कथित ठग सुकेश चंद्रशेखर द्वारा ट्रायल कोर्ट के फैसले से अपने खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने की मांग वाली याचिका पर दिल्ली पुलिस ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट में कड़ा विरोध दर्ज कराया। यह मामला 2017 के एक भ्रष्टाचार केस में जमानत हासिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज का फर्जी नाम लेकर विशेष जज को प्रभावित करने से जुड़ा है, जिसमें सुकेश को दोषी ठहराया जा चुका है।
जस्टिस मधु जैन ने दिल्ली पुलिस की इस प्रारंभिक आपत्ति पर सुनवाई के लिए 3 नवंबर की तारीख तय की है।
याचिका की कानूनी वैधता पर पुलिस का सवाल
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस के वकील ने दलील दी कि सुकेश चंद्रशेखर की यह याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। अभियोजन पक्ष का कहना था कि चूंकि ट्रायल कोर्ट अब सजा का औपचारिक आदेश भी सुना चुका है, इसलिए आरोपी को सिर्फ कुछ प्रतिकूल टिप्पणियों को हटवाने के लिए अलग से याचिका दायर करने के बजाय अपने दोषसिद्धि और सजा के फैसले को चुनौती देते हुए नियमित अपील दाखिल करनी चाहिए।
लंबित मामलों में नुकसान होने का सुकेश का दावा
दूसरी तरफ, सुकेश चंद्रशेखर के वकील ने कोर्ट के सामने तर्क रखा कि फैसले में दर्ज अपमानजनक और लांछन लगाने वाली टिप्पणियों को हटाना बेहद जरूरी है। बचाव पक्ष का कहना था कि सुकेश के खिलाफ कई अन्य मामले भी लंबित हैं और ट्रायल कोर्ट की इन अवांछित टिप्पणियों से उन मामलों में उनके कानूनी अधिकारों और निष्पक्ष सुनवाई पर बुरा असर पड़ सकता है।
याचिका में आरोप लगाया गया कि ट्रायल कोर्ट ने पूरे मामले को पहले से तय और प्रतिकूल मानसिकता के साथ देखा। साथ ही यह भी कहा गया कि उसे बचाव में पूरे साक्ष्य पेश करने का उचित अवसर नहीं दिया गया और फैसला वस्तुनिष्ठ सबूतों के आधार पर देने के बजाय आरोपी के कल्पित चरित्र को आधार बनाकर सुनाया गया।
आठ साल के कठोर कारावास की सजा
इससे पहले 20 अगस्त को ट्रायल कोर्ट ने सुकेश चंद्रशेखर को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 170 (लोक सेवक का फर्जी रूप धारण करना), 189 (लोक सेवक को धमकी देना) और 507 (गुमनाम संचार से आपराधिक धमकी) के तहत दोषी करार दिया था। कोर्ट ने उसे आठ साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
सजा सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि यह अपराध न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता और पवित्रता पर सीधा हमला है। कोर्ट ने रेखांकित किया था कि आपराधिक न्याय प्रणाली को किसी एक अलग गैरकानूनी कृत्य और सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज में हेरफेर या दबाव बनाने के इरादे से सुनियोजित तरीके से किए गए कृत्यों के बीच स्पष्ट अंतर करना चाहिए। ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि अदालत के दरवाजे से न्याय पाया जा सकता है, लेकिन फर्जी पहचान, धमकी या गढ़े हुए अधिकार के पिछले दरवाजे से न्याय तक नहीं पहुंचा जा सकता।
क्या था 2017 का फर्जीवाड़ा मामला?
यह पूरा मामला 28 अप्रैल 2017 का है, जब सुकेश चंद्रशेखर भ्रष्टाचार के एक मामले में पुलिस हिरासत में था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, उसने पुलिस कांस्टेबल मंजीत के मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के मामलों की तत्कालीन विशेष जज पूनम चौधरी के आधिकारिक लैंडलाइन और मोबाइल नंबर पर कॉल की थी।
कॉल के दौरान सुकेश ने पहले खुद को सुप्रीम कोर्ट के एक तत्कालीन जज का निजी सचिव बताया और बाद में जमानत हासिल करने के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट का जज बनकर बात की। ट्रायल कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में पाया कि अभियोजन ने बिना किसी संदेह के यह साबित कर दिया है कि आरोपी ने न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करने के लिए जानबूझकर देश की शीर्ष अदालत के जज की पहचान अपनाई थी।

