आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) को एक दिवंगत एनआरआई की बहन को उनके हिस्से की विदेशी मुद्रा जमा राशि जारी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब वसीयत को लेकर 23 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी उत्तराधिकारियों के बीच कोई विवाद या विपरीत दावा मौजूद नहीं है, तब बैंक प्रोबेट आदेश पेश करने की जिद नहीं कर सकता।
जस्टिस रवि चीमलापाटी ने शेखरमंतरी प्रमीला द्वारा बैंक और राज्य सरकार के विरुद्ध दायर याचिका का निस्तारण करते हुए 3 सितंबर को यह फैसला सुनाया। अदालत ने याचिकाकर्ता की अधिक उम्र और किसी भी प्रतिद्वंद्वी दावे के न होने को ध्यान में रखते हुए एसबीआई को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता से एक क्षतिपूर्ति बंधपत्र (इंडेम्निटी बॉन्ड) प्राप्त कर उन्हें उनके हिस्से की एफसीएनआर (फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट) जमा और संबंधित निवेशों की राशि सौंप दे।
23 वर्षों में किसी भी पक्ष ने नहीं जताया ऐतराज
हाईकोर्ट ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि खाताधारक की मृत्यु वर्ष 2003 में हुई थी, लेकिन बीते 23 वर्षों में न तो अन्य लाभार्थियों और न ही दिवंगत व्यक्ति की पत्नी या बेटे ने संपत्ति के वितरण पर कोई आपत्ति दर्ज कराई। इस मामले में दिवंगत व्यक्ति की पत्नी और बेटे अदालती कार्यवाही में शामिल नहीं हुए, जबकि वसीयत के एक प्रशासक ने स्वयं बैंक को पत्र लिखकर याचिकाकर्ता का हिस्सा जारी करने की सिफारिश की थी।
बैंक द्वारा कोर्ट से प्रोबेट आदेश लाने की मांग को खारिज करते हुए अदालत ने साफ किया कि आंध्र प्रदेश में वसीयत का प्रोबेट कराना कभी भी कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं रहा। इसके अतिरिक्त, संसद द्वारा 2025 में किए गए वैधानिक संशोधनों के जरिए देश भर में प्रोबेट की अनिवार्यता को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। ऐसे में बैंक के पास याचिकाकर्ता से इस प्रकार के प्रमाणीकरण की मांग करने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता।
दो दशक से जारी था प्रक्रियागत गतिरोध
यह विवाद याचिकाकर्ता के दिवंगत भाई द्वारा वर्ष 1995 में निष्पादित की गई वसीयत से उत्पन्न हुआ था। उस वसीयत के तहत उन्होंने अपनी कुल संपत्ति का दो-तिहाई हिस्सा अपने बेटे के नाम और शेष एक-तिहाई हिस्सा अपनी चार बहनों में बराबर बांटने का प्रावधान किया था।
भाई के निधन के बाद, चार बहनों में से एक ने सक्षम अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां एक गवाह के बयान के जरिए वसीयत की वैधता सिद्ध की गई और उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त किया गया। उसी दस्तावेज के आधार पर एसबीआई ने वर्ष 2007 में उस बहन को उनके हिस्से की 19 लाख रुपये की राशि जारी कर दी थी।
हालांकि, जब प्रमीला ने अपने समान हिस्से की मांग की, तो बैंक ने भुगतान करने से इनकार करते हुए उनसे स्वतंत्र प्रोबेट आदेश या नया उत्तराधिकार प्रमाण पत्र लाने को कहा। इसके बाद जब उन्होंने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र हासिल करने की कोशिश की, तो बैंक ने इस आधार पर विरोध किया कि संपत्ति का निस्तारण वसीयत के तहत होना है। याचिकाकर्ता ने राहत पाने के लिए जिला उपभोक्ता फोरम और बैंकिंग लोकपाल से भी गुहार लगाई, लेकिन दोनों जगह से निराशा हाथ लगने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने खारिज की बैंक की आपत्तियां
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील सारंग अफजलपुरकर ने तर्क दिया कि पूर्व की अदालती कार्यवाही से वसीयत की सत्यता सिद्ध हो चुकी थी और बैंक के पास वसीयत के प्रशासक का लिखित सहमति पत्र भी था। इसके बावजूद राशि को रोके रखना बैंक की मनमानी है और यह संविधान प्रदत्त अधिकारों का हनन करता है।
इसके विपरीत, एसबीआई के वकील के. बी. रमन्ना डोरा ने बैंक के रुख का बचाव करते हुए दलील दी कि मृत व्यक्ति की संपत्ति जारी करने से पहले प्रोबेट या उत्तराधिकार प्रमाण पत्र मांगना एक जरूरी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय था।
हाईकोर्ट ने बैंक की इन दलीलों को नकार दिया। अदालत ने कहा कि वर्ष 1995 की वसीयत की सत्यता वर्ष 2007 में ही सक्षम अदालत के समक्ष साबित हो चुकी थी, जब दूसरी बहन को भुगतान किया गया था। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के तहत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र केवल वहीं वर्जित है जहां प्रोबेट या लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन कानूनी रूप से अनिवार्य हों। चूंकि आंध्र प्रदेश में प्रोबेट कभी अनिवार्य नहीं था और अब इसे पूरे देश में निष्प्रभावी कर दिया गया है, इसलिए बैंक याचिकाकर्ता के समक्ष ऐसी अनावश्यक बाधाएं खड़ी नहीं कर सकता।

