तरुण तेजपाल की सजा बढ़ाने सुप्रीम कोर्ट पहुंची गोवा सरकार, उम्रकैद की मांग

तहलका पत्रिका के पूर्व प्रधान संपादक तरुण तेजपाल को मिली 10 साल की कैद की सजा को अपर्याप्त बताते हुए गोवा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। राज्य सरकार ने याचिका दायर कर 2013 के यौन उत्पीड़न मामले में तेजपाल की सजा को बढ़ाकर उम्रकैद या अदालत द्वारा उचित मानी जाने वाली अन्य सजा में बदलने की मांग की है।

गोवा सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में कहा कि हाईकोर्ट द्वारा दी गई 10 साल के कठोर कारावास की सजा अपराध के स्वरूप और उसकी गंभीरता की तुलना में बहुत कम है। सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि वह तेजपाल की दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दे रही है, बल्कि केवल सजा की अवधि को बढ़ाने का अनुरोध कर रही है।

समय बीतने को राहत का आधार बनाने का विरोध

याचिका में हाईकोर्ट के उस निर्णय की आलोचना की गई है जिसमें दो अलग-अलग दुष्कर्म के मामलों में 10-10 साल की न्यूनतम सजा तय करते हुए उन्हें एक साथ (समवर्ती) चलाने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने सजा सुनाते समय इस बात का उल्लेख किया था कि घटना को 13 वर्ष बीत चुके हैं और दोनों पक्ष अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुके हैं।

राज्य सरकार ने इस तर्क को पूरी तरह अनुचित बताया। सरकार का कहना है कि न्यायिक प्रक्रिया में हुई देरी का लाभ किसी दोषी को नहीं दिया जा सकता और न ही इसके आधार पर गंभीर यौन अपराधों की सजा को कम किया जा सकता है, विशेषकर तब जब देरी के लिए पीड़िता जिम्मेदार न हो।

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पद के दुरुपयोग और मानसिक उत्पीड़न का तर्क

अपील में कहा गया है कि अपराध के समय तरुण तेजपाल पीड़िता पर नियंत्रण, प्रभाव और अधिकार वाले पद पर थे। पीड़िता तेजपाल द्वारा आयोजित एक आधिकारिक कार्यक्रम के दौरान अपनी जिम्मेदारियों का पालन कर रही थी, जब उनके साथ यह कृत्य हुआ।

इसके अलावा, सरकार ने अदालत का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया कि सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने पीड़िता से लगभग 1,000 पन्नों की आक्रामक जिरह की, जिसका उद्देश्य उन्हें अपमानित करना और उनके चरित्र पर सवाल उठाना था। याचिका के अनुसार, इस प्रकार के द्वितीयक मानसिक उत्पीड़न और अपराध की गंभीरता को देखते हुए न्यूनतम सजा देना न्यायसंगत नहीं है।

दो अलग अपराधों के लिए पृथक सजा की मांग

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राज्य सरकार ने यह दलील भी दी कि लगातार दो दिनों में किए गए दो अलग-अलग यौन हमलों की सजा को एक साथ चलाने से प्रभावी दंड काफी कम हो गया है। दोनों घटनाएं स्वतंत्र आपराधिक कृत्य थीं, इसलिए दोनों के लिए अलग-अलग (क्रमिक) सजा दी जानी चाहिए।

तेजपाल के पारिवारिक संदर्भों को खारिज करते हुए याचिका में कहा गया कि उनका शादीशुदा होना, दो बालिग बेटियां होना या घटना के बाद किसी अन्य अपराध में शामिल न होना, उनके अपराधों की गंभीरता को कम नहीं करता। तेजपाल को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (2) (f), 376 (2) (k), 354, 354A, 354B, 341 और 342 के तहत दोषी ठहराया गया है।

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