यूएपीए मामला: अलगाववादी नारेबाजी पर कुपवाड़ा की विशेष अदालत का फैसला रद्द, जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने दोबारा आरोप तय करने का दिया निर्देश

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने 2013 के एक गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) मामले में आरोपी मोहम्मद यूसुफ लोन को आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) करने के निचली अदालत के आदेश को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी प्रतिबंधित अलगाववादी संगठन के प्रमुख की मौजूदगी में भीड़ का नेतृत्व करते हुए देश से अलग होने के नारे लगाना पहली नजर में गैरकानूनी गतिविधि के दायरे में आता है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव कुमार की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने राज्य सरकार की आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए कुपवाड़ा के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एनआईए अधिनियम के तहत नामित विशेष अदालत) द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने आरोपपत्र को बहाल करते हुए निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर नए सिरे से विचार कर आरोपी के खिलाफ आरोप तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाए।

अलगाववादी नारों और हिंसा पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रतिबंधित अलगाववादी संगठन के प्रमुख के साथ मिलकर भीड़ की अगुआई करना, देश से अलग होने के नारे लगाना, जनता को भड़काना और सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसा करना, ये सभी कृत्य पहली नजर में स्पष्ट रूप से यूएपीए के तहत गैरकानूनी गतिविधि की परिभाषा में आते हैं।

पीठ ने रेखांकित किया कि आरोपपत्र के साथ पेश की गई सामग्री—जिसमें दर्ज नारे, विरोध प्रदर्शन में आरोपी की अगुआई की भूमिका और उसके बाद भड़की हिंसा शामिल है—मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त गंभीर संदेह पैदा करती है। अदालत ने कहा कि आरोप आखिरकार साबित होते हैं या नहीं, यह मुकदमे की सुनवाई के दौरान तय होना चाहिए, न कि शुरुआत में ही मामले को खारिज कर दिया जाए।

निचली अदालत के आदेश पर सवाल

विशेष अदालत के दृष्टिकोण में खामी निकालते हुए खंडपीठ ने कहा कि निचली अदालत ने अपने विवादित आदेश के छठे पैराग्राफ में केवल एक वाक्य लिखकर मामले को खारिज कर दिया था कि तथ्य यूएपीए की धारा 2(ओ) की शर्तों को पूरा नहीं करते। हाईकोर्ट ने कहा कि यह बिना किसी कानूनी तर्क के निकाला गया एक कोरा निष्कर्ष है। निचली अदालत ने यह स्पष्ट नहीं किया कि आरोपपत्र में दर्ज आरोपी के बयानों और आचरण की वैधानिक परिभाषा के तहत क्या जांच की गई थी।

पीठ ने आगे कहा कि आरोपमुक्त करने के आदेश में रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर न्यायिक मस्तिष्क के प्रयोग का दिखना जरूरी है। निचली अदालत ने गवाहों के बयानों, घटनास्थल के नक्शे और हिंसा से जुड़े सबूतों को यूएपीए की धारा 13 और धारा 2(ओ) की कसौटी पर परखे बिना ही कानून के लागू न होने का निष्कर्ष निकाल दिया, जिसके चलते यह आदेश टिकने योग्य नहीं है। अदालत ने यह भी साफ किया कि जब रिकॉर्ड पर ऐसी सामग्री मौजूद हो जो प्रथम दृष्टया अपराध और आरोपी की संलिप्तता को दिखाती हो, तो अदालतें बिना वैध कानूनी कारण बताए मुकदमे के रास्ते बंद नहीं कर सकतीं। साथ ही पीठ ने स्पष्ट किया कि उसने आरोपी के दोष या निर्दोष होने पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।

2013 के कुपवाड़ा प्रदर्शन से जुड़ा है मामला

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यह मामला 8 नवंबर 2013 की घटना से संबंधित है। आरोपपत्र के अनुसार, कुपवाड़ा की जामिया मस्जिद से मोहम्मद यूसुफ लोन और प्रतिबंधित हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के तत्कालीन अध्यक्ष दिवंगत सैयद अली शाह गिलानी की अगुआई में एक भीड़ बाहर निकली थी।

जांच एजेंसी के मुताबिक, इन अलगाववादी नेताओं ने भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ आम जनता को उकसाया, भारत सरकार के खिलाफ राष्ट्रविरोधी नारेबाजी की और वहां तैनात पुलिस व सुरक्षा बलों पर पथराव किया था। इन्हीं आरोपों के आधार पर मामला दर्ज किया गया था, जिसकी सुनवाई अब दोबारा ट्रायल कोर्ट में शुरू होगी।

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