दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं से जुड़े भारतीय वायुसेना के विशेष उड़ान रिकॉर्ड सार्वजनिक करने का निर्देश देने वाले केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि इन रिकॉर्ड में मौजूद संवेदनशील जानकारियों का खुलासा राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ प्रधानमंत्री के जीवन और शारीरिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकता है।
जस्टिस अमित महाजन ने माना कि भारतीय वायुसेना ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(a) और 8(1)(g) के तहत जानकारी देने से इनकार करके सही कदम उठाया था।
हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें भारतीय वायुसेना को प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं से संबंधित स्पेशल फ्लाइट रिटर्न के दूसरे भाग (SFR-II) की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
क्या है पूरा मामला?
सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश के. बत्रा ने 5 जून 2018 को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत आवेदन दाखिल किया था।
उन्होंने 1 अप्रैल 2013 से आवेदन की तारीख तक भारतीय वायुसेना के विमानों से भारत के प्रधानमंत्रियों द्वारा की गई प्रत्येक विदेश यात्रा की जानकारी मांगी थी।
10 जुलाई 2018 को वायु मुख्यालय के कार्मिक सेवा निदेशालय के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (CPIO) ने उन्हें जवाब दिया।
जवाब में बताया गया कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1 अप्रैल 2013 से 25 मई 2014 के बीच भारतीय वायुसेना के विमानों से कोई हवाई यात्रा नहीं की थी।
वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 जून 2016 से 9 जुलाई 2018 के बीच भारतीय वायुसेना के विमानों से तीन विदेश यात्राएं की थीं।
हालांकि, वायुसेना ने स्पेशल फ्लाइट रिटर्न के पहले और दूसरे भाग (SFR Part-I और Part-II) की प्रतियां देने से इनकार कर दिया।
वायुसेना ने कहा कि इन दस्तावेजों में स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (SPG) के सुरक्षाकर्मियों के नाम सहित कई संवेदनशील जानकारियां मौजूद हैं।
इस आधार पर RTI अधिनियम की धारा 8(1)(a) और 8(1)(e) के तहत जानकारी देने से छूट का दावा किया गया।
आवेदक ने इस फैसले के खिलाफ पहली अपील दाखिल की, लेकिन प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने 20 सितंबर 2018 को अपील खारिज कर दी।
इसके बाद मामला केंद्रीय सूचना आयोग पहुंचा।
8 जुलाई 2020 को CIC ने वायुसेना को उपलब्ध और संबंधित SFR-II रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतियां देने का निर्देश दिया।
इस आदेश को केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर जानकारी सार्वजनिक करने का विरोध
भारतीय वायुसेना की ओर से केंद्र सरकार की स्थायी अधिवक्ता प्रतिमा एन. लाकड़ा ने अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार मिश्रा के साथ दलीलें पेश कीं।
उन्होंने कहा कि SFR-II में प्रधानमंत्री के साथ यात्रा करने वाले यात्रियों, विमान, चालक दल और SPG सुरक्षाकर्मियों के नाम तथा अन्य विवरण दर्ज होते हैं।
इन जानकारियों को सार्वजनिक करने से प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी संवेदनशील सूचनाएं सामने आ सकती हैं।
उन्होंने तर्क दिया कि यदि इन विवरणों को पहले से सार्वजनिक अन्य जानकारियों के साथ जोड़कर देखा जाए, तो देश की सुरक्षा के खिलाफ काम करने वाले तत्व उनका दुरुपयोग कर सकते हैं।
इसलिए संबंधित जानकारी RTI अधिनियम की धारा 8(1)(a) और 8(1)(g) के तहत सार्वजनिक किए जाने से छूट प्राप्त है।
दूसरी ओर, आरटीआई आवेदक की ओर से अधिवक्ता प्रसन्ना एस. ने अधिवक्ता इंजिला मुस्लिम जैदी, आशीष रेड्डी, प्रसन्ना बालकुमार और इशिता तुलस्यान के साथ पक्ष रखा।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर सार्वजनिक धन खर्च होता है। इसलिए इन यात्राओं से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक हित का महत्वपूर्ण विषय है।
उनका तर्क था कि आवेदक प्रधानमंत्री के साथ सरकारी खर्च पर यात्रा करने वाले निजी व्यक्तियों की जानकारी चाहता था, न कि सुरक्षाकर्मियों की पहचान।
सूचना का अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने RTI अधिनियम के तहत जानकारी प्राप्त करने के अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन के सवाल पर विचार किया।
