पालघर के एक निजी अस्पताल में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के साथ मारपीट तथा तोड़फोड़ के मामले में पुलिस की ढिलाई पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने मामले में पुलिस की कथित निष्क्रियता पर नाराजगी जताते हुए पालघर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को बुधवार को केस डायरी और सभी दस्तावेजों के साथ खुद कोर्ट में हाजिर होने का निर्देश दिया।
जस्टिस ए एस गडकरी और जस्टिस कमल खाता की खंडपीठ ने यह आदेश मंगलवार को उस समय जारी किया, जब उन्हें बताया गया कि 5 सितंबर को रिलीफ अस्पताल में हुई हिंसक घटना के बाद भी स्थानीय पुलिस ने जांच में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। यह मामला उस वक्त सामने आया जब हाईकोर्ट ठाणे के एक नगर निगम अस्पताल में जुलाई महीने में डॉक्टरों पर हुए हमले को लेकर स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) याचिका पर सुनवाई कर रही थी। ठाणे वाले मामले में शिवसेना नगरसेवक रमेश म्हात्रे आरोपी हैं।
अस्पताल में तोड़फोड़ और मरीजों को जबरन ले जाने का आरोप
वरिष्ठ वकील अशोक मुंदारगी ने सुनवाई के दौरान पीठ को पालघर की घटना से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि 5 सितंबर को दही हांडी उत्सव के दौरान घायल हुए पांच गोविंदाओं को इलाज के लिए पालघर के रिलीफ अस्पताल में लाया गया था। इनमें से तीन मरीजों की गंभीर स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें आईसीयू में भर्ती किया और सीटी स्कैन कराने की सलाह दी।
आरोप है कि इसके तुरंत बाद शिवसेना के कई कार्यकर्ता जबरन अस्पताल परिसर में घुस आए। इन लोगों ने संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों को धमकाया और स्वास्थ्य कर्मियों से मारपीट की। इसके बाद वे गंभीर रूप से घायल मरीजों को जबरन अपने साथ लेकर चले गए। आरोप के मुताबिक, शिवसेना के शहर प्रमुख राहुल घरात ने एक स्टाफ सदस्य को थप्पड़ मारा, जबकि जिला प्रमुख कुंदन संखे और अन्य कार्यकर्ताओं ने डॉक्टरों को भयभीत किया।
विधायक के बेटे समेत 17 लोगों पर एफआईआर, एक गिरफ्तार
अस्पताल में हुए इस उपद्रव के बाद पुलिस ने 17 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। नामजद आरोपियों में शिवसेना जिला प्रमुख कुंदन संखे, शहर प्रमुख राहुल घरात और स्थानीय विधायक राजेंद्र गावित के बेटे व उप-तालुका प्रमुख रोहित गावित शामिल हैं।
पुलिस ने कार्रवाई करते हुए सोमवार को राहुल घरात को गिरफ्तार किया था। इसके बाद उसे स्थानीय अदालत में पेश किया गया, जहां से अदालत ने उसे एक दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया।
डॉक्टरों पर ही केस दर्ज कराने का दबाव, कोर्ट में आईएमए ने उठाए सवाल
अदालत में यह बात भी सामने रखी गई कि स्थानीय पुलिस पर डॉक्टरों के खिलाफ ही अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के तहत काउंटर केस दर्ज करने का दबाव बनाया जा रहा है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एस यू कामदार ने अदालत से कहा कि मामला दर्ज होने के बावजूद पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाने के लिए कोई गंभीर और ठोस कदम नहीं उठाए हैं।
जब खंडपीठ ने इस मामले में हुई प्रगति को लेकर सरकारी पक्ष से सवाल किया, तो अतिरिक्त लोक अभियोजक श्रीकांत गंवड ने कहा कि उन्हें जांच अधिकारियों की ओर से कोई निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं, जिसके चलते उन्होंने अदालत से समय देने का अनुरोध किया। इस पर हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई बुधवार तय करते हुए पालघर के पुलिस अधीक्षक को पूरे केस रिकॉर्ड के साथ अदालत में उपस्थित रहने का कड़ा निर्देश जारी किया।

