मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी कॉलेज के एक वरिष्ठ समाजशास्त्र प्रोफेसर के तबादले और रिलीविंग आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्ति में महज 15 महीने बचे होने और नई जगह पर विषय का कोई स्वीकृत पद न होने के बावजूद किया गया यह तबादला नियमों के खिलाफ है।
हाईकोर्ट की एकल पीठ के जस्टिस आनंद सिंह बहरावत ने 2 सितंबर को यह फैसला भिंड के शासकीय महाविद्यालय में पदस्थ प्रोफेसर राम अवधेश शर्मा की याचिका पर सुनाया। कोर्ट ने पाया कि संबंधित संस्थान में स्वीकृत पद के अभाव, सेवा के अंतिम दौर में पेंशन प्रक्रिया में संभावित बाधा और पूरे प्रशासनिक घटनाक्रम को देखते हुए यह तबादला आदेश वैधानिक रूप से टिकने योग्य नहीं है।
स्वीकृत पद का अभाव और पेंशन संबंधी अड़चनें
याचिका का निपटारा करते हुए जस्टिस बहरावत ने रेखांकित किया कि जब 15 जून को तबादला आदेश जारी हुआ, तब प्रोफेसर शर्मा की सेवानिवृत्ति में करीब 15 महीने शेष थे और वर्तमान में केवल एक वर्ष बचा है। उनका रिटायरमेंट सितंबर 2027 में होना तय है। अदालत ने कहा कि सेवाकाल के अंतिम पड़ाव पर किसी कर्मचारी का स्थानांतरण करने से उसके पेंशन संबंधी मामलों और सेवानिवृत्ति परिलाभों के समय पर निपटारे में अनावश्यक देरी का जोखिम खड़ा होता है।
इसके अलावा, राज्य सरकार अदालत के समक्ष ऐसे ठोस साक्ष्य पेश करने में नाकाम रही, जिनसे यह साबित हो सके कि श्योपुर के ढोढर स्थित शासकीय महाविद्यालय में प्रोफेसर (समाजशास्त्र) का कोई स्वीकृत पद मौजूद है। हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि किसी संस्थान में अध्यापन कार्य उपलब्ध होना या अतिथि विद्वानों की मौजूदगी होना, प्रोफेसर के मूल पद के समकक्ष स्वीकृत पद का विकल्प नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी माना कि प्रोफेसर का भिंड में लगभग 25 वर्षों से पदस्थ रहना एक प्रशासनिक पहलू हो सकता है, लेकिन अकेले इस आधार पर अन्य सभी वैधानिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों को नजरअंदाज कर तबादले को जायज नहीं ठहराया जा सकता।
विवादित प्रशासनिक पृष्ठभूमि और कानूनी लड़ाई
प्रोफेसर शर्मा का यह तबादला कॉलेज में प्राचार्य पद को लेकर लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद के बीच हुआ था। शर्मा मई 2024 से भिंड कॉलेज में प्रभारी प्राचार्य की जिम्मेदारी संभाल रहे थे और नवंबर 2024 में ‘पीएम कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस’ योजना के तहत भी उनका चयन प्राचार्य के तौर पर हुआ था।
इसके बावजूद उच्च शिक्षा विभाग ने उनके स्थान पर एक कनिष्ठ प्रोफेसर को प्राचार्य बना दिया। शर्मा ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिस पर अदालत ने दिसंबर 2024 में अंतरिम रोक लगा दी थी। बाद में जुलाई 2025 में हाईकोर्ट ने कनिष्ठ प्राध्यापक की नियुक्ति को पूरी तरह रद्द करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया था कि किसी भी वरिष्ठ प्रोफेसर के ऊपर कनिष्ठ को पदस्थ नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता प्रशांत सिंह कौरव ने दलील दी कि अदालती जीत के तुरंत बाद प्रोफेसर शर्मा को भिंड से 230 से 250 किलोमीटर दूर श्योपुर स्थानांतरित कर दिया गया और अगले ही दिन रिलीविंग आदेश भी थमा दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कदम का मकसद सिर्फ कनिष्ठ प्राध्यापक को पद पर बनाए रखना था। इसके साथ ही तबादला करते समय प्रोफेसर की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं और सेवानिवृत्ति की निकटता पर भी ध्यान नहीं दिया गया।
राज्य सरकार की दलीलें खारिज
मध्य प्रदेश शासन की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक खेडकर ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि तबादला सेवा की एक सामान्य शर्त है। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को भिंड में ही बने रहने या प्रभारी प्राचार्य पद पर निरंतर कार्य करने का कोई निहित अधिकार प्राप्त नहीं है। राज्य ने यह भी दावा किया कि श्योपुर में समाजशास्त्र का कार्य उपलब्ध है और साथ ही याचिकाकर्ता के विरुद्ध कथित वित्तीय अनियमितताओं की पुरानी शिकायतों का उल्लेख किया।
इन दलीलों पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रभारी प्राचार्य की व्यवस्था महज एक कामचलाऊ प्रशासनिक तंत्र है, कोई स्थायी या मूल पद नहीं, इसलिए शर्मा का उस पद पर बने रहने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं बनता। अदालत ने साफ किया कि तबादला आदेश को प्रभारी पद से हटाए जाने के आधार पर रद्द नहीं किया गया है।
हालांकि, पुरानी शिकायतों के आधार पर तबादले को सही ठहराने की सरकारी दलील को अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस बहरावत ने कहा कि वित्तीय अनियमितताओं के इन अप्रमाणित आरोपों का तबादला आदेश में कोई उल्लेख नहीं था और न ही इस संबंध में कोई विभागीय जांच लंबित थी। अदालत ने टिप्पणी की कि बाद में पुराने और अप्रमाणित आरोपों को ढाल बनाकर किसी नियम-विरुद्ध तबादले को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

