दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पदोन्नति प्रक्रिया में स्वेच्छा से भाग लेने वाला कोई भी कर्मचारी चयन में असफल होने के बाद पूरी प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठा सकता। अदालत ने कहा कि चयन प्रक्रिया में हिस्सा लेने के बाद बाहर हुए अभ्यर्थियों के कयासों और अनुमानों के आधार पर संस्थान के फैसलों में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के 63 वर्षीय कर्मचारी श्रवण कुमार विगमल की अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। पीठ ने अपने 2 सितंबर के आदेश में एकल न्यायाधीश के उस अप्रैल के फैसले को सही ठहराया, जिसमें बैंक की पदोन्नति सूची को चुनौती देने वाली याचिका रद्द कर दी गई थी।
दुर्भावना का आरोप लगाना आसान, लेकिन साबित करना कठिन
अदालत में अपनी पैरवी खुद कर रहे विगमल ने आरोप लगाया था कि बैंक ने उनके प्रति दुर्भावनापूर्ण रवैया अपनाया और पूर्व में कानूनी रास्ता अख्तियार करने की वजह से उन्हें जानबूझकर पदोन्नति से वंचित किया गया। उन्होंने दलील दी कि बैंक में उनकी 35 वर्षों से अधिक की बेदाग सेवा उन्हें पदोन्नति का हकदार बनाती है।
खंडपीठ ने इन दलीलों को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि दुर्भावना के आरोप लगाना बहुत आसान होता है, लेकिन उन्हें कानूनी तौर पर साबित करना बेहद कठिन काम है। अदालत ने पाया कि विगमल बैंक की ओर से किसी भी प्रकार के उत्पीड़न, प्रक्रियागत खामी या गंभीर अनियमितता को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहे। इसके साथ ही पीठ ने कहा कि 2018-19 की प्रक्रिया में उनके अंक सार्वजनिक न किए जाने को बैंक की दुर्भावना या चयन में पक्षपात का आधार नहीं माना जा सकता।
35 साल की सेवा और पदोन्नति का विवाद
विगमल वर्ष 1983 में नई दिल्ली में एसबीआई के भीतर क्लर्क-कम-टाइपिस्ट के पद पर नियुक्त हुए थे। विवाद की शुरुआत 2017 में हुई, जब उन्हें मिडिल मैनेजमेंट ग्रेड स्केल-2 से अगले पद पर पदोन्नत नहीं किया गया। इससे व्यथित होकर उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट ने 31 जनवरी 2018 को अपने आदेश में एसबीआई को निर्देश दिया था कि वह पदोन्नति नीति के तहत पात्रता पूरी होने की स्थिति में विगमल की उम्मीदवारी पर 2016-17 और 2017-18 के पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ 2018-19 की पदोन्नति प्रक्रिया में विचार करे। बैंक के नियमों के मुताबिक पदोन्नति के लिए लिखित परीक्षा और साक्षात्कार अनिवार्य था। विगमल ने लिखित परीक्षा से छूट मांगी थी, जिसे अदालत ने नामंजूर कर दिया था।
अदालती निर्देशों के तहत ही आयोजित हुई थी परीक्षा
अदालत के निर्देशानुसार विगमल 2018-19 की चयन प्रक्रिया के तहत लिखित परीक्षा और साक्षात्कार दोनों में शामिल हुए। इसके बाद एसबीआई ने 15 मई 2018 को चयनित अभ्यर्थियों की अंतिम सूची जारी की, जिसमें उनका नाम शामिल नहीं था। परिणाम आने के बाद उन्होंने एक नई याचिका दायर कर अंतिम चयन सूची को इस आधार पर चुनौती दी कि जब 2017-18 में लिखित परीक्षा नहीं हुई थी, तो उन्हें इसमें बैठने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए था।
खंडपीठ ने इस तर्क को खारिज करते हुए रेखांकित किया कि विगमल ने लिखित परीक्षा हाईकोर्ट के 31 जनवरी 2018 के आदेश के पालन में ही दी थी। पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि बैंक ने अदालती निर्देशों का पालन करते हुए पूर्वव्यापी पदोन्नति के लिए उनकी उम्मीदवारी पर निष्पक्ष रूप से विचार किया था, लिहाजा एकल न्यायाधीश के आदेश में दखल देने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।

