उड़ीसा हाईकोर्ट ने राज्य के दो उपमुख्यमंत्रियों—कनक वर्धन सिंह देव और प्रवती परिदा—की नियुक्ति की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। अदालत के इस फैसले के साथ ही दोनों उपमुख्यमंत्रियों के पद को लेकर चल रहा कानूनी विवाद समाप्त हो गया है।
चीफ जस्टिस हरीश टंडन और जस्टिस चित्तरंजन दास की डिवीजन बेंच ने गुरुवार को यह फैसला सुनाया। इससे पहले अदालत ने 27 अगस्त 2026 को मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था। याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला दिया और स्पष्ट किया कि ‘उपमुख्यमंत्री’ का पदनाम विशुद्ध रूप से वर्णनात्मक है। यह पद किसी मंत्री को मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की तुलना में कोई अतिरिक्त संवैधानिक अधिकार या विशेष शक्तियां प्रदान नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट की नजीर का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित मामले ‘के.एम. शर्मा बनाम श्री देवी लाल एवं अन्य’ का उल्लेख किया। इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि उपमुख्यमंत्री मूल रूप से मंत्रिपरिषद का ही एक सदस्य होता है और इस पदनाम से उसे मुख्यमंत्री के समकक्ष कोई शक्तियां प्राप्त नहीं होती हैं।
डिवीजन बेंच ने रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति को ‘उपमुख्यमंत्री’ कहना संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं है, बशर्ते इससे जुड़ी सभी बुनियादी संवैधानिक आवश्यकताओं का विधिवत पालन किया गया हो। अदालत ने यह भी साफ किया कि इस पदनाम के तहत पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाना असंवैधानिक नहीं ठहरता, क्योंकि पद का नाम केवल वर्णनात्मक है और पद से जुड़े वास्तविक संवैधानिक नियम पूरी तरह पूर्ववत रहते हैं।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
यह जनहित याचिका के. पात्रा और श्रीनिवास मोहंती की ओर से दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि दोनों नेताओं को उपमुख्यमंत्री का पदनाम देकर उन्हें मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों से ऊंचे पायदान पर रखा गया है। उन्होंने दावा किया था कि प्रोटोकॉल, वरीयता और अधिकारों के मामले में उन्हें विशेष तरजीह देना भारत के संविधान के अनुच्छेद 163 और अनुच्छेद 164 के खिलाफ है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने उपमुख्यमंत्रियों के संवैधानिक दर्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट की स्थापित व्याख्या को आधार बनाते हुए सिंह देव और परिदा की नियुक्ति के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया।

