कोच्चि केरल हाईकोर्ट ने सेरोगेसी (विनियमन) कानून के तहत निर्धारित अधिकतम उम्र सीमा को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया है। कोर्ट ने उस दंपती की अपील खारिज कर दी, जिसे पति की उम्र 55 वर्ष से अधिक हो जाने के कारण सरोगेसी पात्रता प्रमाणपत्र देने से मना कर दिया गया था।
जस्टिस के. नटराजन और जस्टिस जॉनसन जॉन की खंडपीठ ने 1 सितंबर के अपने आदेश में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) कानून के तय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए युक्तिसंगत वर्गीकरण की अनुमति देता है। बशर्ते यह वर्गीकरण मनमाना या कृत्रिम न हो और ठोस अंतर पर आधारित हो। पीठ ने माना कि सरोगेसी कानून में रखी गई उम्र की पाबंदी का विधायी उद्देश्य से सीधा और तार्किक संबंध है।
इस निर्णय के साथ ही हाईकोर्ट ने केरल राज्य असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी एवं सरोगेसी बोर्ड के इनकार और सिंगल जज द्वारा 1 जून 2026 को दिए गए उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें दंपती की याचिका पहले खारिज कर दी गई थी।
निचली अदालत से मिली थी राहत, बोर्ड ने उम्र पर अटकाया मामला
दंपती ने वर्ष 2022 में सरोगेसी प्रक्रिया की शुरुआत की थी। उनका कहना था कि उस दौरान पति की उम्र कानूनी रूप से मान्य 55 वर्ष की सीमा के भीतर थी। इलाज के बाद 30 अगस्त 2022 को उनके भ्रूण का सफल निषेचन हुआ और उन्हें क्रायोप्रिजर्व (सुरक्षित फ्रीज) कर दिया गया।
इसके बाद 21 जून 2023 को तिरुवनंतपुरम के जिला चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) ने दंपती को ‘सर्टिफिकेट ऑफ मेडिकल इंडिकेशन’ जारी कर सरोगेसी की चिकित्सकीय अनिवार्यता को प्रमाणित किया। इसके आधार पर दंपती और सरोगेट मां ने बच्चे के पितृत्व और संरक्षण (कस्टडी) संबंधी आदेश के लिए तिरुवनंतपुरम की निचली अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने 3 मई 2025 को उनके पक्ष में फैसला सुनाया।
इसके बाद 27 मई 2025 को दंपती ने राज्य सरोगेसी बोर्ड से कानूनी पात्रता प्रमाणपत्र के लिए औपचारिक आवेदन किया। हालांकि, बोर्ड ने यह कहते हुए अर्जी रद्द कर दी कि पति कानून में निर्धारित 55 वर्ष की अधिकतम उम्र सीमा पार कर चुके हैं।
भूतलक्षी प्रभाव और पात्रता की तारीख पर वकीलों की बहस
हाईकोर्ट में दंपती का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सनल कुमार एस. ने दलील दी कि कानून की उम्र सीमा को इस तरह भूतलक्षी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता, जिससे काफी आगे बढ़ चुकी प्रजनन प्रक्रिया पूरी तरह बाधित हो जाए। उन्होंने तर्क दिया कि पात्रता का पैमाना प्रक्रिया शुरू होने की तारीख होनी चाहिए, न कि प्रमाणपत्र जारी करने की तारीख। उन्होंने इसे समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) का हनन बताते हुए सरोगेसी कानून की तुलना ‘असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी’ (एआरटी) कानून से की।
वहीं, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से पेश डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ओ. एम. शलीना ने दलील दी कि कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी प्रमाणपत्र जारी करते समय ही आवेदकों की उम्र का आकलन करने के लिए बाध्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरोगेसी से जुड़ी कोई भी प्रक्रिया कानूनी शर्तों को पूरा किए बिना आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। केंद्र सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि सरोगेसी कानून जनवरी 2022 से लागू हो चुका था, जबकि दंपती ने बिना पात्रता प्रमाणपत्र लिए अगस्त 2022 में भ्रूण को सुरक्षित रखवाया। मामले में केरल सरकार और सरोगेसी बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ए. श्रीकला पेश हुईं।
दोनों कानूनों के उद्देश्य अलग, नियम में दखल से हाईकोर्ट का इनकार
खंडपीठ ने केंद्र सरकार और बोर्ड के तर्कों से सहमति जताई। अदालत ने कहा कि इस मामले को उन श्रेणियों में शामिल नहीं किया जा सकता जहां प्रक्रिया कानून बनने से पहले शुरू हुई थी, क्योंकि दंपती ने भ्रूण निषेचन और संरक्षण की प्रक्रिया कानून के अस्तित्व में आने के बाद शुरू की थी।
एआरटी कानून और सरोगेसी कानून के बीच समानता की दलीलों को खारिज करते हुए खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि दोनों कानूनों के विधायी उद्देश्य, नीति और कारण बिल्कुल भिन्न हैं। किसी एक कानून के प्रावधानों या शब्दों की व्याख्या को दूसरे कानून पर थोपा नहीं जा सकता। इन आधारों पर कोर्ट ने याचिका में कोई दम न पाते हुए दंपती की अपील खारिज कर दी।

