सार्वजनिक नियोजन और सेवा शर्तों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न फीडर काडरों के बीच भर्ती और पदोन्नति (प्रमोशन) का कोटा तय करना या उसमें बदलाव करना पूरी तरह नियोक्ता का नीतिगत अधिकार है। जस्टिस बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने 39 जूनियर इंजीनियरों (कनिष्ठ अभियंताओं) द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया। याचिकाकर्ताओं ने असिस्टेंट इंजीनियर (सहायक अभियंता) के पद पर प्रमोशन कोटा 70 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत करने और सीधी भर्ती का कोटा बढ़ाकर 50 प्रतिशत किए जाने को चुनौती दी थी। कोर्ट ने दोहराया कि किसी भी कर्मचारी के पास तत्कालीन नियमों के तहत प्रमोशन पर केवल विचार किए जाने का अधिकार होता है, प्रमोशन पाने का कोई निहित या पक्का अधिकार नहीं होता। साथ ही, प्रमोशन के अवसरों में कमी आने मात्र से संविधान के अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 16 का उल्लंघन नहीं होता।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता वर्ष 2018 में छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड (सीएसपीजीसीएल) में जूनियर इंजीनियर (प्लांट) के पद पर नियुक्त हुए थे और बाद में उनकी सेवाएं नियमित व पक्की कर दी गई थीं। उनकी नियुक्ति के समय असिस्टेंट इंजीनियर के पदों पर भर्ती का अनुपात 40 प्रतिशत प्रमोशन, 50 प्रतिशत खुली सीधी भर्ती और 10 प्रतिशत विभागीय भर्ती के रूप में तय था।
इसके बाद, निदेशक मंडल के निर्णय के तहत 19 मार्च 2021 को एक पत्र जारी कर भर्ती कोटा संशोधित कर दिया गया। इसके जरिए प्रमोशन कोटे को बढ़ाकर 70 प्रतिशत कर दिया गया, जबकि खुली सीधी भर्ती को घटाकर 20 प्रतिशत और विभागीय भर्ती को 10 प्रतिशत रखा गया। अपनी पात्रता अवधि पूरी करने के बाद याचिकाकर्ताओं का नाम 21 फरवरी 2024 की ग्रेडेशन सूची में शामिल किया गया, जिससे वे प्रमोशन के लिए पात्र हो गए।
हालांकि, वर्ष 2024 में विभाग ने एक विस्तृत नोट तैयार कर पुराने कोटे को दोबारा बहाल करने का प्रस्ताव रखा। इसके बाद छत्तीसगढ़ स्टेट पावर ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड (सीएसपीटीसीएल) के निदेशक मंडल की 8 अप्रैल 2025 को हुई 117वीं बैठक में एजेंडा नंबर 117/07 के तहत संकल्प पारित किया गया। इसमें प्रमोशन कोटा 40 प्रतिशत, खुली सीधी भर्ती 50 प्रतिशत और विभागीय भर्ती 10 प्रतिशत तय करने की मंजूरी दी गई। इसके पालन में 5 मई 2025 को प्रशासनिक आदेश और 22 जुलाई 2026 को अंतिम आदेश जारी किया गया। इसके बाद 7 अगस्त 2026 को असिस्टेंट इंजीनियर (उत्पादन) के 60 पदों पर सीधी भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला गया। इस फैसले और भर्ती विज्ञापन के खिलाफ जूनियर इंजीनियरों ने हाईकोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर की।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मनोज परांजपे ने दलील दी कि प्रमोशन कोटा 70 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत करने से योग्य और अनुभवी जूनियर इंजीनियरों के पदोन्नति के अवसरों में भारी कमी आई है। उन्होंने तर्क दिया कि 5 मई 2025 को कोटा बदलने के आदेश के बावजूद 20 अप्रैल 2026 को पुराने कोटे के आधार पर 23 जूनियर इंजीनियरों को पदोन्नत किया गया, जो विभाग की मनमानी को दर्शाता है।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि विभाग के पास पहले से ही पर्याप्त संख्या में योग्य और अनुभवी इन-हाउस इंजीनियर मौजूद हैं, इसलिए सीधी भर्ती बढ़ाने का कोई ठोस आधार नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम बनदीप सिंह और ए. सत्यनारायण बनाम एस. पुरुषोत्तम जैसे मामलों का हवाला देते हुए 5 मई 2025 और 22 जुलाई 2026 के आदेशों तथा 7 अगस्त 2026 के भर्ती विज्ञापन को रद्द करने और 70 प्रतिशत कोटा बहाल करने की मांग की।
प्रतिवादियों की दलीलें
याचिका का विरोध करते हुए सीएसपीजीसीएल की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट प्रफुल्ल एन. भारत ने दलील दी कि आक्षेपित आदेशों से केवल भर्ती कोटे का पुनर्गठन हुआ है और याचिकाकर्ताओं के प्रमोशन का रास्ता बंद नहीं हुआ है, क्योंकि 40 प्रतिशत पद पदोन्नति और 10 प्रतिशत विभागीय भर्ती के लिए अब भी सुरक्षित हैं। उन्होंने तर्क दिया कि कर्मचारियों के पास 70 प्रतिशत कोटे को हमेशा बनाए रखने की मांग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, क्योंकि प्रमोशन के महज अवसर सेवा की शर्त नहीं होते।
