सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम: देश भर में फुटपाथों को अतिक्रमण मुक्त बनाने के लिए सभी राज्यों से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित और अतिक्रमण मुक्त फुटपाथ सुनिश्चित करने की दिशा में कार्रवाई का दायरा बढ़ा दिया है। अदालत ने सोमवार को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार के रूप में शामिल किया है। शीर्ष अदालत ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे पैदल यात्रियों के लिए बनाए गए केंद्रीय दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन पर अपना जवाब दाखिल करें।

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने टिप्पणी की कि फुटपाथ का अस्तित्व मानव जीवन का एक अभिन्न अंग है। अदालत ने कहा कि जहां भी सड़क मौजूद है, वहां पैदल चलने वालों के लिए अलग से स्पष्ट जगह तय होनी चाहिए ताकि लोग पूरी सुरक्षा और आत्मविश्वास के साथ आवाजाही कर सकें।

केंद्र की सलाह पर राज्यों की प्रतिक्रिया अनिवार्य

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने पीठ को बताया कि सड़कें मुख्य रूप से राज्य का विषय हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेशों का पालन कराने के उद्देश्य से सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और आवास व शहरी मामलों के मंत्रालय ने राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं। अदालत ने अब राज्यों से इन दिशानिर्देशों पर अमल की स्थिति रिपोर्ट मांगी है।

इससे पहले 3 अगस्त को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह देश भर के सड़क नेटवर्क पर पैदल मार्गों का स्पष्ट सीमांकन सुनिश्चित करे। पीठ ने कहा था कि चलने की जगह को गाड़ियों की आवाजाही वाली लेन से पूरी तरह अलग रखा जाए और उस पर किसी भी तरह का अवैध कब्जा या अतिक्रमण न होने दिया जाए।

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पैदल चलने का अधिकार बना मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट की यह हालिया कार्रवाई 19 जून को आए उसके एक ऐतिहासिक फैसले की कड़ी में है। उस निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया था कि सीमांकित फुटपाथ पर चलना नागरिक का मौलिक अधिकार है। पीठ ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 19(1)(d) (अबाध संचरण का अधिकार) के तहत पैदल यात्रियों का अधिकार मोटर वाहनों की आवाजाही से प्राथमिक और सर्वोपरि है।

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दुर्घटना से हुई शुरुआत और स्थानीय निकायों का दायित्व

यह पूरा कानूनी मामला एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना के मुआवजे से जुड़ी याचिका के दौरान सामने आया था, जिसमें एक पिता ने अपने पांच साल के मासूम बेटे को स्कूल ले जाते समय खो दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस त्रासदी पर संज्ञान लेते हुए रजिस्ट्री को ‘री: फंडामेंटल राइट टू वॉक एंड फुटपाथ’ शीर्षक से अलग मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था।

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अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों, नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों जैसे स्थानीय निकायों का यह संवैधानिक और कानूनी दायित्व है कि वे फुटपाथों का निर्माण करें, उनका उचित रखरखाव करें और उन्हें सुरक्षित रखें। यदि किसी नागरिक के सुरक्षित फुटपाथ पर चलने के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ मुआवजा और बहाली के लिए संवैधानिक व कानूनी कदम उठा सकता है। यह अधिकार मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मिलने वाली राहतों के अलावा और स्वतंत्र होगा।

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