यूनिफॉर्म नीति के खिलाफ धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देकर छात्र हिजाब पहनने की जिद नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने स्पष्ट किया है कि कोई भी छात्र यह साबित किए बिना कि कोई धार्मिक अभ्यास उसकी आस्था के लिए अनिवार्य है, स्कूल की तय यूनिफॉर्म नीति में बदलाव की मांग अधिकार के रूप में नहीं कर सकता। एक नाबालिग मुस्लिम छात्रा की उस याचिका को खारिज करते हुए, जिसमें उसने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगी थी, हाईकोर्ट ने माना कि जब तक यूनिफॉर्म नीति सही मंशा से लागू है और गैर-भेदभावपूर्ण है, तब तक ड्रेस कोड तय करने का पूरा अधिकार शैक्षणिक संस्थान के पास ही रहता है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता सुकैना रिजवी, अपनी मां के जरिए कोर्ट पहुंची थी। उसने प्रयागराज के अतरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल (सीबीएसई से संबद्ध स्ववित्तपोषित निजी संस्थान) से कक्षा 10 की पढ़ाई पूरी की थी। जब उसने उसी स्कूल में कक्षा 11 में प्रवेश के लिए आवेदन किया, तो स्कूल प्रशासन ने उसे प्रवेश देने से मना कर दिया। स्कूल का कहना था कि छात्रा कक्षा में यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने पर अड़ी हुई थी, जो स्कूल के ड्रेस कोड के खिलाफ था।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने 14 मई 2026 और 10 जून 2026 को प्रयागराज के जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र दिया। जिलाधिकारी ने जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) से रिपोर्ट मांगी। 8 जुलाई 2026 को सहायक डीआईओएस ने दोनों पक्षों के बयान दर्ज किए।

छात्रा का तर्क था कि उसने कक्षा 6 से 10 तक उसी स्कूल में पढ़ाई की है और इस दौरान वह हमेशा हिजाब पहनकर आती थी, जिस पर स्कूल ने कभी आपत्ति नहीं जताई। अपने दावे के समर्थन में उसने अपने आईडी कार्ड और ग्रुप तस्वीरें पेश कीं। वहीं, स्कूल की प्रधानाचार्य ने 10 जुलाई 2026 के अपने लिखित जवाब में स्पष्ट किया कि स्कूल एक सह-शिक्षा (को-एजुकेशन) संस्थान है और वहां सभी समुदायों के बच्चों के लिए एक ही यूनिफॉर्म नीति लागू है। प्रधानाचार्य ने कहा कि किसी एक छात्रा को हिजाब पहनने की छूट देने से स्कूल का ड्रेस कोड प्रभावित होगा और प्रशासनिक व्यवस्था बिगड़ेगी, खासकर तब जब उसी समुदाय की अन्य छात्राएं तय यूनिफॉर्म नीति का पूरी तरह पालन कर रही हैं।

डीआईओएस द्वारा 13 जुलाई 2026 को जिलाधिकारी को सौंपी गई रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि सीबीएसई से संबद्ध स्ववित्तपोषित स्कूल को अपने आंतरिक अनुशासन और ड्रेस कोड तय करने की स्वायत्तता है। ऐसे में किसी छात्र द्वारा दबाव बनाकर छूट प्राप्त करना उचित नहीं है।

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पक्षों की बहस

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि छात्रा शिया मुस्लिम समुदाय से आती है और बचपन से ही हिजाब पहनती आ रही है। यह दलील दी गई कि हिजाब पहनना संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(ए) के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार है, जो उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता का हिस्सा है। याचिकाकर्ता का कहना था कि यूनिफॉर्म के साथ अपनी पसंद का हिजाब जोड़ने से ड्रेस कोड का उल्लंघन नहीं होता और स्कूल के पास कक्षा 11 में प्रवेश के समय उसे रोकने का कोई औचित्य नहीं था।

दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता ने तर्क दिया कि स्कूल एक निजी स्ववित्तपोषित संस्थान है, जिस पर उसके आंतरिक प्रशासन या ड्रेस कोड तय करने के मामले में राज्य का कोई नियंत्रण नहीं है। उन्होंने कहा कि यूनिफॉर्म तय करने का फैसला छात्रों के बीच समानता और एकरूपता बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया एक नीतिगत निर्णय है। इससे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का कोई उल्लंघन नहीं होता है। वहीं सीबीएसई के वकील ने भी राज्य सरकार के तर्कों का समर्थन किया।

अदालत का विश्लेषण और नजीरें

फैसला सुनाते हुए जस्टिस जे.जे. मुनीर ने इस मुख्य कानूनी प्रश्न पर विचार किया कि क्या कोई छात्र स्कूल के तय ड्रेस कोड में संशोधन या अतिरिक्त चीज जोड़ने का दबाव बना सकता है।

अदालत ने टिप्पणी की:

