पॉलिसी में न दी गई शर्तों के आधार पर बीमा क्लेम खारिज करना गलत: उपभोक्ता आयोग का अहम फैसला, कार मालिक को मिलेंगे ₹2 लाख से अधिक

छत्तीसगढ़ के एक जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बीमा कंपनियां ऐसी शर्तों या अपवादों का हवाला देकर क्लेम खारिज नहीं कर सकतीं, जो पॉलिसी जारी करते समय ग्राहक को सौंपी ही न गई हों। आयोग ने बारिश के पानी से खराब हुई एक लक्जरी कार के मामले में बीमा कंपनी की दलीलों को अमान्य ठहराते हुए उसे वाहन मालिक को मरम्मत खर्च के तौर पर 1.75 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है।

इसके साथ ही, आयोग ने उपभोक्ता को हुई मानसिक प्रताड़ना के एवज में 20,000 रुपये और कानूनी खर्च के रूप में 7,000 रुपये देने के निर्देश भी बीमा कंपनी को दिए हैं। आयोग के अध्यक्ष दाकेश्वर प्रसाद शर्मा और सदस्य निरुपमा प्रधान व अनिल कुमार अग्निहोत्री की पीठ ने 24 अगस्त को यह फैसला सुनाया। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि जिन नियमों व शर्तों से ग्राहक को अवगत ही नहीं कराया गया, उनके आधार पर क्लेम ठुकराना सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार है।

बारिश के पानी से कार को पहुंचा था भारी नुकसान

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यह विवाद अगस्त 2021 में शुरू हुआ था, जब कार मालिक की लक्जरी गाड़ी की ड्राइवर साइड वाली खिड़की का शीशा थोड़ा खुला रह गया था। इसके चलते बारिश का पानी गाड़ी के भीतर घुस गया, जिससे वाहन के इंफोटेनमेंट सिस्टम और अन्य महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों को गंभीर नुकसान पहुंचा। यह वाहन एक निजी कार बीमा पॉलिसी के तहत सुरक्षित था, जिसकी अवधि 29 नवंबर 2020 से 28 नवंबर 2021 तक थी।

गाड़ी की मरम्मत कराने पर मालिक को 2.73 लाख रुपये का खर्च आया। वहीं, घटना के बाद बीमा कंपनी द्वारा नियुक्त स्वतंत्र सर्वेक्षक ने नुकसान का वास्तविक मूल्यांकन 1.98 लाख रुपये किया था।

लापरवाही का हवाला देकर कंपनी ने खारिज किया था क्लेम

सर्वेक्षक द्वारा नुकसान के आकलन के बावजूद बीमा कंपनी ने 4 फरवरी 2022 को क्लेम का भुगतान करने से इनकार कर दिया। कंपनी का कहना था कि बारिश के पानी से होने वाला नुकसान पॉलिसी के तहत कवर नहीं होता। इसके अलावा कंपनी ने दलील दी कि बारिश में खिड़की खुली छोड़ना कार मालिक की घोर लापरवाही को दर्शाता है, जो बीमा अनुबंध के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है।

बीमा कंपनी के इस रुख के खिलाफ पीड़ित ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने तर्क दिया कि पॉलिसी लेते समय कंपनी ने उन्हें नियम और शर्तों का पूरा दस्तावेज सौंपा ही नहीं था, इसलिए बाद में छिपी हुई शर्तों और पाबंदियों का सहारा लेकर क्लेम नहीं रोका जा सकता।

अधूरी जानकारी देने पर आयोग की सख्त टिप्पणी

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आयोग ने दोनों पक्षों द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों की गहनता से पड़ताल की। रिकॉर्ड से यह साफ हुआ कि कंपनी ने शुरुआत में ग्राहक को चार पन्नों की एक पॉलिसी जारी की थी, जिस पर बकायदा पेज नंबर दर्ज थे। हालांकि, आयोग के सामने अपनी बात रखते हुए बीमा कंपनी ने उस मूल दस्तावेज के केवल तीन पन्ने ही पेश किए। इसके साथ ही कंपनी ने छह पन्नों की एक अलग पुस्तिका प्रस्तुत की, जिसमें विस्तृत नियम, शर्तें और अपवाद दर्ज थे।

आयोग ने फैसला सुनाते हुए कहा कि इस अलग छह-पेज वाली पुस्तिका को मूल बीमा पॉलिसी का हिस्सा नहीं माना जा सकता, क्योंकि ग्राहक को दिया गया मूल दस्तावेज केवल चार पन्नों का था। पीठ ने कहा कि चूंकि बीमा कंपनी पॉलिसी जारी करते समय आवश्यक शर्तें और अपवाद ग्राहक को उपलब्ध कराने में विफल रही, इसलिए वे अप्रदत्त शर्तें कार मालिक पर बाध्यकारी नहीं हैं।

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