गुवाहाटी हाईकोर्ट ने मिजोरम पुलिस को उस प्रेस नोट को वापस लेने का आदेश दिया है, जिसमें एक मृत व्यक्ति को युवती की हत्या का मुख्य आरोपी बताया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस का यह बयान आधिकारिक ‘मीडिया ब्रीफिंग नियमावली’ का खुला उल्लंघन था, जिसने आरोपी के परिवार की जान-माल के लिए गंभीर खतरा पैदा किया और सीधे तौर पर भीड़ हिंसा को भड़काया।
जस्टिस राजेश मजूमदार की पीठ ने 27 अगस्त को मृतक की पत्नी की ओर से दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता ने पुलिस विज्ञप्ति के बाद भीड़ द्वारा घर फूंके जाने और संपत्ति के नुकसान के एवज में 7.61 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की है। मामले की अगली सुनवाई 4 दिसंबर को क्लेम्स कमिश्नर की रिपोर्ट के साथ होगी।
मीडिया ब्रीफिंग नियमों का गंभीर उल्लंघन
हाईकोर्ट ने कहा कि 27 जनवरी को जारी पुलिस विज्ञप्ति में जांच से जुड़े ऐसे संवेदनशील विवरण सार्वजनिक कर दिए गए, जिनकी अनुमति मीडिया नियमावली के तहत बिल्कुल नहीं है। पुलिस ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), पीड़िता के सिम कार्ड का विवरण, शव की बरामदगी और उसके सड़ने की स्थिति से लेकर फॉरेंसिक रिपोर्ट और जांच से जुड़ी अपुष्ट थ्योरी तक मीडिया में साझा कर दी थीं।
हाईकोर्ट के अनुसार, इन गैर-जरूरी और अनधिकृत खुलासों ने जनता को यह संदेश दिया कि मृतक ही हत्या का मुख्य सूत्रधार था, जिसके परिणामस्वरूप जनाक्रोश भड़का और परिवार पर जानलेवा हमला हुआ।
मौत के हफ्तों बाद जारी हुआ था पुलिस बयान
यह पूरा मामला दिसंबर 2025 में एक युवती के लापता होने और उसकी हत्या से जुड़ा है। वह 1 दिसंबर को सुबह करीब 11 बजे घर से निकली थी और शाम 5 बजे उसे आखिरी बार एक ऑटो में बैठते देखा गया था। जांच के दौरान पुलिस का ध्यान याचिकाकर्ता के पति पर गया।
हालांकि, 16 दिसंबर 2025 को अपने ही घर की पहली मंजिल से गिरकर उस व्यक्ति की मौत हो गई थी। उसकी मौत के करीब छह हफ्ते बाद, 27 जनवरी को मिजोरम पुलिस ने प्रेस नोट जारी किया। इसमें उस मृत व्यक्ति को युवती की हत्या का मुख्य आरोपी करार दिया गया और बताया गया कि पीड़िता गर्भवती थी तथा व्यक्ति को अस्पताल ले जाने वाले वाहन में मिले खून के धब्बे पीड़िता के खून से मेल खाते हैं।
हिंसा और बेदखली पर पुलिस की विफलता पर फटकार
प्रेस नोट जारी होते ही उसी दिन तीन स्थानीय संगठनों ने मृतक के परिवार को इलाका छोड़ने का नोटिस थमा दिया। इसके तुरंत बाद एक उग्र भीड़ ने घर को घेर लिया, पथराव किया, तोड़फोड़ और लूटपाट की तथा मकान, निर्माण सामग्री और याचिकाकर्ता की बेटी की स्कूटी में आग लगा दी। जान बचाने के लिए परिवार को अपना किराए का घर छोड़कर भागना पड़ा। हालांकि, बाद में संगठनों ने निष्कासन नोटिस वापस ले लिए थे।
हाईकोर्ट ने भीड़ के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस की लाचारी पर गहरी नाराजगी जताई। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस का यह कहना कि भीड़ के सामने उनकी संख्या कम थी, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। पुलिस रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि परिवार को सुरक्षा देने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए थे। राज्य सरकार ने बताया कि 29 जनवरी को स्वतः संज्ञान लेकर एफआईआर दर्ज की गई और कुछ आरोपियों की पहचान भी हुई, लेकिन संवेदनशील हालात का हवाला देकर किसी की गिरफ्तारी नहीं की गई। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि अब तक किसी भी आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर ट्रायल के लिए नहीं भेजा गया है।
मुआवजे के लिए क्लेम्स कमिश्नर नियुक्त
याचिकाकर्ता के 7.61 लाख रुपये के नुकसान के दावे का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए हाईकोर्ट ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश को ‘क्लेम्स कमिश्नर’ नियुक्त किया है। उन्हें तीन महीने के भीतर अपनी मूल्यांकन रिपोर्ट हाईकोर्ट रजिस्ट्री को सौंपने का निर्देश दिया गया है।
इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने भीड़ हिंसा मामले के जांच अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने और संबंधित पुलिस अधीक्षक (एसपी) को हर हफ्ते जांच की प्रगति की समीक्षा करने का आदेश दिया है।