प्रतिवादियों ने कोर्ट को बताया कि कंपनी की आगामी परियोजनाओं, जैसे 2×660 मेगावाट के नए बिजली संयंत्रों और पंप स्टोरेज परियोजनाओं के संचालन और रखरखाव के लिए ग्रेजुएट इंजीनियरों की सख्त आवश्यकता है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के दिशानिर्देशों के तहत भी 210 मेगावाट या उससे अधिक क्षमता की इकाइयों का संचालन ग्रेजुएट इंजीनियरों से कराया जाना अनिवार्य है। इसके अलावा, अप्रैल 2026 में 23 इंजीनियरों की पदोन्नति पूर्व में बुलाई गई विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की सिफारिशों पर आधारित थी। शासन और ट्रांसमिशन कंपनी के वकीलों ने भी इन दलीलों का समर्थन करते हुए कहा कि नीतिगत मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा बेहद सीमित है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
मामले के रिकॉर्ड और विभागीय नोट का अवलोकन करने के बाद जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने पाया कि प्रबंधन ने सभी व्यावहारिक पहलुओं पर विचार करने के बाद ही पुराने 40:10:50 के अनुपात को बहाल किया है। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी का अधिकार केवल उस समय लागू नियमों के अनुसार निष्पक्ष विचार किए जाने तक ही सीमित रहता है और पहले तय 70 प्रतिशत कोटे को स्थायी सेवा शर्त नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि भर्ती एजेंसियों द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं में दखल देने से पहले अदालतों को बहुत सतर्क रहना चाहिए। कोर्ट ने कहा:
“भर्ती एजेंसी द्वारा अपनाई गई भर्ती प्रक्रिया के मामले में अदालतों को सतर्क और धीमा रुख अपनाना होगा। नियमों और विनियमों को लागू करने में काफी सोच-विचार किया जाता है। महज इसलिए कि भर्ती एजेंसी अदालत को संतुष्ट करने की स्थिति में नहीं है, उम्मीदवारों को राहत नहीं दी जा सकती।”
सेवा नियमों के स्थापित सिद्धांतों पर जोर देते हुए कोर्ट ने कहा:
“यह स्थापित कानून है कि नियमों में बदलाव या संशोधन के कारण यदि प्रमोशन के अवसरों में कोई कमी आती है, तो इससे किसी कर्मचारी के मौलिक अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि एक लोक सेवक के पास केवल तत्कालीन नियमों के अनुसार पदोन्नति पर विचार किए जाने का अधिकार होता है।”
अपने निष्कर्षों को मजबूती देने के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के द्वारका प्रसाद बनाम भारत संघ (2003) के फैसले का हवाला देते हुए कहा:
“विभाग की संरचना और कार्यप्रणाली के आधार पर फीडर काडरों के विभिन्न पदों के लिए कोटा या पदोन्नति के अलग-अलग रास्ते तय करना नियोक्ता का विशेषाधिकार है, जो मुख्य रूप से नीति-निर्माण के क्षेत्र से संबंधित है। किसी विशेष पद के लिए कोटा तय करते समय कई पहलुओं पर विचार किया जाता है, जैसे फीडर कोटे में काडर की संख्या, फीडर पद पर तैनात कर्मचारियों की उपयुक्तता, उनके कार्यों की प्रकृति, अनुभव और फीडर काडर में उपलब्ध पदोन्नति के रास्ते। इनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पदोन्नति करने वाले प्राधिकारी को पद संभालने के लिए उपयुक्त उम्मीदवारों की कितनी आवश्यकता है। इस प्रकार विभिन्न प्रासंगिक कारकों पर विचार करने के बाद ही कोटा तय होता है। केवल फीडर काडर में कर्मचारियों की संख्या ज्यादा होना, प्रमोशन के अवसरों में समानता का दावा करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अन्य फैसलों—दिलीप कुमार गर्ग बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2009), डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत संघ (2023) और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम पुष्पा रानी (2008) का भी संदर्भ लिया और स्पष्ट किया कि प्रशासनिक जरूरतों का आकलन नियोक्ता ही सबसे बेहतर तरीके से कर सकता है। जब तक किसी नीतिगत फैसले में स्पष्ट मनमानापन, दुर्भावना या वैधानिक नियमों का उल्लंघन न दिखे, अदालतें उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा कि याचिकाकर्ता अपने किसी भी संवैधानिक या कानूनी अधिकार के हनन को साबित करने में विफल रहे हैं। कोर्ट ने निर्णय दिया कि प्रमोशन कोटा तय करना या उसमें फेरबदल करना नियोक्ता का नीतिगत निर्णय है और केवल प्रमोशन के अवसर कम होने से संविधान के अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 16 का उल्लंघन नहीं होता। आदेशों या 60 पदों के भर्ती विज्ञापन में कोई अवैधता न पाते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को आधारहीन मानकर खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: आशीष बंजारे और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीएस संख्या 6238/2026
पीठ: जस्टिस बिभु दत्त गुरु
निर्णय की तिथि: 7 सितंबर 2026