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“जब तक ड्रेस कोड एकसमान, सही मंशा से लागू, गैर-भेदभावपूर्ण है और उसका उद्देश्य अनुशासन व संस्थागत पहचान बनाए रखना है, तब तक निर्धारित यूनिफॉर्म का चयन मुख्य रूप से स्कूल के अधिकार क्षेत्र में आता है।”

छात्रा की इस दलील पर कि उसने पिछली कक्षाओं में भी हिजाब पहना था, पीठ ने कहा:

“केवल यह तथ्य कि याचिकाकर्ता ने स्कूल के विरोध के बिना निचली कक्षाओं में पढ़ते समय हिजाब पहना था, अपने आप में ऐसा कोई निहित या लागू करने योग्य अधिकार नहीं बना देता कि वह कक्षा 11 में प्रवेश मांगते समय स्कूल को अपनी यूनिफॉर्म नीति में बदलाव या ढील देने के लिए मजबूर कर सके।”

स्कूल यूनिफॉर्म के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“छात्रों के लिए यूनिफॉर्म पहनने का नियम धर्म-निरपेक्ष माहौल को बढ़ावा देता है, क्योंकि यह बिना किसी भेदभाव के विभिन्न धर्मों को मानने वाले सभी छात्रों पर समान रूप से लागू होता है।”

अदालत ने कई प्रमुख न्यायिक नजीरों का हवाला दिया:

  1. प्रदीप कुमार श्रीवास्तव बनाम मानव संसाधन विकास मंत्रालय (2014): इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने छात्राओं के लिए स्कर्ट की यूनिफॉर्म नीति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए कहा था कि शैक्षणिक अधिकारियों को उचित ड्रेस कोड तय करने का अधिकार है।
  2. फातिमा तसनीम (नाबालिग) बनाम केरल राज्य (2018): केरल हाईकोर्ट ने माना था कि जहां व्यक्तिगत पसंद और संस्थान के प्रबंधन के मौलिक अधिकार में टकराव होता है, वहां संस्थागत अधिकार को प्राथमिकता मिलती है।
  3. फातिमा हुसैन सईद बनाम भारत एजुकेशन सोसाइटी (2002): बॉम्बे हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने फैसला दिया था कि छात्रा को स्कूल के ड्रेस कोड का पालन करने का निर्देश देना अनुच्छेद 25 का उल्लंघन नहीं है।
  4. रेशम बनाम कर्नाटक राज्य (2022): कर्नाटक हाईकोर्ट की फुल बेंच ने फैसला दिया था कि हिजाब पहनना इस्लाम में अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है, और शैक्षणिक संस्थान अनुशासन व समानता बनाए रखने के लिए यूनिफॉर्म लागू कर सकते हैं।
  5. आयशा शिफा बनाम कर्नाटक राज्य (2023): सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक मामले में विभाजित फैसला दिया था, जो अभी बड़ी पीठ के समक्ष लंबित है। हाईकोर्ट ने नोट किया कि यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले (ज़ैनब अब्दुल कय्यूम चौधरी बनाम चेंबूर ट्रॉम्बे एजुकेशन सोसाइटी, 2024) में अंतरिम रोक लगाई थी, लेकिन बिना विस्तृत कारणों वाले अंतरिम आदेश बाध्यकारी नजीर नहीं बनते।
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अनुच्छेद 25 के तहत किए गए दावों पर पीठ ने टिप्पणी की:

“रिकॉर्ड पर ऐसी कोई याचिका, आधिकारिक धार्मिक पाठ या सामग्री नहीं रखी गई है जो यह साबित करने के लिए पर्याप्त हो कि कक्षा के भीतर स्कार्फ पहनने की प्रथा अनिवार्य है और इसका पालन न करने से उसकी आस्था का मूल चरित्र बदल जाएगा।”

अदालत ने आगे कहा:

“यदि व्यक्तिगत छात्रों को व्यक्तिगत आधार पर तय यूनिफॉर्म से थोड़ा भी हटने या उसमें बदलाव करने की अनुमति दी गई, तो यह यूनिफॉर्म की मूल अवधारणा के खिलाफ होगा। इससे स्कूल के अनुशासन को तय करने का अधिकार संस्थान के बजाय व्यक्तिगत छात्रों के हाथ में चला जाएगा।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए आवश्यक तथ्यात्मक या कानूनी आधार स्थापित करने में विफल रही कि कक्षा के भीतर हिजाब पहनना एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा है या स्कूल के ड्रेस कोड ने उसके मौलिक अधिकारों का अवैध रूप से उल्लंघन किया है। नतीजतन, रिट याचिका को बिना किसी लागत के खारिज कर दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सुकैना रिजवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: रिट – सी संख्या 31172/2026
पीठ: जस्टिस जे.जे. मुनीर, जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला
निर्णय की तिथि: 21 अगस्त 2026

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