कोर्ट ने सीबीएसई बनाम आदित्य बंदोपाध्याय मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सूचना प्राप्त करने का अधिकार पूर्ण या असीमित नहीं है।
संवेदनशील जानकारी की गोपनीयता सहित अन्य महत्वपूर्ण हितों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि RTI अधिनियम की धारा 8(1) के खंड (a) और (g) में पूर्ण छूट का प्रावधान है। केवल व्यापक सार्वजनिक हित का हवाला देकर इन प्रावधानों के तहत संरक्षित जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने धारा 8(1)(g) के दायरे को लेकर बिहार लोक सेवा आयोग बनाम सैयद हुसैन अब्बास रिजवी मामले के फैसले का भी उल्लेख किया।
यात्रियों के नाम छिपाने के बाद भी सुरक्षा को खतरा हो सकता है
हाईकोर्ट ने इस दलील पर भी विचार किया कि सुरक्षा अधिकारियों के नाम और उनकी पहचान से जुड़े विवरण हटाकर बाकी जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है।
हालांकि, कोर्ट ने वायुसेना की इस आशंका को स्वीकार किया कि केवल नाम या पहचान छिपा देने से सुरक्षा संबंधी खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं होगा।
जस्टिस महाजन ने कहा,
“लगातार कई उड़ानों की यात्री सूचियां सार्वजनिक करने से उनमें दर्ज विवरणों को पहले से सार्वजनिक अन्य जानकारियों के साथ जोड़कर सुरक्षा व्यवस्था के संवेदनशील पहलुओं का पता लगाया जा सकता है।”
कोर्ट ने माना कि इस तरह अलग-अलग यात्राओं की जानकारी को एक साथ जोड़कर प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण विवरण निकाले जा सकते हैं।
सुरक्षा एजेंसियों के आकलन पर अपील की तरह फैसला नहीं कर सकते कोर्ट और CIC
दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री की सुरक्षा के संबंध में सक्षम सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
जस्टिस अमित महाजन ने कहा,
“यह कोर्ट या केंद्रीय सूचना आयोग सक्षम सुरक्षा एजेंसियों के उस आकलन पर अपीलीय प्राधिकारी की तरह विचार नहीं कर सकते कि किसी विशेष जानकारी को सार्वजनिक करने से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है या प्रधानमंत्री के जीवन और शारीरिक सुरक्षा को जोखिम पैदा हो सकता है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा संबंधी संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक करने के संभावित परिणामों का आकलन संबंधित सुरक्षा एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
सार्वजनिक धन खर्च होने मात्र से संवेदनशील जानकारी देने का अधिकार नहीं
हाईकोर्ट ने आरटीआई आवेदक की इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर जनता का पैसा खर्च होने के कारण संबंधित सभी रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक धन के उपयोग का सवाल महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इससे राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित संवेदनशील जानकारियों के खुलासे को अपने आप उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस महाजन ने कहा,
“केवल इस तथ्य से कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर सार्वजनिक धन खर्च किया गया है, ऐसी जानकारी सार्वजनिक करना उचित नहीं हो जाता जिससे इन यात्राओं के लिए की गई सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।”
कोर्ट ने इस प्रकार स्पष्ट किया कि सार्वजनिक धन खर्च होने का आधार RTI अधिनियम के तहत उपलब्ध सुरक्षा संबंधी छूट को समाप्त नहीं करता।
CIC का आदेश रद्द, वायुसेना की याचिका मंजूर
दिल्ली हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि केंद्रीय सूचना आयोग ने SFR-II रिकॉर्ड सार्वजनिक करने का निर्देश देकर गलती की थी।
कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा अधिकारियों के नाम और उनकी पहचान से जुड़े विवरण हटाने के बाद भी इन रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने से सुरक्षा संबंधी जोखिम बना रह सकता है।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने भारतीय वायुसेना की याचिका स्वीकार करते हुए केंद्रीय सूचना आयोग का 8 जुलाई 2020 का आदेश रद्द कर दिया।
इसके साथ ही मामले में लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया गया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी, कार्मिक सेवा निदेशालय, वायु मुख्यालय, भारतीय वायुसेना बनाम कमोडोर लोकेश के. बत्रा (सेवानिवृत्त)
केस नंबर: रिट याचिका (सिविल) संख्या 10165/2020
बेंच: जस्टिस अमित महाजन
फैसले की तारीख: 15 अक्टूबर 2026

