वाले उत्सर्जन की लगातार ट्रैकिंग की जाएगी। यदि प्रदूषण का स्तर लगातार 48 घंटे से अधिक समय तक तय सीमा से ऊपर पाया जाता है, तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तुरंत संबंधित इकाई को कारण बताओ नोटिस जारी करेगा।

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अदालत ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया है कि वे आदेश की तारीख से तीन महीने के भीतर स्थानीय जल स्रोतों के नए नमूने लेकर उनकी जांच करें और विस्तृत रिपोर्ट उपायुक्त, रामगढ़ को सौंपें। इसके अलावा, बोर्ड को दोनों कंपनियों की पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़े दस्तावेजों की एक अलग फाइल तैयार करनी होगी, जिसमें यह स्पष्ट दर्ज रहे कि अनुमतियां वर्तमान में वैध हैं, समाप्त हो चुकी हैं या नवीनीकरण की प्रक्रिया में हैं।

भौगोलिक सीमाओं में नहीं बंधता पर्यावरणीय नुकसान

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने रेखांकित किया कि पर्यावरणीय नुकसान कभी भी अपने उद्गम स्थल तक सीमित नहीं रहता। अदालत ने टिप्पणी की कि जब कोई नदी प्रदूषित होती है, तो वह किसी जिले की सीमा पर नहीं ठहरती, बल्कि ऊपर से मिले कचरे और गंदगी को आगे तक ले जाती है।

अदालत ने कहा कि जब स्थानीय स्तर पर पर्यावरणीय नियमों को लागू करने में लापरवाही होती है, तो उसका असर केवल उसी इलाके तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय संकट का रूप ले लेता है। इसका खामियाजा अक्सर उन कमजोर आबादियों को भुगतना पड़ता है, जिनकी इस प्रदूषण में कोई भूमिका नहीं होती।

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पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के मामले को केवल याचिकाकर्ता और संबंधित कारखानों के बीच का निजी विवाद मानकर नहीं देखा जा सकता। यदि आरोपों में दम है, तो यह सीधे तौर पर हवा और पानी की गुणवत्ता, इलाके के पारिस्थितिक संतुलन और नागरिकों के स्वच्छ व स्वस्थ पर्यावरण में जीने के मूल अधिकार को प्रभावित करता है।

आवासीय बस्तियों और भारी उद्योगों का सह-अस्तित्व

रामगढ़ की भौगोलिक और औद्योगिक स्थिति पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह एक ऐसा शहर है जहां भारी विनिर्माण इकाइयों के ठीक पास रिहायशी कॉलोनियां, स्कूल, सरकारी दफ्तर और जेल जैसी संवेदनशील संस्थाएं मौजूद हैं। ऐसी स्थिति में पर्यावरणीय घर्षण और विवाद की आशंका हमेशा बनी रहती है।

हालांकि, खंडपीठ ने यह भी साफ किया कि स्कूल जैसे संवेदनशील संस्थानों के नजदीक होने से न तो उद्योगों को नियमों से कोई छूट मिलती है और न ही केवल स्थानीय स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के आधार पर यह स्वतः मान लिया जाएगा कि कारखानों ने पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन किया है।

वायु गुणवत्ता पर संतोष, जल निकासी की दोबारा जांच

अदालत ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों और रिपोर्टों की समीक्षा के बाद वायु गुणवत्ता के अनुपालन पर संतोष जताया। हालांकि, पानी की गुणवत्ता और निकासी के आंकड़ों में तय सीमा से थोड़ी अधिकता पाई गई, जिसके चलते अदालत ने जल स्रोतों के नए सिरे से परीक्षण के निर्देश दिए।

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यह मामला मूल रूप से पटना के रहने वाले और वर्तमान में रामगढ़ में रह रहे एक व्यक्ति द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं शिवम उत्कर्ष सहाय और कोमल तिवारी ने दलील दी कि दोनों फैक्ट्रियों की चिमनियों से दिन-रात जहरीला धुआं, धूल और गैसें निकलती हैं, जिससे आसपास का पूरा इलाका ढंक जाता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कंपनियों द्वारा किए गए प्रदूषण नियंत्रण के उपाय केवल अस्थायी और दिखावटी हैं, इसलिए मामले में अदालत के दखल की सख्त जरूरत है।

इसके जवाब में राज्य सरकार और प्रदूषण बोर्ड की ओर से पेश अधिवक्ताओं सहबाज अख्तर, ऋचा संचिता और ऋषिता सिंह ने दलील दी कि दोनों औद्योगिक इकाइयों के पास कानूनन सभी जरूरी स्वीकृतियां मौजूद हैं और वे पर्यावरण से जुड़े सभी कानूनी व विनियामक मानकों के अनुरूप ही अपना संचालन कर रही हैं।

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