सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी नियुक्त व्यक्ति के पास किसी सार्वजनिक पद के लिए निर्धारित अनिवार्य न्यूनतम वैधानिक योग्यता मौजूद है, तो उसे पद से हटाने के लिए अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) की रिट जारी नहीं की जा सकती। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करते हुए यह निर्देश दिया कि एक असिस्टेंट प्रोफेसर द्वारा कथित रूप से जाली पीएचडी डिग्री के आधार पर नियुक्ति पाने के आरोपों की नए सिरे से जांच कराई जाए। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें असफल उम्मीदवारों द्वारा दाखिल याचिका को खारिज कर दिया गया था। पीठ ने माना कि चूंकि संबंधित अभ्यर्थी ने यूजीसी-नेट (UGC-NET) परीक्षा पास कर रखी थी, इसलिए वह इस पद के लिए अनिवार्य न्यूनतम पात्रता मानदंडों को पूरा करता था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद हरियाणा के रोहतक स्थित महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी से संबद्ध सत जिंदा कल्याणा कॉलेज द्वारा 14 फरवरी 2018 को जारी एक भर्ती विज्ञापन से जुड़ा है। कॉलेज ने शारीरिक शिक्षा (फिजिकल एजुकेशन) में असिस्टेंट प्रोफेसर के एक पद के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। अपीलकर्ताओं, छठे प्रतिवादी और 17 अन्य उम्मीदवारों ने इस पद के लिए आवेदन किया था। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद छठे प्रतिवादी को सबसे योग्य उम्मीदवार घोषित करते हुए नियुक्त कर दिया गया, जबकि अपीलकर्ता मेरिट लिस्ट में जगह नहीं बना सके।
नियुक्ति के उपरांत, पहले अपीलकर्ता के भाई ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी, झांसी से छठे प्रतिवादी की पीएचडी डिग्री की प्रामाणिकता को लेकर जानकारी मांगी। बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी ने 11 जुलाई 2018 को दिए अपने जवाब में खुलासा किया कि छठे प्रतिवादी ने वहां से कभी कोई पीएचडी कोर्स नहीं किया, क्योंकि 2011 से 2014 के दौरान—जिस अवधि में अभ्यर्थी ने डिग्री प्राप्त करने का दावा किया था—विश्वविद्यालय द्वारा कोई पीएचडी कार्यक्रम संचालित ही नहीं किया गया था।
इसके बाद अपीलकर्ताओं ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) रिट की मांग करते हुए आरोप लगाया कि छठे प्रतिवादी ने जाली डिग्री के दम पर सार्वजनिक पद हथिया लिया है। हाईकोर्ट के सिंगल जज और बाद में डिवीजन बेंच, दोनों ने ही इस चुनौती को खारिज कर दिया। इसके बाद अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
हाईकोर्ट के समक्ष कार्यवाही
हाईकोर्ट के सिंगल जज ने महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी के जवाबी हलफनामे पर गौर करने के बाद रिट याचिका खारिज कर दी थी। यूनिवर्सिटी ने अपने हलफनामे में कहा था कि उसने एक स्वतंत्र जांच कराई थी जिसमें छठे प्रतिवादी की पीएचडी डिग्री सही पाई गई थी। सिंगल जज ने यह भी माना कि हरियाणा सरकार द्वारा अधिसूचित भर्ती मानदंडों के अनुसार उम्मीदवार के पास या तो पीएचडी डिग्री होनी चाहिए थी या फिर वह यूजीसी-नेट परीक्षा उत्तीर्ण होना चाहिए था। चूंकि छठे प्रतिवादी ने निर्विवाद रूप से यूजीसी-नेट पास किया था—जिस योग्यता पर कोई विवाद नहीं था—इसलिए पीएचडी विवाद के बावजूद वह अनिवार्य पात्रता पूरी करता था। सिंगल जज ने रेखांकित किया कि अपीलकर्ताओं ने यूनिवर्सिटी के इन तथ्यों का कोई खंडन नहीं किया था।
इसके बाद दाखिल इंट्रा-कोर्ट अपील को डिवीजन बेंच ने पोषणीयता (maintainability) और याचिका दायर करने के अधिकार (locus standi) के अभाव में खारिज कर दिया। डिवीजन बेंच ने पाया कि चयन प्रक्रिया के बाद तैयार की गई शीर्ष तीन अनुशंसित उम्मीदवारों की मेरिट लिस्ट में अपीलकर्ताओं का नाम ही नहीं था। बेंच ने कहा कि चयन प्रक्रिया में असफल रहने वाले उम्मीदवार अपनी व्यक्तिगत शिकायतें दूर करने के लिए अधिकार-पृच्छा जैसी असाधारण संवैधानिक शक्ति का सहारा नहीं ले सकते। डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों—ए.एन. शास्त्री बनाम पंजाब राज्य, आर.के. जैन बनाम भारत संघ, डॉ. बी. सिंह बनाम भारत संघ, और बी. श्रीनिवास रेड्डी बनाम कर्नाटक अर्बन वाटर सप्लाई एंड ड्रेनेज बोर्ड एम्प्लॉइज एसोसिएशन—का हवाला देते हुए यह निर्णय सुनाया था।
अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) पर कानूनी विश्लेषण और सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती से संबंधित वैधानिक ढांचे और अनिवार्य योग्यताओं का परीक्षण किया। पीठ ने उल्लेख किया कि हालांकि यूजीसी ने 2018 के नियमों को संलग्न करते हुए हलफनामा दिया था, लेकिन वे नियम 18 जुलाई 2018 से प्रभावी हुए थे, जबकि वर्तमान भर्ती का विज्ञापन 14 फरवरी 2018 को ही जारी हो चुका था। इसलिए इस मामले में 2010 के पुराने नियम लागू होंगे। 2010 के नियमों के तहत, असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए यूजीसी-नेट या समकक्ष मान्यता प्राप्त परीक्षा (स्लेट/सेट) पास करना अनिवार्य न्यूनतम योग्यता थी; केवल 2009 के पीएचडी नियमों के तहत डिग्री पाने वालों को ही नेट से छूट प्राप्त थी।
अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) रिट के दायरे को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“अधिकार-पृच्छा की प्रकृति वाली रिट की कार्यवाही में सफलता पाने के लिए, याचिकाकर्ता—चाहे वह कोई अजनबी ही क्यों न हो—के लिए यह साबित करना नितांत आवश्यक है कि नियुक्त व्यक्ति के पास सार्वजनिक पद धारण करने की अनिवार्य योग्यता नहीं थी या वह किसी अन्य ऐसी अयोग्यता से ग्रस्त था जिसके कारण वह पद पर नहीं रह सकता था, और इस प्रक्रिया में उसने एक सार्वजनिक पद को अनाधिकृत रूप से हथिया लिया है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को पुख्ता सबूतों के जरिए यह प्रारंभिक भार सिद्ध करना होता है, जिसके बाद ही नियुक्ति प्राधिकारी और नियुक्त व्यक्ति पर यह साबित करने का दायित्व आता है कि प्रक्रिया में कोई अवैधता नहीं हुई है। इस मामले में कोर्ट ने पाया कि यूजीसी-नेट पास होने की वजह से पीएचडी होना केवल एक ‘वांछनीय’ (desirable) योग्यता थी, जिसके लिए 10 अतिरिक्त अंक निर्धारित थे, न कि वह कोई अपरिहार्य अनिवार्य शर्त थी। कोर्ट ने कहा:
“अतः पीएचडी डिग्री के अभाव में अभ्यर्थियों के लिए यूजीसी-नेट परीक्षा पास करना अनिवार्य था, जिसे छठे प्रतिवादी ने वास्तव में उत्तीर्ण किया था। इसलिए, किसी भी तर्क से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसके पास अनिवार्य योग्यता की कमी थी; हालांकि, हम यह टिप्पणी करना आवश्यक समझते हैं कि यह पूरी तरह संभव है कि संदिग्ध पीएचडी डिग्री के बदले मिले अंकों के बल पर उसने मेरिट लिस्ट में दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे उम्मीदवारों को पछाड़ दिया हो।”
चूंकि अपीलकर्ता स्वयं मेरिट लिस्ट में शीर्ष स्थान पर नहीं थे और नियुक्त व्यक्ति बुनियादी वैधानिक पात्रता पूरी करता था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा अधिकार-पृच्छा रिट जारी करने से इनकार के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी।
अनुच्छेद 142 के तहत निर्देश और “फर्जी तथा फर्जीवाड़ा” डिग्री की जांच
अधिकार-पृच्छा याचिका में नियुक्ति को तत्काल रद्द करने से इनकार करते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सामने आए तथ्यों पर गहरी चिंता व्यक्त की। 24 जनवरी 2025 के अदालती आदेश के अनुपालन में बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार या परीक्षा नियंत्रक ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा पेश किया था। पीठ ने पाया कि इस हलफनामे की सामग्री “प्रथम दृष्टया किसी के मन में भी इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं छोड़ती कि चौथे प्रतिवादी द्वारा दावा की गई डिग्री ‘फेक और फर्जी’ है।” बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी ने 15 सितंबर 2018 के सत्यापन पत्र और संलग्न प्रमाण पत्र को भी पूरी तरह कूटरचित और जाली करार दिया था।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह इन गंभीर तथ्यों की अनदेखी नहीं कर सकता। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए पीठ ने निर्देश दिया:
“यदि छठे प्रतिवादी ने वास्तव में प्रक्रिया की शुरुआत में ही धोखे से नियुक्ति प्राप्त की है, तो अपीलकर्ताओं द्वारा मांगी गई किसी सकारात्मक राहत के बिना इन अपीलों का केवल निपटारा हो जाना इस नियुक्ति को बनाए रखने के लिए कोई सुरक्षा कवच नहीं बनेगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया कि वह “दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए” एक नई जांच करे। इस जांच को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत संचालित किया जाएगा:
- छठे प्रतिवादी को बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी के अधिकारियों की उपस्थिति में अपनी मूल पीएचडी डिग्री पेश करनी होगी।
- बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी के अधिकारियों को वह दस्तावेजी साक्ष्य पेश करना होगा जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया गया था।
- छठे प्रतिवादी को अपने बचाव का पूरा अवसर और गवाहों से जिरह (cross-examination) करने का अधिकार दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि पीएचडी डिग्री जाली है, तो महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी, सत जिंदा कल्याणा कॉलेज, बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी या किसी भी अन्य व्यक्ति के लिए कानून के अनुसार छठे प्रतिवादी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराने का मार्ग खुला रहेगा।
इन निर्देशों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलों का निपटारा कर दिया और पक्षों को अपना खर्च स्वयं वहन करने का आदेश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अन्नू कुमार एवं अन्य बनाम महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी रोहतक एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… / 2026 (स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) संख्या 24737-24739/2023)
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन
निर्णय की तिथि: 8 सितंबर 2026

