पश्चिम बंगाल राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 53.72 लाख रुपये की लक्जरी एसयूवी में ऑडियो से जुड़ी खराबी ठीक न कर पाने और घटिया आफ्टर-सेल्स सर्विस देने के मामले में डीलरशिप और उसके वर्कशॉप पर 1.5 लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। हालांकि, आयोग ने पूरी गाड़ी बदलने या पूरी रकम वापस करने की शिकायतकर्ता की मांग खारिज कर दी है।
आयोग के न्यायिक सदस्य राजेश गुहा रे और सदस्य शांतनु साहा की पीठ ने 3 सितंबर को फैसला सुनाते हुए लेक्सस मोटर्स लिमिटेड और लेक्सस मोटर्स लिमिटेड (वर्कशॉप) को संयुक्त और अलग-अलग रूप से सेवा में कमी का जिम्मेदार ठहराया। पीठ ने आदेश दिया कि डीलरशिप और वर्कशॉप मिलकर शिकायतकर्ता जेनियाक इनोवेशन इंडिया लिमिटेड को सेवा में खामी के लिए 1 लाख रुपये का मुआवजा और कानूनी खर्च के रूप में 50,000 रुपये का भुगतान करें। यह राशि 45 दिनों के भीतर चुकानी होगी। तय समय में भुगतान न होने पर डिफ़ॉल्ट की तारीख से पूरी वसूली तक 9 प्रतिशत सालाना की दर से साधारण ब्याज देना होगा। इसके साथ ही आयोग ने कार मालिक को ऑडियो समस्या की जांच कराने का एक अंतिम मौका भी दिया है।
पार्ट्स की खराबी और गाड़ी की बनावट में दोष के बीच अंतर
आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कार बदलने, पूरा पैसा लौटाने और 8,21,809 रुपये के नुकसान की भरपाई से जुड़ी मांगें नामंजूर कर दीं। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी एक पुर्जे की खराबी और पूरी गाड़ी में बुनियादी या सिस्टमैटिक निर्माण दोष (मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट) होने में बड़ा फर्क होता है।
आयोग ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि पूरी गाड़ी में ही निर्माण संबंधी कोई बुनियादी खामी है। रिकॉर्ड में किसी स्वतंत्र ऑटोमोबाइल इंजीनियर की रिपोर्ट, डायग्नोस्टिक स्कैन, तुलनात्मक ऑडियो टेस्ट, प्रयोगशाला विश्लेषण या आयोग द्वारा कराई गई किसी जांच की रिपोर्ट मौजूद नहीं थी। इसके अलावा, कार के आगे के दरवाजे के ठीक से बंद न होने के आरोप को साबित करने के लिए भी कोई जॉब कार्ड, निरीक्षण रिपोर्ट, तस्वीर या तकनीकी विशेषज्ञ की राय पेश नहीं की गई।
पीठ ने रेखांकित किया कि डिलीवरी के कुछ ही दिनों भीतर म्यूजिक सिस्टम की शिकायत की गई थी और डीलर ने खुद वारंटी के तहत उसके पार्ट्स बदले थे। इससे यह तो साबित होता है कि उस वक्त उस पुर्जे में तकनीकी खराबी थी, लेकिन केवल इसके आधार पर पूरी लक्जरी गाड़ी को बदलना या उसका पैसा वापस मांगना न्यायसंगत नहीं है।
डिलीवरी के तीन दिन बाद ही शुरू हुआ विवाद
शिकायतकर्ता कंपनी ने यह लक्जरी एसयूवी अपने निदेशक के निजी इस्तेमाल के लिए 31 मार्च 2019 को खरीदी थी, जिसकी डिलीवरी 5 अगस्त 2019 को मिली। डिलीवरी के महज तीन दिन बाद, यानी 8 अगस्त 2019 से ही खरीदार ने ईमेल के जरिए शिकायतें भेजना शुरू कर दिया। इनमें कार का अगला दरवाजा ठीक से बंद न होने और ऑडियो सिस्टम के काम न करने का मुद्दा उठाया गया।
इसके बाद 19 अगस्त 2019 को गाड़ी पहली बार वर्कशॉप भेजी गई। समस्या का समाधान न होने पर 16 सितंबर 2019 को कानूनी नोटिस जारी किया गया। करीब तीन महीने बाद, 26 नवंबर 2019 को शिकायतकर्ता ने वर्कशॉप से गाड़ी वापस ली। लेकिन डिलीवरी के समय दिए गए फीडबैक में दर्ज किया गया कि आगे के बाएं स्पीकर से अजीब आवाज लगातार आ रही है। आयोग के समक्ष आफ्टर-सेल्स सर्विस में लापरवाही साबित करने में डिलीवरी का यही फीडबैक सबसे अहम कड़ी साबित हुआ।
दोनों पक्षों की दलीलें और आयोग की टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता जेनियाक इनोवेशन की ओर से पेश वकील सौग्निक सेन रॉय और दीप्यमान सिन्हा ने दलील दी कि बार-बार वर्कशॉप ले जाने और कई बार मरम्मत के बावजूद खराबी दूर नहीं हुई, इसलिए पूरी गाड़ी बदली जानी चाहिए या पूरा पैसा वापस मिलना चाहिए।
दूसरी तरफ, अधिकृत डीलर और वर्कशॉप की ओर से वकील ए के बिस्वास ने किसी भी तरह के निर्माण दोष से इनकार किया। उन्होंने ऑडियो सिस्टम की शिकायत स्वीकार करते हुए कहा कि जरूरी पार्ट्स वारंटी के तहत मुफ्त में बदल दिए गए थे और वाहन डिलीवरी के लिए पूरी तरह तैयार था।
मामले पर टिप्पणी करते हुए आयोग ने कहा कि नई प्रीमियम गाड़ी खरीदने वाला ग्राहक बेहतर तकनीकी जांच, पारदर्शी संवाद और वारंटी के प्रभावी समाधान का हकदार होता है। जब म्यूजिक सिस्टम की खराबी सामने थी, तब ठोस डायग्नोस्टिक पुष्टि के बिना शिकायत को अनसुलझा छोड़ देना सीधे तौर पर सेवा में गंभीर लापरवाही है।

