दिल्ली पुलिस ने राष्ट्रीय और जनहित का हवाला देते हुए सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और नीट-यूजी पेपर लीक के खिलाफ जुलाई में प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर दर्ज सभी एफआईआर (FIR) रद्द करने की मांग की। पुलिस ने शीर्ष अदालत से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर इन मामलों को खत्म करने की अपील की है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ इस याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करने के लिए सहमत हो गई है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा सोमवार को मामले का विशेष उल्लेख किए जाने के बाद अदालत ने सुनवाई का समय तय किया।
अनुच्छेद 142 के तहत केस वापस लेने की मांग
दिल्ली पुलिस ने अपनी अर्जी में कहा कि केंद्र सरकार द्वारा 25 जुलाई को मामले वापस लेने के फैसले के मद्देनजर वह अब 20 से 25 जुलाई 2026 के बीच हुए प्रदर्शनों से संबंधित मुकदमों की जांच या कार्रवाई को आगे नहीं बढ़ाना चाहती।
पुलिस प्रशासन ने अदालत को भरोसा दिलाया कि इन घटनाओं को लेकर भविष्य में कोई नई एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यदि इन्हीं प्रदर्शनों से जुड़ा कोई अन्य मामला बाद में सामने आता है, तो सरकार संबंधित व्यक्तियों को इसी तरह की राहत दिए जाने का विरोध नहीं करेगी।
गंभीर अपराधों के 2,873 आरोपियों को नहीं मिलेगी राहत
इससे पहले 18 अगस्त को हुई सुनवाई के दौरान पीठ ने उन मामलों की सूची मांगी थी, जिन्हें अनुच्छेद 142 के तहत रद्द किया जा सकता है। उस दौरान सॉलिसिटर जनरल ने पीठ को स्पष्ट किया था कि सामान्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामले रद्द किए जा सकते हैं, लेकिन हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर अपराधों में नामजद 2,873 लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी। वहीं, प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस बर्बरता को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, जिसके लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति गठित की गई है।
5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च पर आदेश देने से इनकार
यह कानूनी कदम कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा 5 सितंबर को दिल्ली में प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि में सामने आया है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार प्रदर्शनकारियों पर से मुकदमे वापस लेने के अपने वादे को पूरा करने में विफल रही है।
सोमवार को हुई एक अन्य सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर के इस प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर कोई भी आदेश देने से साफ इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता के वकील सैयद रिजवान अहमद ने दलील दी थी कि संगठन ने बिना प्रशासनिक अनुमति के सोशल मीडिया पर मार्च का ऐलान किया है और वे 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन से ठीक पहले टकराव की स्थिति पैदा करना चाहते हैं।
इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत फिलहाल यही मानकर चल रही है कि सभी पक्ष शांतिपूर्ण और कानूनसम्मत तरीके से जिम्मेदारी भरा आचरण करेंगे। उन्होंने कहा कि अभी किसी गड़बड़ी की आशंका जताने का कोई ठोस आधार नहीं है। पीठ ने रेखांकित किया कि किसी भी प्रदर्शन की अनुमति देना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन और दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए याचिकाकर्ता को संबंधित अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए।

