सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र के घाटबर्रा गांव में ग्रामीणों के सामुदायिक वन अधिकारों को लागू करने की मांग वाली याचिका पर सोमवार को केंद्र सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार, राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) और सरगुजा की जिला स्तरीय वन अधिकार समिति को नोटिस जारी किया। इसके साथ ही अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि इस याचिका पर सुनवाई से पीईकेबी (PEKB) कोयला ब्लॉक में चल रहे खनन कार्यों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
खनन जारी रखने की अनुमति और कानूनी पड़ताल
मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ ने स्पष्ट किया कि नोटिस जारी करने का मुख्य उद्देश्य यह जांचना है कि क्या इस मामले में कानूनी रूप से सामुदायिक वन अधिकार अस्तित्व में हैं। अदालत के अनुसार, यदि अधिकार स्थापित पाए जाते हैं, तो उन्हें लागू कराने के लिए संभावित कानूनी उपायों पर विचार किया जाएगा।
समिति की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह की दलीलों को सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इन कानूनी मुद्दों की समीक्षा करने से RRVUNL द्वारा संचालित कैप्टिव कोयला खदान के संचालन में कोई रुकावट नहीं आएगी।
हाईकोर्ट के आदेश को दी गई है चुनौती
यह याचिका ‘हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति’ और छह अन्य लोगों द्वारा दायर की गई है, जिसमें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 21 अप्रैल के फैसले को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने घाटबर्रा गांव के सामुदायिक वन अधिकारों को रद्द करने और PEKB कोयला ब्लॉक में दूसरे चरण (फेज-II) के खनन की मंजूरियों के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी थी।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 8 अक्टूबर 2025 को आए सिंगल जज के उस आदेश को सही ठहराया था, जिसमें कहा गया था कि जिन कानूनी मामलों का पहले ही निपटारा हो चुका है, उन्हें किसी नई या अप्रत्यक्ष याचिका के जरिए दोबारा नहीं खोला जा सकता। हाईकोर्ट ने माना कि यह याचिका उन प्रक्रियाओं पर एक अप्रत्यक्ष हमला है जो पिछली मुकदमेबाजी में अंतिम रूप ले चुकी हैं। अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि वर्ष 2011 और 2012 के मुख्य वन मंजूरियों (फॉरेस्ट क्लियरेंस) तथा 28 मार्च 2012 के भूमि डायवर्जन आदेश को चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए बाद की प्रशासनिक कार्रवाइयों को रद्द नहीं किया जा सकता।
परियोजना की पृष्ठभूमि और ग्रामीणों के तर्क
आदिवासी बहुल गांव घाटबर्रा को वन अधिकार कानून (FRA) के तहत अपनी पारंपरिक वन भूमि के संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग का कानूनी अधिकार मिला हुआ था। बिजली उत्पादन के लिए यह कोयला खदान RRVUNL को आवंटित की गई थी। परियोजना के पहले चरण (फेज-I) का खनन पूरा हो चुका है, जबकि दूसरे चरण (फेज-II) के लिए फरवरी 2022 में नियामक मंजूरियां दी गई थीं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ग्रामीणों के अधिकारों को निरस्त करना और खनन के लिए जंगल की भूमि का डायवर्जन करना वन अधिकार कानून के प्रावधानों और अनिवार्य ग्राम सभा की सहमति का उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया है कि वनों के विनाश से होने वाले सांस्कृतिक और पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई केवल पैसों से नहीं की जा सकती।

