मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महिला को प्रतिमाह 30,000 रुपये गुजारा भत्ता देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया है। अदालत ने पाया कि निचली अदालत ने पति की 1.5 लाख रुपये मासिक आय के आकलन और उसकी ओर से वेतन से जुड़े दस्तावेज पेश न किए जाने पर उचित तरीके से गौर नहीं किया था।
जस्टिस द्वारकाधीश बंसल की एकल पीठ ने 8 सितंबर को इस मामले पर सुनवाई की। पत्नी ने फैमिली कोर्ट के जून माह के उस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसके तहत उसे 1 जून 2025 से 30,000 रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया गया था। याचिकाकर्ता ने भत्ते की राशि बढ़ाने और इसे मूल आवेदन की तारीख 6 सितंबर 2021 से लागू करने की मांग की थी।
सैलरी स्लिप न देने पर प्रतिकूल निष्कर्ष न निकालना फैमिली कोर्ट की चूक
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के तौर-तरीकों पर सवाल उठाते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट ने पति को वेतन पर्ची पेश करने का निर्देश देने के बजाय अंतरिम गुजारा भत्ते की अर्जी पर फैसला सुना दिया या उसे खारिज कर दिया। ऐसा करते हुए अदालत यह देखने में नाकाम रही कि पति द्वारा जरूरी दस्तावेज जमा न करने का क्या कानूनी परिणाम होना चाहिए और उसके खिलाफ उचित प्रतिकूल निष्कर्ष (एडवर्स इन्फरेंस) भी नहीं निकाला गया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब फैमिली कोर्ट ने खुद पति की मासिक आमदनी 1.5 लाख रुपये आंकी थी, तो उसे स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आधार पर गुजारे के दावे की जांच करनी चाहिए थी। अदालत का कहना था कि कुल वेतन के एक-चौथाई हिस्से के बजाय गुजारा भत्ते की राशि 30,000 रुपये तय करने के लिए पर्याप्त और उचित कारण दर्ज किए जाने जरूरी थे। ऐसी स्थिति में निचली अदालत को या तो वेतन से जुड़े दस्तावेज मंगाने चाहिए थे या दस्तावेज न देने पर पति के आचरण को संज्ञान में लेकर सख्त रुख अपनाना चाहिए था।
दस्तावेज छुपाने पर खारिज हो सकता है बचाव पक्ष का अधिकार
जस्टिस बंसल ने इस बात पर जोर दिया कि अंतरिम गुजारा भत्ते के स्तर पर भी अदालतों को वित्तीय खुलासे के नियमों का कड़ाई से पालन कराना चाहिए। अदालत ने कहा कि अधूरा हलफनामा पेश करना नियमों का पालन नहीं माना जा सकता। यदि कोई पक्ष अदालत के निर्देश के बावजूद दस्तावेज जमा नहीं करता, तो अदालत उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकती है और गंभीर मामलों में उसका कानूनी पक्ष रखने का अधिकार (डिफेंस) भी समाप्त किया जा सकता है।
घरेलू हिंसा के भत्ते का देर से खुलासा और अदालती रुख
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के आचरण की भी समीक्षा की गई। फैमिली कोर्ट ने अप्रैल 2024 में महिला की अंतरिम गुजारा भत्ते की अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वह बीएससी और एमबीए डिग्रीधारक है तथा उसने यह बात छुपाई थी कि उसे घरेलू हिंसा कानून के तहत पहले से 10,000 रुपये मासिक गुजारा भत्ता मिल रहा है।
इस पहलू पर हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि पत्नी का आचरण शुरुआती दौर में सवालों के घेरे में था क्योंकि उसने पूर्व में मिल रहे भत्ते की जानकारी नहीं दी थी, लेकिन बाद में उसने हलफनामे में यह तथ्य स्पष्ट कर दिया था। लिहाजा, शुरुआत में जानकारी छुपाने का कानूनी महत्व बाद में समाप्त हो गया। अदालत ने कहा कि किसी मामले में छल का मतलब धोखाधड़ी नहीं हो सकता, जबकि वास्तविक धोखाधड़ी निष्पक्षता के सभी सिद्धांतों के खिलाफ होती है और उसे ‘रेस जुडिकाटा’ (पूर्व न्याय) जैसे कानूनी सिद्धांतों का संरक्षण नहीं मिल सकता।
विवाह से लेकर हाईकोर्ट के फैसले तक का घटनाक्रम
मामले के अनुसार, इस जोड़े का विवाह 17 जून 2019 को हुआ था और दोनों 16 जनवरी 2020 से अलग रहने लगे थे। महिला ने 6 सितंबर 2021 को फैमिली कोर्ट में गुजारा भत्ते की अर्जी दाखिल की थी।
इसके बाद गवाही की प्रक्रिया में लंबा समय बीता। 25 मई 2024 को निचली अदालत ने महिला का साक्ष्य पेश करने का अधिकार समाप्त कर दिया था। महिला द्वारा हाईकोर्ट का रुख करने पर 1 अगस्त 2025 को उसे गवाही का एक और मौका दिया गया। महिला ने 22 सितंबर 2025 को अपनी गवाही पूरी की, जबकि पति की ओर से गवाही 13 मई 2026 को समाप्त हुई। अंततः फैमिली कोर्ट ने इस वर्ष जून में 30,000 रुपये मासिक भत्ते का आदेश पारित किया, जिसे अब हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है।

